प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता- ‘माँसाहब जीजाऊ!

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के संबंध में जो मूल्य आवश्यक होते है; उसका जिक्र करना लाज़मी है। वह मूल्य आते कहाँ से है? उनका होना कितना अहम होता है? ऐसे कई सवाल अपने आप दिमाग में आते है। और इतिहास के पन्ने पलटने शुरू होते है। जनता का स्वराज्य निर्माण करते समय कौन से मूल्य मददगार सबित हुए होंगे? इसका जवाब हमें सोलहवी सदी के अंत में धीरे धीरे उभरते हुए दिखाई देता है। शाही रियासतों में भारत के मूलनिवासी लोग सेवा में इसलिए जुड़े थे, कि अपने भविष्य में आनेवाली कौम का गुजारा सही ढंग से हो सके। शाही रियासतों ने अपने बेहिसाब शान-ए-शौकत, दौलतमंदी के बलबुतेपर उनको अपने साथ जोड़ लिया। उन्होंने कई कर्तबगार तथा जाँबाज़ सिपाहियों को अपने रियासतों में सरदार, जहाँगीरदार तक बनाकर रखे हुए थे। यह लेख इतिहास के कालक्रम को केवल समावेशी विश्लेषण करके अपने शब्दों में बया करता है। 

स्वराज्य की नींव रखने की पहली पहल राजे शाहजी महाराज ने की थी, मगर स्वराज्य की संकल्पना लखुजीराजे जाधव और म्हालसाराणी के कोक से जन्मी जिजा के मनमस्तिष्क में आकार ले रही थी। जीजा का सफ़र माँसाहब जीजाऊ तक का मूल्य पर ही आधारित था। जीजा का जन्म 12 जनवरी 1598 में महाराष्ट्र के बुलढाना जिले के सिंदखेड़ गाव में हुआ था। जन्म से ही जीजा ने अपने पिता को निजामशाही के दरबार में मुजरा, कोरनिश करते देखा था। वह सोचती थी कि उनके गाव के महल में याने सिंदखेड़ में सभी सिपाही उनके पिता लखुजीराजे को आदर के साथ मुजरा करते थे। फिर निजाम के दरबार में मेरे पिता क्यों उनके सामने झुकते है। आत्मसम्मान का यह पहला दाखिला हो सकता है। उनके पिताजी ने उन्हें छोटी उम्र से ही हर कला से अवगत कराया था। इसलिए हिम्मत तथा निडरता जीजा के मन में ढाल की तरह मजबूत बन गए। शाही रियासती में जनता दहशत के मारे झुकती तथा सलाम करती मालुम होती थी। लेकिन तत्कालिन लखुजी राजे और मालोजी राजे उनको उनके सरदार आदर के साथ मुजरा तथा सलाम करते थे। यह भेद जब से जीजा को पता चला तब से अपने स्वराज्य की संकल्पना उसके मन में दृढ़ बनती गई। 

वेरुल के मालोजीराजे भोसले भी निजामशाही में एक ईमानदार जाँबाज़ जहागीदर के तौर पर थे। उन्होंने अपने बेटे शाहजी तथा शरिफजी को भी शौर्य की वर्णमाला बखुबी से सिखाई थी। जब शाहजी बड़े हुए, उनका विवाह जीजा से हुआ। आज तक केवल दूर से ही निजामशाही की सेवा करनेवाले दो मराठे जहागीरदार सरदार संबंधि बन गए। हमने “ तोड़ो और राज करो”  यह नीति अँग्रेजों के समय सुनी थी। पर इसका अमल सत्रहवी सदी के आरंभ से शुरू हुआ होगा, ऐसे इस परिपेक्ष में दिखाई देता है। सत्ता और दौलत के चक्कर में परिवार में ही गद्दारी करने पर इन शाही रियासतों ने जाधव-भोसले परिवार को मजबूर कर दिया था। आखिरकार शाही रियासती के मंसुबे इन भोसले–जाधव इन दो परिवार में फूट करने में कामयाब हो गए। इसी चलते कभी वे निजामशाही तो कभी मुघलशाही में जानेआने लगे। पर इसी दौरान शाहजी राजे और जीजाबाई अपने स्वराज्य निर्माण के काम में एकग्रता से जूट गए थे। जब शाहजी सेना के सरनौबत बन गए, तब तो इस अधिकार से उन्होंने अपनी जनता को जो दहशत में जी रही थी; उन सभी मराठे सरदारों को विश्वास दिलाया और अपनी जनता को हौसला रखने को कहा। उनका कहना था- जनता का स्वराज्य निर्माण के काम में आपकी एकता और विश्वास जरूरी है। इस काम में लोगों को जोड़ने के लिए वह बहुरुपियाँ तक बन गए थे। 

शुरुवाती दिनों खेत/जमीन का लगान बहुत ही बेरहमी से मुघलों ने वसुला था, आगे चलके निजामशाही भी उसी लुटालूट पर उतरी। जब आस-पास लुटालूट, दहशत, औरतों अब्रू लुटना, खुन-खराबे को आखिरकार ठुकराकर जनता इस उभरते स्वराज्य संकल्पक शाहजीराजे भोसले के पक्ष में खड़ी हुई। जिस जीजा ने इस कल्पना को साकार होते देखा उसे हम स्वराज्य जननी कहते है। उन्होंने हर एक इंसान को विश्वास के साथ साथ सुरक्षा भी प्रधान की। उनके हुनर देखकर नौजवानों को सेना में भरती होने की संधी उपलब्ध कराई। एक उदाहरण आप ने सुना होगा- जब जंगली सुवर और रनगवा खेतों का बड़ा नुकसान कर रहे थे, तब उन्होंने एक फर्मान जारी किया था। – अगर इन जंगली जानवरों को रोकने का कोई इंतज़ाम करेगा; उन्हें सुवर्ण मुद्राएँ दी जाएगी।“ इसके दुसरे ही दिन से नौजवान, जिगरबाज लोग आगे आने लगे। एक बार एक नौजवान रात के 12 बजे राजमहल में जंगली जानवरों का प्रबंध करके सबुत के तौर पर उस जानवर की पूंछ लेकर माँसाहब जीजाऊ से मिलने आया। समय रात का होने के कारण उन्हें जाने को कहा मगर वह जाने के लिए तैयार नहीं था। इस अनबन की आहट जब जीजाऊ माँसाहब के कानों तक पहुँची, तब वे बाहर आए। उसे पुछा- कल सुबह आते तो भी हम आपकी बहादुरी के लिए सुवर्ण मुद्राएँ देते थे। इतना विश्वास नहीं है? और साथ में ही उसका नाम भी पुछा – उसने कहा-  दानाजी मालुसरा, माँसाहब सुवर्ण मुद्रा के लालच में अभी नही आया हूँ। आपने दिया हुआ काम पूरा करने का सौभाग्य मुझे मिला, बस यही बताकर आपका आशिर्वाद लेने आया हूँ।“ इस जवाब से हम सोच सकते है। स्वराज्य निर्माण का काम कॅडरबेस था। आगे दानाजी स्वराज्य के सेना में सामिल हुआ। 

लगान माफ न करने के कारण गाव के सभी लोग जंगलों में भागते रहते थे, ताकि लगान से बच जाए। कोई दौलतमंद सरदारों का काफिला जाते दिखता तो वह उसे लुटते थे। आगे चलकर उन्हें घुमंतू, पारधि,रामोशी, के रूप में पहचाने जाने लगे। लुटपाट करने की एक ही वजह थी; खेत से आनेवाला अनाज लगान के रुप में शाही बादशाहओं को देना पड़ता था। गुजारा करने का कोई उपाय नही बचता था। तब जा के वह केवल डरा धमकाकर लुटते थे। पर जीजा ने उसे भी बदल दिया। कल तक जो जीजा थी वह अभी जनता के लिए माँसाहब जीजाऊ (आऊ याने माँ) बन चुकी थी। उन्होंने जरूरतमंदों को अनाज दिया, रोजिरोटी दी, स्वराज्य के काम में सामिल किया, ऐसे कई काम देकर जनता को अपना बनाया। औरतों का सम्मान और सुरक्षा महसूस  होने से उन्हें जनता से एक जनादेश मिलता गया। इसी बलपर स्वराज का निर्माण हुआ था। 12 जनवरी को माँसाहब जीजाऊ जन्मदिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस यह दोनों घटनाएँ मूल्य से अलग हो ही नहीं सकती है। जिस मूल्यों को हमने संविधान में बोया है, वही मूल्य हमें माँसाहब जीजाऊ के जीवन में दिखते है। समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, जैसे मूल्य आसानी से उनके जीवनी से दिखते है। पीड़ित जनता को समझकर- समझाकर बदलाव का विश्वास दिलाना, आज के चुनावी भाषणों  जितना आसान नही था। 

जनता के बात पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया, स्वराज्य को खड़ा करने में जिसकी जितनी क्षमताएँ उनको उतनी संधी, अवसर उपलब्ध कराया। लोगों में हिम्मत आयी और सुरक्षित जनता का स्वराज्य निर्माण हुआ। इस राजमाता की भुमिका केवल शाहजी राजे की पत्‍‌नी तक सीमित नही थी। जब सिंदखेड़ में बचपन की तालीम हों रहीं थी, तब से आत्मसम्मान की बातें जीजा करती आ रही थी। शाहजी राजे की पत्‍‌नी के रूप में जब वे थे, तब खौंपनाक उन शाही रियासतों के बीच जाधव और भोसले पारिवारिक कलह को मिटानेवाली निर्णायक व्यक्ति, स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षा, आदर, जैसे मूल्यों को हरवक्त दोहरानेवाली कुम्हार की कलाई थी; मानो किसी मिट्टी को आकार देकर सपने को साकार कर रही हो! आऊ के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के पीछे महाकाय कल्पतरू बनी थी। अपने सपनों को साकार करने में शिवबा को तैयार करनेवाली वात्सल्य जननी थी। उन्होंने शिवबा में सद्गुण, शौर्य, दूरदृष्टि, राजनीति, कुशल प्रशासक जैसे मूल्यों को बोया था। 

अक्सर हम कहते है- स्वराज्य संस्थापक शिवबा को जन्म देनेवाली जीजाऊ है। इसमें कोई दो राय नही है। हमने शिवबा की महानता को सराया है। पर स्वराज्य संस्थापक  होना, कोई आम बात नहीं थी।  इस स्थिती में शरिर से मस्तिष्क तक विचारधारा देना मूल्यों के बिना मुमकिन नही था। इसलिए स्वराज के विचार तथा संकल्पना की जननी माँसाहब जीजाऊ ही है। स्वराज रक्षक संभाजी के परवरिश में भी माँसाहब जीजाऊ का अमूल्य योगदान था। माँसाहब जीजाऊ का स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षितता, जनता के स्वराज्य की जननी तक का सफ़र अनोखा है। खेत में झुलनेवाले किसी भी अनाज के पत्ते को भी छुना नहीं, ऐसी ताकीद देना, हर औरत को माँ के समान समझना, हर सिपाही का हौसला बुलंद करने के लिए गले लगाना, इसी से ही जनता का स्वराज इतिहास के पन्नों पर सुवर्णमुद्रित हो सका। 

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता को स्मरण करना मौलिक अभ्यास से जुड़ा था। वह एकाधिकारशाही, राजेशाही जरूर थी, मगर जनता का जनाधार सरआँखों पर था। सामाजिक मूल्यों की वह अतुलनीय प्रणाली थी। मैं उस गणतंत्र को आज के लोकतंत्रात्मक गणराज्य के भारत से मिलता-जुलता पाता हूँ। संवैधानिक भारत के निर्माण में मूल्याधारित सक्रिय नागरिकों को तैयार करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। माँसाहब जीजाऊ ने जो सत्रहवीं सदी में साकार करवाया, शायद हमें उस सुवर्ण इतिहास में एक और बार दौरा देना होगा। जिससे हम इस आधुनिक भारत में कॅडरबेस जनता निर्माण कर सकें।   

धन्यवाद 

अमित शालिनी शंकर पवार 

मनुष्य हुँ…?

में चल रहा हू रास्ता

जो जात धर्म से हुवा

मे सांस लेना चाहु पर

इसमे ऊंच नीच की हवा

जो दिख रहा समाज हे

मे लिख रहा वो दृश्य हुं

चार लोगों की भीड मे

में  ढुंढता मनुष्य हुँ

में ढूंढता मनुष्य हुँ…

 

हरियाली जो हे छुप रही

सृष्टी जो  बेहाल हे

जानवर भी रो रहे

ये इंसान का कमाल हे

जो सज रहा हे सामने

मे लिख रहा वो कृत्य हुं

इस क्रूरता को चिरदे

वो ढुंढता मनुष्य हुँ

में ढुंढता मनुष्य हुँ…

 

हे औलाद धर्म की

जो मारती इंसान हे

ये बददुवा हे जात की

जो सड़ चुका इंसान हे

अब मरते मर ना पाऊ मे

और जीके भी क्या पाऊ मे

पाना चाहु अब अगर

चाहता वो वक्त हूं

इंसानियत का दृश्य जो

वो ढुंढता मनुष्य हुँ

में ढूंढता मनुष्य हुँ…

लहू का रंग लाल हे

हे जिस्म मेरा केह रहा

आंखो मे भरी धूल हे

हे जिस्म मेरा केह रहा

मेरा मुझपे अहंकार हे

भेदभाव सर पर चढा

खुद मे खुद से केह रहा

हर पल मे सदा दुष्ट हूं

मे खुद मे खुद को खोजता

में ढुंढता मनुष्य हुँ…

 

जो आसमा महान हे

वो पानी बेमिसाल सा

धरती का जो गंध हे

अब हवा मे हे बास (बदबू) सा

पहाड की ही गोद मे

पल रहा हूं रात सा

मे चाहता हूं सब मुझे

कहते रहे मे तुच्छ हूं

मे खुद मे खुद को खोजता

में ढुंढता मनुष्य हुँ…

 

बिन शस्त्रो का प्रहार हे

जो मृत्यु की भी जान लू

झगडो मे ही पल रहा

मे रक्त का चरित्र हूं

अपने पर ही तन रहा

मे वक्त का धनुष्य हुं

मे खुद मे खुद को खोजता

में ढूंढता मनुष्य हुँ…

 

अजय अनिता लक्ष्मण