रानी लक्ष्मी बाई

 

सुख वैभव को छोड़कर 

उसने खड़ग धारी थी 

जिसने अंग्रेजों को तबाह किया 

एक अकेली नारी थी……

कितनी पीड़ा आयी 

कितने दुःख का पहाड़ गिरा 

खुद को निसहाय नहीं समझा 

आगे बढ़ कर वार किया……

पवन नामक अश्व पर चढ़ वो पवन से बातें करती थी 

 पूरी अंग्रेजों की फ़ौज भी उस नारी से डरती थी 

साथ नहीं दिया किसी ने अकेले बलदाएं थामी थी 

एक अकेले दम पर उसने सबको धूल चटायी थी.. 

देखा कौशल देखी कलाएं 

कैसी विधा उसने पायी थी 

उसके तलवार के आगे सबने मुँह की खाई थी 

सभी चकित हो कर देखते नारी थी या काली थी 

खूब लड़ी मर्दानी थी वो 

झांसी वाली रानी थी।

   

  • शुभम पटेल

बलात्कार पीडिता बद्दलची ‘समजवृत्ती’

संविधानाने भारतातील सर्व नागरिकाना समान हक्क अधिकार दिले आहेत.मग ती स्त्री असो वा पुरुष.संविधान अस्तित्वात येउन आज 72 वर्षे पूर्ण झाली. तरी आजही महिला सुरक्षित नाहीत का? याला जबाबदार कोण ?…याला जबाबदार असणारी आपली समाजव्यवस्था आणि आपली मानसिकता आहे ती बदलणे खूप गरजेचं आहे. संविधानाचे रक्षण व सन्मान करणे प्रत्येक नागरिकाचे कर्तव्ये आहे.पण आजही काही व्यक्ति संविधान हटविण्यासाठी षड्यंत्र रचत आहेत. संविधानाने प्रत्येक व्यक्तीला सुरक्षा कवच प्रदान केले आहे त्यामुळे प्रत्येक व्यक्तिचा दर्जा वाढतो. संविधानामुळे देश एकसंघ आहे.काही विषमतावादी लोक संविधान बदनाम करून त्यास नष्ट करण्याचा प्रयत्न करत आहेत.

       माहिलाना जीवन जगताना समाजव्यवस्थे मुळे येणाऱ्या अडचणी वर मात करण्याचा मार्ग संविधानाने दिला आहे.तरी महिलाना त्या बलात्काराच्या आगीतून सामोर जावं लागत. आजही महिला सुरक्षित नाहीत. बलात्कार, अत्याचार, विनयभंग असे अनेक गुन्हे होत आहेत.गल्ली ते दिल्ली पर्यंत प्रत्येक ठिकाणी महिलांना अन्याय अत्याचार सहन करावा लागतो त्याना कमी लेखल जात चुल अणि मूल यातून बाहेर स्त्रीने दिल्लीच्या तख्ता पासून चंद्रावर जान्या पर्यंत चा प्रवास यशस्वी रित्या पूर्ण केला आहे,तरीही स्त्रियाना दुयम स्थान अजुन ही मिळत आहे.बाल विवाह,वैश्या व्यवसाय,शिक्षणा पासून वंचित ठेवणे असे कित्येक अन्याय महिलाना सहन करावे लागतात. 

संविधानाने प्रत्येक व्यक्तीला समान न्याय,अधिकार,कायदे कानून दिले असतानाही महिला सुरक्षित का नाही ? का त्याचा छळ केला जातो? प्रत्येक महिला ही बलात्कारातून जात असते मग तो बलात्कार शारीरिक असो, मानसिक असो, वैचारिक असो, शाब्दिक असो, तिला तो सहन करावा लागतोच.बलात्कार, अपहरण, विनयभंग, अत्याचार खूप वाढत आहेत.  अगदी 3 वर्षाच्या मुलापासून ते 60,70 वर्षीय महिले पर्यंत बलात्कार होत आहेत.बलात्कार सहन करताना काय वेदना होतात, काय त्रास होतो, कसे  समाजाला तोंड द्यावे लागते. त्यात त्या महिलेचा जीव ही जाऊ शकतो. हे फक्त त्या बलात्कार होणाऱ्या महिलेला माहिती. समाजात याचा दोष ही महिलेला दिला जातो की ती घरातून बाहेर का जाते,ति साड़ी मध्ये नव्हती,तिने केस मोकळे  सोडले होते,लिपस्टिक लावून नटून थटून निघायची… अशी भाषा त्या पीडित महिलांच्या विरुद्ध वापरली जाते .परंतु पुरुष प्रधान देशामध्ये कधीच पुरुषावर याचा आरोप केला जात नाही.मुलीचा खेळण्या बागडण्याच्या वयात बलात्कार होतो. त्या मुलींना माहिती पण नसत बलात्कार म्हणजे काय? आपल्या सोबत काय घडतंय? 

    बलात्कार  म्हणजे काय ?  बलात्कार म्हणजे व्यक्तीच्या सहमतीशिवाय किंवा बळजबरीने लैंगिक संबंध प्रस्थापित करणे. त्याचबरोबर सामूहिक बलात्कार ही होत असतात आता सामूहिक बलात्कार म्हणजे काय? तर सामूहिक बलात्कार म्हणजे जर बळजबरी एकापेक्षा जास्त व्यक्तींनी केला असेल तर त्याला सामुहिक बलात्कार म्हणतात. बलात्कार करणे कायदेशीर गुन्हा आहे अणि तो सिद्ध झाल्यास त्याची शिक्षा ही कठोर आहे. तरीही बलात्कार वाढत आहेत. भारतात बलात्कार व सामूहिक बलात्काराच्या घटना वाढत चालल्या आहेत.त्याला कारणीभूत कोण?

     संविधानाने फक्त महिलांसाठी वेगळे कायदे तयार केले आहेत. तरी महिलाना का असे बलात्कार सहन करावे लागतात. सहन करून पण त्यांना न्याय का मिळत नाही त्यांचा गुन्हेगार मोकाट फिरत असतो . ही आपली नायप्रणाली….? बलात्काराच्या प्रकरणासाठी वेगळ न्यायालय हवंय जेणेकरून त्या गुन्हेगाराना लवकरात लवकर न्यायालयात हजर केले जाईल व त्याचा गुन्हा सिद्ध झाल्यास त्याला तात्काळ कठोर शिक्षा सुनावली पाहिजे.आणि त्यांना अशी शिक्षा दिली पाहिजे.फक्त माहिलाना दोष देण्या पेक्षा मुलाना ही स्त्री बदल आदर करायला शिकवल पाहिजे मुलगा आणि मुलगी याना आपल्या घरातूनच समान वागणूक दिली पाहिजे,जेने करुण त्यांना अशी भावना येणार नाही की कोण श्रेष्ट आहे.बलात्कार झालेल्या महिलेला न्याय मिळवून दिल्या नंतर पीडीतेला पुन्हा सन्मानाने जगण्यासाठी तिला सर्वानी प्रोत्साहन दिले पाहिजे शिवाय इज्जत हा जो प्रश्न आहे तो तिच्या योनी मुळे  नाही ही समज प्रतेकाने घेतली पाहिजे.

  • अक्षता बोले

स्वतंत्र नारी….

सर्व  संकटावर मात करून सोपा मार्ग काढणारी भूमिका

               . म्हणजे नारी ||

कलानुकाळ  प्रत्येक क्षेत्रात छबी उठवणारी भूमिका

                   म्हणजे नारी ||

धर्म ग्रंथ असो वा कथा संग्रह असो वा साहित्य असो

            नारी शिवाय पुर्ण होणार नाहीत कधी. 

                            मग  !

              कोण म्हणतं नारी स्वतंत्र नाही |

    जगावर राज्य करणारी राणी  व्हिक्टोरिया  नारीचं  होती |

      परिस्थिवर मात करून  सतीच्या चालिला  विरोध करून

      स्वराज्यात झोकून देणारी जिजामाता  नारीच होती | 

                 स्वतंत्र लढ्यात झोकून देणारी 

                 लक्ष्मीबाई नारीच होती | 

         परिस्थिवर मात करून शिक्षणाचा वारसा  जपणारी

                  सावित्रीबाई नारीच होती | 

        भारताची पंतप्रधान इंदिरागांधी नारीचं होती |

                             नारी स्वतंत्र आहे.  

                                 म्हणुन,

                              ती चंद्रावर गेली  |

                              नारी स्वतंत्र आहे.  

                                     म्हणुन, 

                              ती राष्ट्रपती झाली |

                           नारी स्वतंत्र आहे. 

                                 म्हणुन,

                             ती अर्थमंत्री झाली | 

                अपंगांना अपंग म्हणुन मानसिकरीत्या अपंग करू नका . 

                                    तसेच,

               नारीला अबला म्हणुन अबला करू नका ||

          नारी स्वतंत्र आहे | स्वतंत्र राहील | स्वतंत्र राहणार ||

                              म्हणून म्हणतो..  

       सर्व संकटावर मात करून उत्तम  मार्ग काढणारी भूमिका 

                               म्हणजे  नारी ||

  • रमेश सारसकर

प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता- ‘माँसाहब जीजाऊ!

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के संबंध में जो मूल्य आवश्यक होते है; उसका जिक्र करना लाज़मी है। वह मूल्य आते कहाँ से है? उनका होना कितना अहम होता है? ऐसे कई सवाल अपने आप दिमाग में आते है। और इतिहास के पन्ने पलटने शुरू होते है। जनता का स्वराज्य निर्माण करते समय कौन से मूल्य मददगार सबित हुए होंगे? इसका जवाब हमें सोलहवी सदी के अंत में धीरे धीरे उभरते हुए दिखाई देता है। शाही रियासतों में भारत के मूलनिवासी लोग सेवा में इसलिए जुड़े थे, कि अपने भविष्य में आनेवाली कौम का गुजारा सही ढंग से हो सके। शाही रियासतों ने अपने बेहिसाब शान-ए-शौकत, दौलतमंदी के बलबुतेपर उनको अपने साथ जोड़ लिया। उन्होंने कई कर्तबगार तथा जाँबाज़ सिपाहियों को अपने रियासतों में सरदार, जहाँगीरदार तक बनाकर रखे हुए थे। यह लेख इतिहास के कालक्रम को केवल समावेशी विश्लेषण करके अपने शब्दों में बया करता है। 

स्वराज्य की नींव रखने की पहली पहल राजे शाहजी महाराज ने की थी, मगर स्वराज्य की संकल्पना लखुजीराजे जाधव और म्हालसाराणी के कोक से जन्मी जिजा के मनमस्तिष्क में आकार ले रही थी। जीजा का सफ़र माँसाहब जीजाऊ तक का मूल्य पर ही आधारित था। जीजा का जन्म 12 जनवरी 1598 में महाराष्ट्र के बुलढाना जिले के सिंदखेड़ गाव में हुआ था। जन्म से ही जीजा ने अपने पिता को निजामशाही के दरबार में मुजरा, कोरनिश करते देखा था। वह सोचती थी कि उनके गाव के महल में याने सिंदखेड़ में सभी सिपाही उनके पिता लखुजीराजे को आदर के साथ मुजरा करते थे। फिर निजाम के दरबार में मेरे पिता क्यों उनके सामने झुकते है। आत्मसम्मान का यह पहला दाखिला हो सकता है। उनके पिताजी ने उन्हें छोटी उम्र से ही हर कला से अवगत कराया था। इसलिए हिम्मत तथा निडरता जीजा के मन में ढाल की तरह मजबूत बन गए। शाही रियासती में जनता दहशत के मारे झुकती तथा सलाम करती मालुम होती थी। लेकिन तत्कालिन लखुजी राजे और मालोजी राजे उनको उनके सरदार आदर के साथ मुजरा तथा सलाम करते थे। यह भेद जब से जीजा को पता चला तब से अपने स्वराज्य की संकल्पना उसके मन में दृढ़ बनती गई। 

वेरुल के मालोजीराजे भोसले भी निजामशाही में एक ईमानदार जाँबाज़ जहागीदर के तौर पर थे। उन्होंने अपने बेटे शाहजी तथा शरिफजी को भी शौर्य की वर्णमाला बखुबी से सिखाई थी। जब शाहजी बड़े हुए, उनका विवाह जीजा से हुआ। आज तक केवल दूर से ही निजामशाही की सेवा करनेवाले दो मराठे जहागीरदार सरदार संबंधि बन गए। हमने “ तोड़ो और राज करो”  यह नीति अँग्रेजों के समय सुनी थी। पर इसका अमल सत्रहवी सदी के आरंभ से शुरू हुआ होगा, ऐसे इस परिपेक्ष में दिखाई देता है। सत्ता और दौलत के चक्कर में परिवार में ही गद्दारी करने पर इन शाही रियासतों ने जाधव-भोसले परिवार को मजबूर कर दिया था। आखिरकार शाही रियासती के मंसुबे इन भोसले–जाधव इन दो परिवार में फूट करने में कामयाब हो गए। इसी चलते कभी वे निजामशाही तो कभी मुघलशाही में जानेआने लगे। पर इसी दौरान शाहजी राजे और जीजाबाई अपने स्वराज्य निर्माण के काम में एकग्रता से जूट गए थे। जब शाहजी सेना के सरनौबत बन गए, तब तो इस अधिकार से उन्होंने अपनी जनता को जो दहशत में जी रही थी; उन सभी मराठे सरदारों को विश्वास दिलाया और अपनी जनता को हौसला रखने को कहा। उनका कहना था- जनता का स्वराज्य निर्माण के काम में आपकी एकता और विश्वास जरूरी है। इस काम में लोगों को जोड़ने के लिए वह बहुरुपियाँ तक बन गए थे। 

शुरुवाती दिनों खेत/जमीन का लगान बहुत ही बेरहमी से मुघलों ने वसुला था, आगे चलके निजामशाही भी उसी लुटालूट पर उतरी। जब आस-पास लुटालूट, दहशत, औरतों अब्रू लुटना, खुन-खराबे को आखिरकार ठुकराकर जनता इस उभरते स्वराज्य संकल्पक शाहजीराजे भोसले के पक्ष में खड़ी हुई। जिस जीजा ने इस कल्पना को साकार होते देखा उसे हम स्वराज्य जननी कहते है। उन्होंने हर एक इंसान को विश्वास के साथ साथ सुरक्षा भी प्रधान की। उनके हुनर देखकर नौजवानों को सेना में भरती होने की संधी उपलब्ध कराई। एक उदाहरण आप ने सुना होगा- जब जंगली सुवर और रनगवा खेतों का बड़ा नुकसान कर रहे थे, तब उन्होंने एक फर्मान जारी किया था। – अगर इन जंगली जानवरों को रोकने का कोई इंतज़ाम करेगा; उन्हें सुवर्ण मुद्राएँ दी जाएगी।“ इसके दुसरे ही दिन से नौजवान, जिगरबाज लोग आगे आने लगे। एक बार एक नौजवान रात के 12 बजे राजमहल में जंगली जानवरों का प्रबंध करके सबुत के तौर पर उस जानवर की पूंछ लेकर माँसाहब जीजाऊ से मिलने आया। समय रात का होने के कारण उन्हें जाने को कहा मगर वह जाने के लिए तैयार नहीं था। इस अनबन की आहट जब जीजाऊ माँसाहब के कानों तक पहुँची, तब वे बाहर आए। उसे पुछा- कल सुबह आते तो भी हम आपकी बहादुरी के लिए सुवर्ण मुद्राएँ देते थे। इतना विश्वास नहीं है? और साथ में ही उसका नाम भी पुछा – उसने कहा-  दानाजी मालुसरा, माँसाहब सुवर्ण मुद्रा के लालच में अभी नही आया हूँ। आपने दिया हुआ काम पूरा करने का सौभाग्य मुझे मिला, बस यही बताकर आपका आशिर्वाद लेने आया हूँ।“ इस जवाब से हम सोच सकते है। स्वराज्य निर्माण का काम कॅडरबेस था। आगे दानाजी स्वराज्य के सेना में सामिल हुआ। 

लगान माफ न करने के कारण गाव के सभी लोग जंगलों में भागते रहते थे, ताकि लगान से बच जाए। कोई दौलतमंद सरदारों का काफिला जाते दिखता तो वह उसे लुटते थे। आगे चलकर उन्हें घुमंतू, पारधि,रामोशी, के रूप में पहचाने जाने लगे। लुटपाट करने की एक ही वजह थी; खेत से आनेवाला अनाज लगान के रुप में शाही बादशाहओं को देना पड़ता था। गुजारा करने का कोई उपाय नही बचता था। तब जा के वह केवल डरा धमकाकर लुटते थे। पर जीजा ने उसे भी बदल दिया। कल तक जो जीजा थी वह अभी जनता के लिए माँसाहब जीजाऊ (आऊ याने माँ) बन चुकी थी। उन्होंने जरूरतमंदों को अनाज दिया, रोजिरोटी दी, स्वराज्य के काम में सामिल किया, ऐसे कई काम देकर जनता को अपना बनाया। औरतों का सम्मान और सुरक्षा महसूस  होने से उन्हें जनता से एक जनादेश मिलता गया। इसी बलपर स्वराज का निर्माण हुआ था। 12 जनवरी को माँसाहब जीजाऊ जन्मदिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस यह दोनों घटनाएँ मूल्य से अलग हो ही नहीं सकती है। जिस मूल्यों को हमने संविधान में बोया है, वही मूल्य हमें माँसाहब जीजाऊ के जीवन में दिखते है। समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, जैसे मूल्य आसानी से उनके जीवनी से दिखते है। पीड़ित जनता को समझकर- समझाकर बदलाव का विश्वास दिलाना, आज के चुनावी भाषणों  जितना आसान नही था। 

जनता के बात पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया, स्वराज्य को खड़ा करने में जिसकी जितनी क्षमताएँ उनको उतनी संधी, अवसर उपलब्ध कराया। लोगों में हिम्मत आयी और सुरक्षित जनता का स्वराज्य निर्माण हुआ। इस राजमाता की भुमिका केवल शाहजी राजे की पत्‍‌नी तक सीमित नही थी। जब सिंदखेड़ में बचपन की तालीम हों रहीं थी, तब से आत्मसम्मान की बातें जीजा करती आ रही थी। शाहजी राजे की पत्‍‌नी के रूप में जब वे थे, तब खौंपनाक उन शाही रियासतों के बीच जाधव और भोसले पारिवारिक कलह को मिटानेवाली निर्णायक व्यक्ति, स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षा, आदर, जैसे मूल्यों को हरवक्त दोहरानेवाली कुम्हार की कलाई थी; मानो किसी मिट्टी को आकार देकर सपने को साकार कर रही हो! आऊ के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के पीछे महाकाय कल्पतरू बनी थी। अपने सपनों को साकार करने में शिवबा को तैयार करनेवाली वात्सल्य जननी थी। उन्होंने शिवबा में सद्गुण, शौर्य, दूरदृष्टि, राजनीति, कुशल प्रशासक जैसे मूल्यों को बोया था। 

अक्सर हम कहते है- स्वराज्य संस्थापक शिवबा को जन्म देनेवाली जीजाऊ है। इसमें कोई दो राय नही है। हमने शिवबा की महानता को सराया है। पर स्वराज्य संस्थापक  होना, कोई आम बात नहीं थी।  इस स्थिती में शरिर से मस्तिष्क तक विचारधारा देना मूल्यों के बिना मुमकिन नही था। इसलिए स्वराज के विचार तथा संकल्पना की जननी माँसाहब जीजाऊ ही है। स्वराज रक्षक संभाजी के परवरिश में भी माँसाहब जीजाऊ का अमूल्य योगदान था। माँसाहब जीजाऊ का स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षितता, जनता के स्वराज्य की जननी तक का सफ़र अनोखा है। खेत में झुलनेवाले किसी भी अनाज के पत्ते को भी छुना नहीं, ऐसी ताकीद देना, हर औरत को माँ के समान समझना, हर सिपाही का हौसला बुलंद करने के लिए गले लगाना, इसी से ही जनता का स्वराज इतिहास के पन्नों पर सुवर्णमुद्रित हो सका। 

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता को स्मरण करना मौलिक अभ्यास से जुड़ा था। वह एकाधिकारशाही, राजेशाही जरूर थी, मगर जनता का जनाधार सरआँखों पर था। सामाजिक मूल्यों की वह अतुलनीय प्रणाली थी। मैं उस गणतंत्र को आज के लोकतंत्रात्मक गणराज्य के भारत से मिलता-जुलता पाता हूँ। संवैधानिक भारत के निर्माण में मूल्याधारित सक्रिय नागरिकों को तैयार करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। माँसाहब जीजाऊ ने जो सत्रहवीं सदी में साकार करवाया, शायद हमें उस सुवर्ण इतिहास में एक और बार दौरा देना होगा। जिससे हम इस आधुनिक भारत में कॅडरबेस जनता निर्माण कर सकें।   

धन्यवाद 

अमित शालिनी शंकर पवार 

सामाजिक परिवर्तनासाठी समाजाला आरसा दाखवणे गरजेचे!

सेंटर फॉर प्रोमोटिंग डेमोक्रसी सीपीडी संस्था तर्फे आपल्या सर्वांना संविधान दिनाच्या मनःपूर्वक सदिच्छा !

ऐसा भारत बनाऐंगे युवकांद्वारे लिहिले जाणारे अनियतकालिक आहे. ज्यात युवक युवती त्यांच्या लेखणीतून समाजातील वेगवेगळ्या घटकांना उजागर  करत आहे. व भारतातील सध्य परिस्थिति, राजकारण, वाढते खाजकीकरण यांवर युवक त्यांचे विचार मांडत आहे. 

ऐसा भारत बनाऐंगे अनियतकालिकेची सुरुवात १० डिसेंबर, २०१९ रोजी मानव अधिकार दिनानिमित्त झाली. व आतापर्यंत एकूण ८ आवृत्या प्रकाशित करण्यात आल्या आहेत. 

ऐसा भारत बनाऐंगे ची ही ९ वी आवृत्ती. आज २६ नोव्हेंबर, संविधान दिन निमित्त प्रकाशित करित आहोत. व त्या करिता ऐसा भारत बनाऐंगेच्या अनियकालिकेत लिहिणाऱ्या व नव्या युवक लेखकांसोबत ऑनलाईन सत्र घेण्यात आले. आपण, काय लिहावे, कसे लिहावे, कधी द्यावे यावर चर्चा केली. येत्या काही दिवसांत येणारे विधानसभा निवडणूक आणि सध्याचे राजकीय वातावरणावर चर्चा झाली. शेतकरी आंदोलन, आजच्या काळातील स्त्रीवादी चळवळ, पत्रकारिता, सोशल मीडिया, राम मंदिर, धन्यवाद मोदी मागील राजकारण, शिक्षण, रोजगार अशा अनेक ज्वलंत मुद्यांवर संवाद झाला. व सध्य स्थिति वर आधारित लेख, कविता, पत्र, किंवा अन्य कोणतेही लिखित, चित्रित माध्यमांद्वारे आपले लिखाण मांडू शकतो असे निश्चित झाले. 

भारतीय संविधानाने भारताच्या प्रत्येक नागरिकाला हक्क अधिकार बहाल केले आहे. प्रस्ताविकेतील आपले मूलभूत हक्क, अधिकारांची थोडक्यात माहिती कवितेद्वारे मांडण्यात आले आहे. गिरणीकामगार, खाजगीपण, विकास, महागाई यांसारख्या मुद्यावर लिखाण युवकांनी केले आहे. आणि फक्त लिखाणच नाही तरी एक सकारात्मक दृष्टिकोण लोकांपुढे मांडण्यात आला आहे. 

भारताचा इतिहास तर आपण सर्वांनाच माहीत. वर्ण व्यवस्था, जाती व्यवस्था, लिंग भेदभाव आणि बरेच.. माणसाला माणूस म्हणून जगण्यापासून बंदिस्त करीत होती. आणि या बंधनातून मुक्त, ‘आझाद’ होण्यासाठी भारतीय संविधानाचे मोलाचे स्थान आहे. आपले हक्क अधिकार कोठे दाबले जात असतील तर त्यावर आवाज उठविण्याचा आपला पूर्ण अधिकार आहे. आणि त्याचे जीवंत उदाहरण म्हणजे ‘शेतकरी आंदोलन.’ ऊन, वारा, पाऊस कशालाही न घाबरत, न डगमगता सरकारच्या चुकीच्या निर्णयाविरोधी आंदोलन करून जित मिळवली आहे. आणि हे कौतुकास्पद आहे. सिपीडी संस्थेच्या वतीने व ऐसा भारत बनयेणगे च्या सर्व लेखिका व लेखकांद्वारे सर्व शेतकऱ्यांकचे खुप खुप अभिनंद! आंदोलन मानवी हक्क मिळवून घेण्याचं एक पर्याय आहे.

ऐसा भारत बनाऐंगे द्वारे युवक अशा सामाजिक मुद्यावर वाचा फोडत आहेत. व हे सर्व लिखाण आपल्या सर्वांकरिता वाचण्याकरीता उपलब्ध आहे. 

संपादन –
पूजा कांबळे/विशाल जाधव (सीपीडी साथी)

#हमारा_आत्मा_हमारा_संविधान

देश के हर व्यक्ति को महत्व दिया उसने, लोगों के बीच के अंतर को मिटा दिया उसने,

धर्म जाती की असमानता को  खत्म किया उसने, कानून के सामने सभी को समान बनाया उसने,

छोटे से लेकर बड़े तक सभी को अधिकार दिया उसने,

सभी में भाईचारे का भाव जगाया उसने…

देश पर कोई दबाव नहीं होगा और वह पूरी तरह से मुक्त होगा यह सोचा है उसने।

समाजवाद मूल्य को अपनाकर, आमिर और गरीब के बीच के अंतर को मिटाने का मार्ग दिया उसने।

देश की सरकार धर्मनिरपेक्ष होगी और,

देश को लोकतंत्रात्मक गणराज्य के रूप में बनाया जाना चाहिए यह ऐलान किया है उसने…

हर व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिया उसने,

भाषण हो, गीत हो, नाटक हो, लेखन हो, सभी को अभिव्यक्त होने का अधिकार दिया उसने…

विचार, विश्वास, श्रद्धा और उपासना मतलब अपने धर्म की पूजा करने, दूसरों के धर्म की पूजा करने और किसी भी धर्म की पूजा न करने की स्वतंत्रता का अधिकार दिया उसने…

प्रतिष्ठा और अवसर की समानता हर एक व्यक्ति को मिले इसलिए इंसान होने के नाते सबको महत्व दिया उसने. 

राष्ट्र की एकता और अखंडता बनी रहे, हर एक व्यक्ति एक दूसरे के साथ सद्भाव से रहे इसलिए लोगों में भाईचारे का भाव जगाया उसने,

आप सब के सामने यह सवाल आया ही होगा की ऐसा कौन है जो यह सब हमें प्रदान करता है?

वो कोई और नही, वो हमारा भारतीय संविधान है, हमारा स्वाभिमान है।

जो हम सबका आत्मसन्मान है

हम सबने उसे २६ नवंबर १९४९ को खुद को समर्पित किया है।

संविधान हम सब की आत्मा है। 

इसलिए कहती हु की….

नागरिक होने के नाते हम सबकी एक ही जिम्मेदारी… 

चलो उठो,

संविधान को समझो, इसे अपनाओ और इसके मूल्योंको घर घर पोहोचाओ…

– एड्. अनुराधा नारकर

आज उसका सौदर्य द्वंद का आधार बना जो कभी एक मनमोहक था।

दो ऐसे गुट है। जो द्वंद के घेरे में बाध्य हुए पड़े है। 

और राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सोझ करने के लिए बड़ी ललकता और लुभाउक्ता से राजनीति मे दाव पेज लड़ाते है। 

उनके शतरंज का पासा बनकर लोग उनके चौपालों पर नाचते हैं।

मैंने उस द्वंद के अग्नि को भड़केत हुए देखा। 

मैं चाहकर भी उस द्वंद को रोक ना पता। 

मैंने उस द्वंद को भाप लिया था। 

इस द्वंद्व को रोकने का सामर्थ्य मुझमे नही था। 

मेरे अकेले का प्रबल उस भीमकाय द्वंद के समकक्ष एक तिनका था।

इस द्वंद से निकलने में केवल बौद्धिकता की प्रबलता ही एक मात्र मार्ग थी। 

धीरे – धीरे उस द्वंद की अग्नि लोगो को अपने लपेट में लेते जा रही थी।

 आहुतियों की अग्नि, एक विशाल अग्नि कुंड में परिवर्तित हो रही थी।

एक रंग के द्वंद्व में मस्त। दूसरा विलाप के द्वंद्व में मस्त। तीसरा संजय की तरह द्वंद्व को देखने मे द्वंद्व की दिव्या दृष्टिता में मस्त। 

ना तो ये नारायण सेना थी। नही परमात्मा की सेना थी। ये तो सेना थी। केवल मस्तिष्क में भरे वीभत्स विचारों की थी । जो विचारों को कुरेद के बानी गई थी। जिनसे जीवन मे व्यप्त भावो को सूखी मृदा के समान सूखा दिया था। इस द्वंद्व का बीजा रोपण मस्तिष्क में उत्तपन्न किया गया। जो मानसिक द्वंद्व से एक सामाजिक द्वंद्व बन गया।

अधर्म धर्म का चोला पहने हुए रण में खड़ा था। आवाहन और शंखों की ध्वनि इस तरह थी। कि पराजय किसी एक समुदाय और मानवता का निश्चित ही था। रण क्षेत्र मे द्वंद्व बाहे फैलाए एका- ऐक- एक – एक को अपने भीतर समाए लिए जा रहा था।

– इशाद शेख…

दमन के साथीदारों,

आप शायद भूल रहे होंगे,

आपकी पहचान भी हमसे जुडी है।

लाख कोशिश कर दो,पहचान मिटाने की; 

किसी अंश के, सुराग के रूप मे जिंदा हम है।

आजादी के मायने बदलते होंगे आपकी नजरों मे,

हम आज नहीं, सदियो से ही आझाद है।

बस हमारी इस चुप्पीयों को पतन मत समझना!

दुनिया का कोई भी भूतकाल पलटकर देखो, 

हमने ही इतिहास रचा है।

हे दमन के साथीदारों, हिंसा को हमने ‘करुणा’ मे तब्दील किया है।

सबूत चाहिए होंगे, तो जमीन खुद कर देख लेना;

“अहिंसा का तथागत” तुम्हारी करतूद पर स्नेह भरी निगाहों से क्षमा कर रहा है।

एक दिन मारने, गाडने के लिए कुछ भी नही बचेगा,

फिर भी आप खुद को तब किसी गड्डे में दफनाकर लोगे।

हे दमन कि साथीदारों, हमारी चुप्पी को दुर्बलता मत समझना;

इससे युद्ध टले है, नर-नारी संहार टला है।

और सिर्फ बचे है समता, स्वतंत्रता, बंधुता,न्याय, करुणा, मैत्री, जैसे मानवीय मूल्य ।

– अमित शालिनी शंकर पवार

बोक्या…

या देशातच काय तर जगात शहरं वसली ती म्हणजे कामगारांच्या घामावर, त्यांच्या रक्तावर. त्यांच्या स्वप्नांच्या मढ्यावर वसलेली ही शहरं मात्र कामगारांच्या स्वप्नांची राख करून त्यांना साफ विसरली. कामगार वर्गाच्या कित्येक पिढ्यांचा इतिहास डोळेझाक करत दुर्लक्षित करणाऱ्या शहरांपैकी मुंबई हे आपल्या फार जवळचं, जवळचं म्हणण्यापेक्षा आपलं शहर.  कित्येकांनी आपल्या कपाळाला गावची माती लावत शहरं गाठली आणि उद्योगांनी समृद्ध असलेल्या या आपल्या मुंबई शहराला सोन्याची मुंबई बनवण्यात आपलं योगदान दिलं.

          गणपत जाधव हा सुद्धा असाच कोकणची आपली जन्मभूमी सोडून आपल्या कुटुंबासमवेत मुंबईच्या उदरात आपला उदरनिर्वाह करायला आलेला. कित्येक मेंढरांच्या ताफ्यात नवं मेंढरू शामील व्हावं तसाच हा सुद्धा खाली मान घालून मुकाट्यानं मेंढरांच्या ताफ्यामागे चालायला शिकला. मोठ्या कष्टानं डोक्यावरचं छप्पर उभं करून त्याने कुटुंबाला आसरा केला. साधीच बायको आणि पदरात इवलंसं कोकरू घेऊन त्याने मुंबईच्या काळजात, गिरणीत जागा मिळवली. पदारातलं लेकरू जसजसं वाढू लागलं तसतशी भविष्याची स्वप्नं मोठी होऊ लागली. गावात चाकरमानी म्हणून मान मिळू लागला. मुलाचं शिक्षण, संसाराच्या गरजा यात गुरफटलेल्या गणपतला स्वतःच्या आयुष्याचा जणूकाही विसरच पडला. त्याचं सगळं जग संसाराच्या गरजा, मुलाचं भविष्य आणि गिरणीचा भोंगा यांमध्ये गुरफटलेलं असतानाच त्याला आयुष्य हादरवून टाकणारी बातमी सामना मध्ये वाचायला मिळाली. इतर गिरणी कामगारांची झालेली तीच गत त्याच्या नशिबी आली होती. सामनामध्ये वाचायला मिळालेल्या गिरण्यांना टाळा लागण्याच्या बातम्यांवर हळहळ व्यक्त करणारा गणपत तो स्वतः काम करत असलेल्या गिरणीला टाळा लागणार या बातमीने मात्र पुरता खचला. त्याला त्याचा मनकाच मोडल्या सारखं झालं.

          दिवसामागून दिवस गेले. आंदोलनं करणाऱ्या कामगार संघटना हळूहळू कात टाकू लागल्या. पण याचा मात्र दृढ विश्वास होता तो म्हणजे त्याच्या सारख्या शेकडो-लाखो कामगारांनी हे शहर समृद्ध होण्यासाठी रक्ताचं पाणी केलं त्यांच्या कष्टाचं चीज झाल्याशिवाय राहणार नाही. या नुसत्या आशेवर पोट भरण्यासाठी मिळेल ती कामं करत तो कितीतरी वर्षे जगत राहिला. पदरातल्या पाखराने शेवटी वयात आल्यावर पंख पसरवण्यासाठी नवीन आभाळ शोधलं. पुन्हा कधीच परतून न येण्यासाठी त्याचे पंख झेपावले तेव्हा गणपतच्या घरात इवल्या डोळ्यांच्या, कानावर पांढरे चट्टे असलेल्या, रुबाबदार आणि गोंडस बोक्याने जागा अडवली आणि पोटच्या लेकरासारखं तो त्या उभयतांवर, त्या घरावर हक्क गाजवू लागला.

          कित्येक वर्षांची झुंज देऊन सर्वस्व हरवलेल्या गणपतचा आयुष्यातला शेवटचा आधार म्हणजे त्याची अर्धांगिनी गेली तेव्हा त्याला वार्धक्याने घेरलं होतं. सोबत उरला होता तो म्हणजे गेल्या चौदा वर्षांपासून सोबत राहिलेला बोक्या. बायकोच्या शेवटच्या वेळेत त्याच्यासोबत कर्तव्यदक्ष मुलासारखा हॉस्पिटलच्या वाऱ्या करणारा बोक्या त्याला मुलापेक्षा जवळचा वाटू लागला. कित्येक आश्वासनांना बळी पडलेल्या कामगार वर्गाकडे बघून गणपतला त्यांची आणि स्वतःची कीव येऊ लागलेली. ‘गिरणी कामगारांना मिळणार सरकारी घरं…?’ ही बातमी दर दोन चार महिन्यांनी वृत्तपत्रांमधून झळकू लागली यालाही आता किती वर्षे होऊन गेली ही आकडेमोड त्याची त्यालाही जमेना.

          सरकारी कचेरीत जमतील तेवढी कागदपत्र जमा करूनही हाती काही लागणार नाही हे लक्षात आलं तेव्हा त्याने जगण्याची आसच सोडली. पण मरणही नशिबात नव्हतं. तो आत्महत्या करण्याचा निर्णय घेऊन शेवटच्या क्षणांच्या प्रतीक्षेत रेल्वे ट्रॅकवर आडवा पडलेला असताना बोक्या त्याच्या पावलांशी येऊन रेंगाळू लागला. त्याच्या छातीवर, मांडीवर नाक घासत विव्हळू लागला. त्याने त्याची कीव करत घर गाठलं. त्याच्या पोटाची भूक भागवली. डोळे मिटून दूध पिणाऱ्या बोक्याला पाहून त्याला त्याच्या आपल्यावरच्या विश्वासाचं जेवढं नवल वाटलं तेवढंच आपल्या परिस्थितीने हतबल असल्याचा राग येऊ लागला. पण मरण्याची हिंमत चेपली होती.

          गणपतला गिरणी कामगारांना मिळणाऱ्या घरांमध्ये घर मिळणार असल्याची बातमी मिळताच मुलगा बायको मुलांसहित परतला. पण बरीच वर्ष एकाकी जीवन जगलेला गणपत त्या सगळ्यांच्या खूपच पलीकडे निघून गेला होता. वार्धक्याने वेढलेल्या गणपतला हृदय विकाराचा झटका आला तेव्हा तो सरकारी कचेरीत शेवटचा रकाना भरण्यात व्यस्त होता. दुखऱ्या छातीवर हात ठेवून त्याने शेवटच्या रकान्यात अडीच अक्षरं लिहिली. वारसदार – #बोक्या…

– नागराज पद्मा कौतिकराव 

विकास की परिभाषा !

ना जाने क्यूं बदल गई है देश की सूरत

और बदल गई है सबकी अभिलाषा । 

रोज़ महंगाई  की मार झेलती 

रोज हाथ लगती है निराशा । । 

हर शख्स खुद में ही उलझा हुआ

खुद से लड़ता खुद को देता दिलासा । 

मन ही मन में खुद से हर शक्स सवाल करता 

वाह रे विकास क्या यही है तेरी परिभाषा । । 

जो कर रहे है देश के विकास करने के वादे 

पर अब वो खोखले और झूठे नजर आते हैं। 

जो देश का मासूम बचपन हैं

अब किसी पटरी पर जीवन बिताते हैं । । 

रोज नई कहानी सुनकर कभी,

किसानों के साथ मनमर्जी की, कभी अत्याचारों की । 

कहीं कर्ज में डूबा किसान, 

तो कहीं किसानों की आत्महत्या की बातें,

पर फिर भी देश के अन्नदाता को वो खालिस्तानी और एंटी नैशनल कहते हैं । । 

हर किसी के नम हो जाती है आंखे । 

कभी मन विचलित, तो कभी होती है मन में निराशा,

सुन कर कलंकित होती विकास की परिभाषा । । 

मातृभूमी भी रोज शर्मसार होती हैं

देख कर इन नेताओं का तमाशा । 

कहता है इंसान वाह रे विकास क्या यही है तेरी परिभाषा । 

राम राज्य का सपना दिखा कर वो 

रोज अपनी ही मर्यादा का अपमान करते हैं । 

झूठे आश्वासन और वादों को हथियार बना कर,

विकास का बहुरूपिया रंग का चोला पहनाते हैं । । 

जात पात धर्म के नाम पर लोगों को उकसाते हैं

रोज एक नई कहानी और वही पुराना तमाशा,

मन में कई सवाल उलझनों से भरी,

रोज मिलती है खुद से निराशा,

चलती फिरती गिरती उठती,

शायद यही है विकास की परिभाषा । । 

वाह रे विकास क्या यही है तेरी परिभाषा, 

क्या यही है तेरी परिभाषा.! ।  

                          –    सुजीत अनुराग

प्रिय संविधान,

आज तुझ्यासाठी व्यक्त व्हावस वाटतंय म्हणूंन मनात विचार आला कि तुला पत्रचं लिहावं त्यामुळे माझ्या मनात असलेल्या भावना तुला थेट व्यक्त करण्याचा हा छोटासा प्रयत्न. 

“हे संविधाना तू सत्तरीचा आणि मी तिशीची, तरी पण काय भारी जुळली आहे मैत्री आपली”.  तुला खर खर सांगू तर हल्ली मला तू खूप आवडू लागला आहेस, इतका की तुझा सहवास मी अनुभवतेय, तू आणि तुझ्यातील मूल्ये मला खूप भावतात आणि ती आता माझ्या जगण्याचा भाग होत आहेत, त्यांच्यासोबत जगण्याचा म्हणजेच माझा माणूसपणाचा प्रवास सुरु झालाय आणि हाच प्रवास मला सर्वांना निरपेक्ष प्रेम देण्याची दिशा देतोय. तुला खर सांगू तर मी लहान म्हणजेच दुसरी इयत्तेत असल्यापासून तुझी प्रास्ताविका वाचतेय अगदी तोंडपाठ होती मला ती , शिक्षकांनी माझा आवाज चांगला म्हणून रोज सकाळी शाळेच्या प्रार्थनेत तुझी प्रास्ताविका वाचण्याची जबाबदारी माझ्यावर सोपवली होती, मला त्यातल्या शब्दांचा अर्थ तर काहीच नाही कळायचा, पण तुझ्यातला प्रत्येक शब्दाचा बिनचूक उच्चार करायचे आणि एका लयीत तुला म्हणायचे, तेव्हापासूनचं मला तू जवळचा वाटला होतास फक्त मी आणि माझ्या शिक्षकांनी तुला कधी समजून नाही घेतलं. पुढे शाळेत इयत्ता सातवीत तुला अजून खोलात वाचता आलं पण तिथे सुद्धा मला परीक्षेत 25 मार्क मिळावे इतकंचं तुला वाचण्याचा प्रयत्न केला आणि इथे सुद्धा तुला समजून घेण्याची संधी मिळाली नाही. पुढे एल. एल. बी.च्या प्रथम वर्षाला देखील तुझी पुन्हा भेट झाली, पण तुझी भीती दाखवणारे तुला खूप कठीण म्हणणारे असे अनेक जण भेटले, आणि माझ्या मनात तुझ्याबद्दल ची दहशत तयार झाली, इतकी की तुझं नाव काढलं की भीतीच वाटायची, सर्वजण म्हणायचे की तुझ्या विषयात सगळे नापास होतात इतका किचकट आणि न समजणारा आहेस तू त्यामुळे तुला तितक्या मनापासून वाचलेच नाही मी, तरीही मला तुझ्याच विषयात उत्तम गुण मिळाले. तेव्हा पासूनचं  कुठेतरी तुझ्यात आणि माझ्यात काहीतरी असं जवळच नातं आहे जे नेहमी मला तू जवळ असल्याचा भास देत राहतं असंच वाटत राहिलं , पुढे संविधान प्रचारक लोकचळवळ मार्फत तुला भेटण्याची संधी पुन्हा मिळाली, असाही तू लहानपणापासून माझ्या जवळ होताच पण ही भेट मात्र अविस्मरणीय ठरली, इथे आपल्या मैत्रीचा प्रवास सुरु झाला तो कधीही न संपण्यासाठीच…या प्रवासात काही महत्वपूर्ण गोष्टी समजल्या ज्या तुझ्या असण्याला अर्थ देतात. जसे की प्रत्येक देशाचं स्वतंत्र असं संविधान आहे, जे आपल्या भारत देशाला सुद्धा तुझ्या रूपात मिळालं. पण आपलं भारताचं संविधान हे जगातलं खूप मोठं संविधान आहे. 

आपल्या भारतीय संविधानाची म्हणजेच तुझी विशेषता आहे कि तू प्रत्येक व्यक्तीचा विचार करतो, तूझ्यावर कोणाएका व्यक्तीचं, धर्माचं वर्चस्व नाही. देशातल्या प्रत्येक व्यक्तीला समोर ठेऊन तुझी निर्मिती केली गेली आहे. प्रत्येक व्यक्तीने तुला अंगीकृत आणि अधिनियमित करून स्वतःला २६ नोव्हेंबर १९४९ रोजी अर्पण केलं आहे. आम्हा सर्वांचं नेतृत्व तुझ्या रूपात होतंय आणि त्यातून सर्वसमावेशक असल्याची भावना येते हे खरंच अभिमानस्पद आहे. तुझ्या प्रेमात पडण्याचं हेच तर खूप मोठं कारण आहे. हल्ली मला तुझ्याशिवाय काहीच सुचत नाही, तुझ्यामुळे मिळालेल्या स्वातंत्र्याच्या अधिकारामुळेच तुझ्यावरचं प्रेम जाहीरपणे व्यक्त करू शकतेय याचा मला खूप आनंद होतो आहे.

तुझ्यामुळे माणूस म्ह्णून जगता येतंय, आणि तुझ्यामुळेच व्यक्ती म्ह्णून सर्वानाच हक्क आणि कर्तव्य जन्मापासूनच मिळाली आहेत. तू ३९५ कलमांनी नटलेला आहेस, तुला घडवण्यात ज्या ज्या संविधानकर्त्यांनी आणि संविधानाच्या शिल्पकारांनी मेहनत घेतली आहे त्यांना मनापासून सॅल्यूट, आजवर तुला समजून घेण्यात आम्ही व्यक्ती म्हणून, या देशाचे नागरिक म्हणून खरंच कमी पडलो आहे. पण मी तुला आज मनापासून वचन देते कि तुला समजून घेण्यासाठी तुझ्यातील मूल्ये लोकांपर्यंत पोहोचवण्यासाठी मी नेहमी तत्पर असेन. तुझ्यामुळे माणसामाणसांमधली विषमता पूर्णपणे संपली, तुझ्यामुळे सन्मानाने जगण्याचा अधिकार मिळाला, आणि त्यामुळेच तू माझ्या नसानसामध्ये भिनतोयस तुझ्यावर असलेल्या ह्याच प्रेमामुळे तुला प्रत्येक व्यक्तीपर्यंत घेऊन जाण्याची जबाबदारी माझी आहे असं मी समझते. त्यामुळे या प्रवासात मी तुझ्या सोबत नेहमी असेंन आणि तू तर माझ्या अंतिम श्वासापर्यंत माझ्या सोबत आहेच. माणूस म्ह्णून घडण्यासाठी तुझं प्रत्येकाच्या आयुष्यात असणं खूप गरजेचं आहे आणि त्यामुळेच हा देश तू दिलेल्या मूल्यांनुसार घडणार आहे अशी मला मनापासून खात्री आहे. 

आयुष्याच्या या प्रवासात न्याय  स्वातंत्र्य, समता आणि बंधुता हि मूल्ये जनमानसात रुजविण्यासाठी आपण एकमेकांसोबत असू हेच वचन तुला…. 

लव्ह यु, 

तुझीच अनु

– एड्. अनुराधा नारकर

भय इथले संपत नाही….!

“सारे जहॉं से अच्छा, हिंदोस्ता हमारा…” 

हे वाक्य कानावर पडत अन गर्वाने छाती फुगून येते. भारतमातेच्या पवित्र कुशीत जन्म घेतल्याचा आनंद चेहर्‍यावर ओसंडून वाहू लागतो. मला वाटत जगात आपलाच देश असेल ज्याला आईचा दर्जा मिळाला आहे. म्हणूनच आपला देश भारतमाता म्हणून ओळखला जातो. देशाच्या नावाप्रमाणेच या भारतभूमीत राजमाता जिजाऊ, सावित्रीबाई फुले, राणी लक्ष्मीबाईंसारख्या अनेक लढवय्या स्त्रिया होऊन गेल्या, ज्यांनी आपल्या असामान्य कर्तृत्वाने देशाच्या जडणघडणीत स्त्रिया सुद्धा मागे नाहीत हे सिद्ध केले होते. म्हणूनच या पवित्र भारतभुमीला कर्तबगार स्त्रियांचा समृध्द वारसा लाभला आहे.

या सगळया पाश्र्वभूमीवर अलीकडच्या काळात स्त्रियांवरील वाढते अत्याचार आणि बलात्काराने देशात खळबळ माजवली आहे. आज एकविसाव्या शतकात ही स्त्रीला तिच्या स्वातंत्र्यासाठी, सुरक्षिततेसाठी संघर्ष करावा लागत आहे, ही अत्यंत लाजिरवाणी बाब आहे. देशात दररोज बलात्काराच्या, अत्याचाराच्या घटना वाढत आहेत. बलात्कार शब्दाचा अर्थही माहीत नसलेल्या लहान मुलींपासून नोकरी करणार्‍या स्त्रियांनाही भीतीच्या वातावरणात जगावे लागत आहे.

या सर्व प्रकाराला देशातील न्यायव्यवस्था जितकी कारणीभूत आहे, तितकीच देशातील मीडियासुद्धा कारणीभूत आहे. लोकशाहीचा चौथा आधारस्तंभ म्हणवणाऱ्या देशातील मिडियाने अलीकडच्या काही वर्षात असंवेदनशीलतेचा कळसच गाठला आहे. सतत सत्ताधारी पक्षाला पाठीशी घालणारी मीडिया अनेक बलात्कार प्रकरणात आरोपींनाच पाठीशी घालताना दिसते तेव्हा तुमच्या माझ्या सारख्या सामान्य नागरिकांचा संताप अनावर होतो. 

या सगळ्यावर कळस ठरलेली घटना म्हणजे उत्तरप्रदेश मधील हाथरस प्रकरण. एका 19 वर्षीय मुलीवर अमानुष अत्याचार केला जातो, तिच्या शरीराचे लचके तोडले जातात. प्रकरण समोर आल्यानंतर आरोपींना अटक करण्याऐवजी खुद्द पोलीसच हे प्रकरण दाबण्यासाठी पीडित मुलीच्या कुटुंबियांना कळू न देता मध्यरात्रीच पीडितेच्या मृतदेहाला अग्नी देऊन टाकतात. मन सुन्न करणारी आणि माणुसकीला काळिमा फासणारी ही घटना रामराज्य म्हणवणाऱ्या उत्तरप्रदेश मधील आहे. आजपर्यंत देशाने इतका  भयानक आणि अमानवी प्रकार यापूर्वी कधीही पाहिला नव्हता. याला आरोपींचे समर्थन करणारी, सत्य बाहेर न येण्यासाठी प्रयत्न करणारी मीडियासुद्धा तितकीच जबाबदार आहे. 

मुळात बलात्कार झाल्यानंतर त्याची जात धर्म पक्ष न पाहता आरोपी म्हणूनच कारवाई झाली पाहिजे. यासाठी देशातील मीडियाने संवेदनशीलता दाखवत आवाज उठवणे गरजेचे आहे. तरच देशातील महिला सुरक्षित वावरू शकतील. यासाठी स्वतःला सुशिक्षित, सुसंस्कृत समजणार्‍या नागरिकांनी पुढे येऊन आवाज उठवणे गरजचे आहे, एकजूट होऊन याविरोधात लढा देणे गरजेचे आहे. तरच आपण अभिमानाने जिजाऊंचा, सावित्रीबाईंचा वारसा सांगू शकू. नाहीतर परस्त्रीला आई मानणार्‍या, गाईला माता समजणार्‍या या सुजलाम सुफलाम सुसंस्कृत गांधीच्या, आंबेडकरांच्या शिवरायांच्या भारतात जन्म न मिळण्याची प्रार्थना मुलींना कराव लागु नये अन   दररोज आपल्यावरही DP काळे करून निषेध व्यक्त करण्याची, मेणबत्ती घेऊन श्रद्धांजली अर्पण करण्याची वेळ येऊ नये बस इतकच…!

गंगाप्पा पुजारी

‘सद्यकालीन पत्रकारिता’

पत्रकारितेला समाजाचे दर्पण म्हंटले जाते. दर्पण म्हणजे आरसा, समाजातील सत्यतेचे प्रतिबिंब हे वृत्तपत्रांमध्ये आणि वृत्तवाहिणींमध्ये दिसते. म्हणून पत्रकारितेला समाजाचा आरसा म्हणून ओळखला जातो. १७८० मध्ये पाहिले वृत्तपत्र द बेंगॉल गॅझेट याची स्थापना झाली. पत्रकारितेचा जन्म हा नागरिकांवर होणाऱ्या अन्यायावर वाचा फोडण्यासाठी झाला.   

स्वातंत्र्यापूर्वी वृत्तपत्रे ही इंग्रजांची जी काही भारतीयांवर राज करण्याची पद्धत होती ही पद्धत कशाप्रकारे भारतीय जनतेला धोकादायक आहे. हे सांगण्याचे काम पत्रकारितेचे होते. सरकार व देशातील सामान्य जनता यांमधील दुवा म्हणजे पत्रकार होय. कोणत्याही जाती धर्माला किव्वा कोणत्याही स्तरावर बांधील न राहता समाजामध्ये चालू घडामोडीची खरीखुरी माहिती समाजासमोर मांडणे म्हणजे पत्रकारिता होय. समाजातील कोणत्याही स्तरावरील व्यक्तीवर अन्याय न होऊ देने व अन्याय झाल्यास त्या घटनेची शहानिशा करून सत्य समाजा समोर आणने हे पत्रकाराचे कार्य असते. स्वातंत्र्यापूर्वी देशातील सामान्य जनतेवर अन्याय मोठ्या प्रमाणात होऊ लागला आणि याला विरोध करण्यासाठी अनेक समाजसुधारकांनी आपली विचारशैली सत्ताधारी वर्गाला समजण्यासाठी वृत्तपत्रांची स्थापना केली. 

वृत्तपत्रांनी स्वातंत्र्य चळवळीत मोठ्या प्रमाणावर सामाजिक बदल घडवून आणण्याचे काम केले. समाजामध्ये अनेक सामाजिक बदल घडून यावे, रूढी, परंपरा, अंधविश्वास विषयी जनजागृती व्हावी यासाठी भारतातील लहान लहान विभागांमध्ये, तळागाळात साप्ताहिके, मासिक,वृत्तपत्रांची निर्मिती झाली. त्याकाळी बातमी लिहीत असताना बातमी निष्पक्ष असत. व बातमीत सत्यता, वस्तुनिष्ठता, पारदर्शकता, संवेदनशीलता  या महत्वाच्या मूल्यांचा वापर केला जात होता. कारण  पत्रकारांवर कोणत्याही राजकीय पक्ष किंवा सत्ताधारी पक्षाचे वर्चस्व नसावे व बांधिलकी नसावी. ही भूमिका आपल्याला स्वातंत्र्यपूर्व पत्रकारितेमध्ये दिसून येते. 

परंतु…आपल्याला सध्याचे पत्रकारितेचे चित्र हे पूर्वीच्या पत्रकारितेपेक्षा उलट दिसून येते. सन २०१४ पासून भारतातील सत्ताधारी पक्षाला देखील एका विशिष्ट व्यक्तीच्या नावाने ओळखले जाते आहे. काही वेळा पत्रकारिता देखील पत्रकारितेच्या मूल्यांचे उल्लंघन करताना स्पष्टपणे दिसून येत. आजच्या पत्रकारितेमध्ये समाजामध्ये नेमके काय चालले आहे,  हे दाखवले जात नाही. देशात दर दिवसाला संविधानिक मूल्यांचे मानवी अधिकारांचे हनन होताना दिसते. देशात मॉब लिंचिंग सारखा प्रकार घडून येत आहे. आणि यात पत्रकरांची भूमिका असावी टी दिसून येत नाही.   हक्कासाठी लढणाऱ्या शेतकऱ्यांना खलिस्तानी, देशद्रोही आतंवादि  म्हंटले जात आहे. बलात्कार, बालविवाह, स्त्रियांवरील हल्ले रोज मोठ्या प्रमाणात वाढत चालले आहेत. देशाचा पंतप्रधान मोठ मोठे आश्वासन देतो, विश्वास देतो, पण मानव हितावर आधारित कोणतेच काम करत नाही. सामान्य जनता आवाज एक करून प्रश्न विचारते, उत्तर मागते पण पत्रकारीतेची भूमिका आपल्याला दूर दूर दिसत नाही.  

आणि यातून कळून येते की आजची पत्रकारिता ही मोठमोठ्या नेत्यानं , त्यांच्या पक्षाला विकली गेली आहे. आणि म्हणून ते सत्य लिहिण्यास, सत्य मांडण्यास, सत्य बोलण्यास घाबरत आहे. आणि तोंडांळा कुलूप लाऊन अर्णब गोस्वामी बनत आहे. आणि  मुख्य प्रश्नांवर बोलणारी पत्रकारिता कुठेही दिसत नाही. हीच माझी खंत !

जाहिरातांनी आजची पत्रकारिता खाऊन टाकलीय. आणि पत्रकारीतेचे बाजारीकरण करून ठेवलय

– काजल बच्चे

मुंबई

“खासगीपण….”

“खासगीपण…” या शब्दातच किती हळूवारता आणि संवेदना जाणवते न..! सध्याचं जग हे आधुनिकतेचं जग आहे असं मानलं जातं किंबहुना ते तसंच आहे. आपण सगळेच “सोशल” झालेले आहोत. हो! अगदी सगळेच! सामान्यातल्या सामान्य घरात दहावी-बारावी शिकणा-या मुलांपासून ते आजी-आजोबांपर्यंत सगळेच सोशल मिडीयावर “सोशली सक्रीय” झालेलो आहोत. खरं तर ते असणं ही काळाची गरज ठरली आहे असं म्हणायला हरकत नाही. 

सणवार, रीतीभाती, परंपरा, वाढदिवस, आनंद-दु:ख, उत्साह, प्रेम, सहवास, ब्रेकअप-पॅचअप, लग्न-सोहळे ते अगदी निधनवार्ता..! अहो शेजारच्या घरात तो व्यक्ती शेजारी असून पाच पावलं न चालता आपण सर्रास मेसेज फॉरवर्ड करून सण साजरे करतो. प्रथेला, रीतीला, आपुलकीच्या भेटीगाठीनां देखील आपण सोशली सक्रीय होऊन हरवलं की..! यात वाईट काही नाहीये हो! किंवा चुकीचं देखील मुळीच नाही. पण याही पलीकडे जाऊन आपण आपल्याच हाताने खासगीपणाला सोशल मात्र केलं. पूर्वी चार-चौघात सांगितली जाणारी गोष्ट आता खुलेपणाने मांडली जाते. या खुलेपणाच्या स्वातंत्र्याचा एक फायदा आपल्याला नक्कीच झाला, ज्या गोष्टींवर चर्चा केली जात नव्हती, ज्या गोष्टी चुकीच्या पद्धतीने प्रथेच्या नावाखाली पाळल्या जात होत्या त्या रूढींना, चुकीच्या समजूतींना आळा बसला. चार पावलं पुढे जाऊन प्रगती करणारे आपण चाराची कितीतरी पावले पुढे गेलो आणि स्वतःभोवती असुरक्षिततेचं जाळं ओढून घेऊ लागलो. 

“खासगीपण” हा आपला मुलभूत अधिकार आहे. पण या अधिकाराचा वापर करताना आपण “गोपनीयता आणि खासगीपण” याचा फरक मात्र विसरत चाललो आहोत. राईट टू प्रायव्हसी हा खासगीपणाचा अधिकार आहे, गोपनीयतेचा नाही आणि हेच समजून न घेता आपण जगत आहोत. जेव्हा आपल्याच मुलभूत अधिकारांचे आपल्याकडून उल्लंघन होते तेव्हाच आपल्याला चपराक बसते. आणि हीच आपल्या समाजाची समज आहे किंवा याचा मनुष्यस्वभावाशी संदर्भ आहे  असं म्हणायला हरकत नाही.            

खासगीपणाचं भांडवल सोशली व्हायला लागलं आणि गुन्हेगारीचा सुळसुळाट सुरु झाला. गुन्हेगारी प्रवृत्तीला आळा बसण्याऐवजी गुन्हेगारी प्रवृत्तीला सुगीचे दिवस आले असं म्हणावं लागेल. पूर्वी तंत्रज्ञान विकसित झालेले नसताना गुन्हेगारी ही एका ठराविक साच्यामध्ये बांधली गेली असायची. उदाहरण द्यायचे झाले तर लहान-मोठ्या चोऱ्या, घरफोडी, जीवघेणा हल्ला, लूटमार अशा साचेबंद स्वरूपात गुन्हेगारी दडलेली असायची आता या गुन्ह्याच्या पद्धतीमध्ये देखील विकसन झाले आहे. शारीरिक लूटमार न करता सायबर हल्ला, ब्लॅकमेलिंग, प्रेम प्रकरणातून फसवणूक, तांत्रिक गुन्हे, सेक्स टुरिझम, ड्रग्स प्रकरण, पोर्नोग्राफी, घरगुती हिंसाचार, समाजमान्य बलात्कार,मानसिक असंतुलन, विकृतीचे वाढते प्रमाण अशा स्वरूपातील गुन्हेगारी सध्या दिसून येत आहे.

सोशल होणं, तंत्रज्ञानाचा वापर आपल्या फायद्यासाठी करणं यात गैर काहीच नाहीये. पण याच गोष्टीचा दुरुपयोग सर्वसामान्यांचे जीवन, राष्ट्राची सुव्यवस्था, अर्थव्यवस्था डळमळीत करू शकतो याचंही भान राखणं आपलं कर्तव्य आहे. जितक्या सहजतेने आपण सोशल मीडियावर आक्षेपार्ह, जातीय तेढ, अफवा अथवा एखाद्या व्यक्ती, समाजाबद्दल निंदा अशा आशयाचे संदेश टाकतो, फॉरवर्ड करतो तितक्याच सहजतेने चांगल्या गोष्टींच्या बाबतीत तत्परता आपण का दाखवत नाही..? साधारणत: सर्वसामान्य नागरिकांचा आपल्या समाजात असा समज आहे की, सायबर क्राईमशी आमचा काही संबंध नाही. आम्ही त्या फंदात पडतच नाही. पण याच समजामुळे नागरिक सायबर क्राईमबाबत अनभिज्ञ आहेत. पण जरा विचार करून पाहिलं तर आपल्याला रोजच या सायबर क्राईमचा सामना करावा लागतो आहे. आपल्या ई-मेलवर स्पॅममेल येत असतात, मोबाईलवर अनावश्यक कॉल, मेसेजेस येतात, नेट बँकिंग अकाऊंट असेल तर त्याचा पासवर्ड, आय. डी. हॅक होतो. हे सर्व प्रकार सायबर गुन्हेगारीमध्ये मोडतात. सायबर क्राईमबाबत अनभिज्ञ असणं हे एखादा गुन्हा करण्याइतकंच अपराधीपणाचं लक्षण आहे. 

                मानवाला मिळालेल्या स्वातंत्र्याच्या अधिकाराने मानव आत्मकेंद्री होताना सध्या दिसत आहे. मी, माझा, माझे, आमचे, आपले असं म्हणत माणूस ‘खासगीपणा’चा हक्क गाजवता गाजवता खासगीपणाबद्दलच्या सीमा ओलांडून पुढे चालू लागला. त्यात भरीस भर म्हणून तंत्रज्ञानाच्या डिजिटल भरारीने माणसामाणसांतील खासगीपणाच्या भिंती कोसळू लागल्या. खासगीपणावर झालेल्या या डिजिटल आक्रमणाची चर्चा सध्या जगभर सुरू आहे. समाजमाध्यमांपासून न्यायालयापर्यंत आणि राजकारणापासून कुटुंबापर्यंत प्रत्येक ठिकाणी खासगीपणा अर्थात ‘प्रायव्हसी’चा मुद्दा गाजत आहे. गोपनीयतेच्या, खासगीपणाच्या जुन्या समजुती आता कालबाह्य़ ठरू लागल्या आहेत. अशा वेळी आपला “खासगीपणा” जपण्यासाठी त्याकडे नव्या दृष्टिकोनातून पाहणं गरजेचं आहे.

– अनुजा मुळे

अहमदनगर

अभंग – संविधान

संविधान विश्व ।आत्मा  प्रास्ताविक 

होऊ संविधान मय । अंतरबाहय

जगूया स्वतंत्र । मिळवूनी न्याय 

बांधूया कावड । बंधुत्वाची

समतेचा विचार । स्वरूप सार्वभौम

दिली लोकशाही । सर्व जना

होऊ समाजवादी । मिळवूया हक्क

कर्तव्याची जाणीव । ठेऊनिया 

धर्मनिरपेक्ष देश। मानवता एक धर्म

जपुया स्वतंत्र। उपासनेचे

तोची एक विचार । एकतेचे सार

ठेऊया जोडुनी । राष्ट्राचीये एकात्मता

मूल्यांचे शिक्षण । देऊ सकलांसी

परम कर्तव्य । समजूनिया

झालो आम्ही धन्य । बनून नागरीक

त्रिवार वंदन । शिल्पकारा

– माधुरी शिंदे (सोनावणे)

बदलापूर