प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता- ‘माँसाहब जीजाऊ!

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के संबंध में जो मूल्य आवश्यक होते है; उसका जिक्र करना लाज़मी है। वह मूल्य आते कहाँ से है? उनका होना कितना अहम होता है? ऐसे कई सवाल अपने आप दिमाग में आते है। और इतिहास के पन्ने पलटने शुरू होते है। जनता का स्वराज्य निर्माण करते समय कौन से मूल्य मददगार सबित हुए होंगे? इसका जवाब हमें सोलहवी सदी के अंत में धीरे धीरे उभरते हुए दिखाई देता है। शाही रियासतों में भारत के मूलनिवासी लोग सेवा में इसलिए जुड़े थे, कि अपने भविष्य में आनेवाली कौम का गुजारा सही ढंग से हो सके। शाही रियासतों ने अपने बेहिसाब शान-ए-शौकत, दौलतमंदी के बलबुतेपर उनको अपने साथ जोड़ लिया। उन्होंने कई कर्तबगार तथा जाँबाज़ सिपाहियों को अपने रियासतों में सरदार, जहाँगीरदार तक बनाकर रखे हुए थे। यह लेख इतिहास के कालक्रम को केवल समावेशी विश्लेषण करके अपने शब्दों में बया करता है। 

स्वराज्य की नींव रखने की पहली पहल राजे शाहजी महाराज ने की थी, मगर स्वराज्य की संकल्पना लखुजीराजे जाधव और म्हालसाराणी के कोक से जन्मी जिजा के मनमस्तिष्क में आकार ले रही थी। जीजा का सफ़र माँसाहब जीजाऊ तक का मूल्य पर ही आधारित था। जीजा का जन्म 12 जनवरी 1598 में महाराष्ट्र के बुलढाना जिले के सिंदखेड़ गाव में हुआ था। जन्म से ही जीजा ने अपने पिता को निजामशाही के दरबार में मुजरा, कोरनिश करते देखा था। वह सोचती थी कि उनके गाव के महल में याने सिंदखेड़ में सभी सिपाही उनके पिता लखुजीराजे को आदर के साथ मुजरा करते थे। फिर निजाम के दरबार में मेरे पिता क्यों उनके सामने झुकते है। आत्मसम्मान का यह पहला दाखिला हो सकता है। उनके पिताजी ने उन्हें छोटी उम्र से ही हर कला से अवगत कराया था। इसलिए हिम्मत तथा निडरता जीजा के मन में ढाल की तरह मजबूत बन गए। शाही रियासती में जनता दहशत के मारे झुकती तथा सलाम करती मालुम होती थी। लेकिन तत्कालिन लखुजी राजे और मालोजी राजे उनको उनके सरदार आदर के साथ मुजरा तथा सलाम करते थे। यह भेद जब से जीजा को पता चला तब से अपने स्वराज्य की संकल्पना उसके मन में दृढ़ बनती गई। 

वेरुल के मालोजीराजे भोसले भी निजामशाही में एक ईमानदार जाँबाज़ जहागीदर के तौर पर थे। उन्होंने अपने बेटे शाहजी तथा शरिफजी को भी शौर्य की वर्णमाला बखुबी से सिखाई थी। जब शाहजी बड़े हुए, उनका विवाह जीजा से हुआ। आज तक केवल दूर से ही निजामशाही की सेवा करनेवाले दो मराठे जहागीरदार सरदार संबंधि बन गए। हमने “ तोड़ो और राज करो”  यह नीति अँग्रेजों के समय सुनी थी। पर इसका अमल सत्रहवी सदी के आरंभ से शुरू हुआ होगा, ऐसे इस परिपेक्ष में दिखाई देता है। सत्ता और दौलत के चक्कर में परिवार में ही गद्दारी करने पर इन शाही रियासतों ने जाधव-भोसले परिवार को मजबूर कर दिया था। आखिरकार शाही रियासती के मंसुबे इन भोसले–जाधव इन दो परिवार में फूट करने में कामयाब हो गए। इसी चलते कभी वे निजामशाही तो कभी मुघलशाही में जानेआने लगे। पर इसी दौरान शाहजी राजे और जीजाबाई अपने स्वराज्य निर्माण के काम में एकग्रता से जूट गए थे। जब शाहजी सेना के सरनौबत बन गए, तब तो इस अधिकार से उन्होंने अपनी जनता को जो दहशत में जी रही थी; उन सभी मराठे सरदारों को विश्वास दिलाया और अपनी जनता को हौसला रखने को कहा। उनका कहना था- जनता का स्वराज्य निर्माण के काम में आपकी एकता और विश्वास जरूरी है। इस काम में लोगों को जोड़ने के लिए वह बहुरुपियाँ तक बन गए थे। 

शुरुवाती दिनों खेत/जमीन का लगान बहुत ही बेरहमी से मुघलों ने वसुला था, आगे चलके निजामशाही भी उसी लुटालूट पर उतरी। जब आस-पास लुटालूट, दहशत, औरतों अब्रू लुटना, खुन-खराबे को आखिरकार ठुकराकर जनता इस उभरते स्वराज्य संकल्पक शाहजीराजे भोसले के पक्ष में खड़ी हुई। जिस जीजा ने इस कल्पना को साकार होते देखा उसे हम स्वराज्य जननी कहते है। उन्होंने हर एक इंसान को विश्वास के साथ साथ सुरक्षा भी प्रधान की। उनके हुनर देखकर नौजवानों को सेना में भरती होने की संधी उपलब्ध कराई। एक उदाहरण आप ने सुना होगा- जब जंगली सुवर और रनगवा खेतों का बड़ा नुकसान कर रहे थे, तब उन्होंने एक फर्मान जारी किया था। – अगर इन जंगली जानवरों को रोकने का कोई इंतज़ाम करेगा; उन्हें सुवर्ण मुद्राएँ दी जाएगी।“ इसके दुसरे ही दिन से नौजवान, जिगरबाज लोग आगे आने लगे। एक बार एक नौजवान रात के 12 बजे राजमहल में जंगली जानवरों का प्रबंध करके सबुत के तौर पर उस जानवर की पूंछ लेकर माँसाहब जीजाऊ से मिलने आया। समय रात का होने के कारण उन्हें जाने को कहा मगर वह जाने के लिए तैयार नहीं था। इस अनबन की आहट जब जीजाऊ माँसाहब के कानों तक पहुँची, तब वे बाहर आए। उसे पुछा- कल सुबह आते तो भी हम आपकी बहादुरी के लिए सुवर्ण मुद्राएँ देते थे। इतना विश्वास नहीं है? और साथ में ही उसका नाम भी पुछा – उसने कहा-  दानाजी मालुसरा, माँसाहब सुवर्ण मुद्रा के लालच में अभी नही आया हूँ। आपने दिया हुआ काम पूरा करने का सौभाग्य मुझे मिला, बस यही बताकर आपका आशिर्वाद लेने आया हूँ।“ इस जवाब से हम सोच सकते है। स्वराज्य निर्माण का काम कॅडरबेस था। आगे दानाजी स्वराज्य के सेना में सामिल हुआ। 

लगान माफ न करने के कारण गाव के सभी लोग जंगलों में भागते रहते थे, ताकि लगान से बच जाए। कोई दौलतमंद सरदारों का काफिला जाते दिखता तो वह उसे लुटते थे। आगे चलकर उन्हें घुमंतू, पारधि,रामोशी, के रूप में पहचाने जाने लगे। लुटपाट करने की एक ही वजह थी; खेत से आनेवाला अनाज लगान के रुप में शाही बादशाहओं को देना पड़ता था। गुजारा करने का कोई उपाय नही बचता था। तब जा के वह केवल डरा धमकाकर लुटते थे। पर जीजा ने उसे भी बदल दिया। कल तक जो जीजा थी वह अभी जनता के लिए माँसाहब जीजाऊ (आऊ याने माँ) बन चुकी थी। उन्होंने जरूरतमंदों को अनाज दिया, रोजिरोटी दी, स्वराज्य के काम में सामिल किया, ऐसे कई काम देकर जनता को अपना बनाया। औरतों का सम्मान और सुरक्षा महसूस  होने से उन्हें जनता से एक जनादेश मिलता गया। इसी बलपर स्वराज का निर्माण हुआ था। 12 जनवरी को माँसाहब जीजाऊ जन्मदिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस यह दोनों घटनाएँ मूल्य से अलग हो ही नहीं सकती है। जिस मूल्यों को हमने संविधान में बोया है, वही मूल्य हमें माँसाहब जीजाऊ के जीवन में दिखते है। समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, जैसे मूल्य आसानी से उनके जीवनी से दिखते है। पीड़ित जनता को समझकर- समझाकर बदलाव का विश्वास दिलाना, आज के चुनावी भाषणों  जितना आसान नही था। 

जनता के बात पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया, स्वराज्य को खड़ा करने में जिसकी जितनी क्षमताएँ उनको उतनी संधी, अवसर उपलब्ध कराया। लोगों में हिम्मत आयी और सुरक्षित जनता का स्वराज्य निर्माण हुआ। इस राजमाता की भुमिका केवल शाहजी राजे की पत्‍‌नी तक सीमित नही थी। जब सिंदखेड़ में बचपन की तालीम हों रहीं थी, तब से आत्मसम्मान की बातें जीजा करती आ रही थी। शाहजी राजे की पत्‍‌नी के रूप में जब वे थे, तब खौंपनाक उन शाही रियासतों के बीच जाधव और भोसले पारिवारिक कलह को मिटानेवाली निर्णायक व्यक्ति, स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षा, आदर, जैसे मूल्यों को हरवक्त दोहरानेवाली कुम्हार की कलाई थी; मानो किसी मिट्टी को आकार देकर सपने को साकार कर रही हो! आऊ के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के पीछे महाकाय कल्पतरू बनी थी। अपने सपनों को साकार करने में शिवबा को तैयार करनेवाली वात्सल्य जननी थी। उन्होंने शिवबा में सद्गुण, शौर्य, दूरदृष्टि, राजनीति, कुशल प्रशासक जैसे मूल्यों को बोया था। 

अक्सर हम कहते है- स्वराज्य संस्थापक शिवबा को जन्म देनेवाली जीजाऊ है। इसमें कोई दो राय नही है। हमने शिवबा की महानता को सराया है। पर स्वराज्य संस्थापक  होना, कोई आम बात नहीं थी।  इस स्थिती में शरिर से मस्तिष्क तक विचारधारा देना मूल्यों के बिना मुमकिन नही था। इसलिए स्वराज के विचार तथा संकल्पना की जननी माँसाहब जीजाऊ ही है। स्वराज रक्षक संभाजी के परवरिश में भी माँसाहब जीजाऊ का अमूल्य योगदान था। माँसाहब जीजाऊ का स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षितता, जनता के स्वराज्य की जननी तक का सफ़र अनोखा है। खेत में झुलनेवाले किसी भी अनाज के पत्ते को भी छुना नहीं, ऐसी ताकीद देना, हर औरत को माँ के समान समझना, हर सिपाही का हौसला बुलंद करने के लिए गले लगाना, इसी से ही जनता का स्वराज इतिहास के पन्नों पर सुवर्णमुद्रित हो सका। 

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता को स्मरण करना मौलिक अभ्यास से जुड़ा था। वह एकाधिकारशाही, राजेशाही जरूर थी, मगर जनता का जनाधार सरआँखों पर था। सामाजिक मूल्यों की वह अतुलनीय प्रणाली थी। मैं उस गणतंत्र को आज के लोकतंत्रात्मक गणराज्य के भारत से मिलता-जुलता पाता हूँ। संवैधानिक भारत के निर्माण में मूल्याधारित सक्रिय नागरिकों को तैयार करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। माँसाहब जीजाऊ ने जो सत्रहवीं सदी में साकार करवाया, शायद हमें उस सुवर्ण इतिहास में एक और बार दौरा देना होगा। जिससे हम इस आधुनिक भारत में कॅडरबेस जनता निर्माण कर सकें।   

धन्यवाद 

अमित शालिनी शंकर पवार 

तीचं संपणार तारुण्यपण !

सर्वजण तिच्या ती असण्याचं कौतुक करतात ; काहींना तर ती म्हणजे कोण? तेच कळण्यास काही दिवस जातात.

 

अहो! तीचं  ती कधी आईच्या रूपात, कधी बायकोच्या रूपात,  कधी बहीण तर कधी मुलीच्या रूपात असते. तिची वागणूक, त्याग , सौंदर्य , माता , गर्भ धारणा , लाजरी , नाजूक , सहन शील , भावनिक यावरून तीचं स्त्रीत्व ठरवलं जात.

 

किशोरपणाच्या उंबरठ्या पासुन ते तारुण्या पर्यंत तिच्यात झालेले बदल आपल्याला दिसतात , कोणी त्याचा आदर करतो तर कोणी वासनेच्या आहारी जाऊन अत्याचार करतो.

 

लहानपणी मासिक पाळी आल्यावर आई जपते , लग्न झाल्यावर गरोदरपणाच्या वेळी परिवाराकडून जपलं जात. बरोबर ना???

 

मग पुढे काय?  फक्त मासिक पाळी , लैंगिक सुख , गर्भ धारणा पर्यंतच हा योनी व गर्भ प्रवास असतो का?

 

सविस्तर विचार करायला गेलात तर नाही!  उतारवयातही तिची तशीच काळजी का नाही घेतली जात? जशी किशोरवयात व तारुण्यपणात घेतली जाते.

 

का तर? उतारवय हे मासिक पाळी गर्भधारणेचा नसते.

बरोबर आहे! .

 

आज पर्यंत तिचा वापर आपण एक घराची इज्जत , पोरं देणारी मशीन , आणि उपभोग घ्यावयाची वस्तू  इथपर्यंतच करतो व संसाराचा गाडा ओढणारी गुलाम म्हणूनच करतो.

 

पण कधी आपण विचार करतो का? तीचं  तारुण्यपण संपल्यावर तिच्या गर्भाचं काय? योनी च काय? करतो का हा आपण विचार नाही ना???.

 

तर मग करून बघुयात! एखादा विचार, घेऊयात काळजी तिच्या गर्भाची , करूयात विचारपूस एखादा तिच्या मातृत्व सुखाची.

विचारू यात एखादा तिला अजून हि त्रास होतो का ग तुला?

 

मग बघा तिला तीचं  स्त्रीत्व असल्याचा अभिमान वाटतो कि नाही..!

 

 

~ मयुरी लाड

  विभाग-मुंबई

देशाची दशा…

आमच्या देश्याचा पोशिंदा शेतकरी,

तोच बिचारा या देशात भुकेने मरी.

जिवंतपणी त्याच्यासाठी काही नाही केले,

मेल्यावर त्याला लाख रुपये दिले.

असे माझ्या देशातील पुढारी नेते,

पाच वर्षात जेवढं भेटेल तेवढं खाते.

चपराशी व्हायला पात्रता बारावी पास,

देशाचा मंत्री चालतो आठवी नापास.

देशातील शेतकरी महागाईने मरत आहे,

आमचे कृषीमंत्री क्रिकेटच पाहत आहे.

जळतो देश माझा लोक मात्र झोपलेले,

भुकेने मरून देवासाठी धर्मासाठी जागलेले.

देश माझा चांगला पण नेत्यांनी ठेवला गहाण,

तरी आम्ही म्हणतो आमचा देश महान…

 

~ श्वेता आनंदराव नागदिवे

    विभाग – अमरावती  

 

सौंदर्याच्या व्याखेत…

मला कल्पना आहे कि,

मि तुझ्या सौंदर्याच्या व्याख्येत बसत नाही…

कारण माझ्या जगण्याची दिशा

मी कधीच बदलून टाकलीय…

 

मला त्या सुंदर मुलींसारखा

आकर्षक बांधा नाही,

आणि त्यासाठी मि काळजीही घेत नाही,

मला इतरांसारख तोलुन मापुन खाता येत नाही,

आणि असणाऱ्या वजनावर लक्ष ही देता येत नाही…

 

मान्य आहे राजा..!

मला त्या सुंदर मुलींसारख

लाजता येत नाही,

आणि चालणाऱ्या पावलांना आवर घालुन

नाजुकपणाचा आवही आणता येत नाही…

 

मला इतर मुलींसारख

तुझ्या ‘हो’ ला ‘ हो ‘ मिळवता येत नाही,

माझ्या वैचारिक आणि स्वातंत्र्य बुद्धिला

मला कुंपण घालता येत नाही…

 

मला इतर आदर्श मुलींप्रमाणे

स्वता: वर नियंत्रण ठेवता येत नाही,

“मी फक्त तुझीच आहे आणि तुझीच राहिन ”

अशा खोट्या भ्रमात जगता येत नाही..!

 

खरच आहे बघ हे..!

 

मी इतर स्त्रियांसाखी तुझ्याबरोबर

संसारात परिपूर्ण असेल नसेन,

कारण मला चार भिंतीच्या त्या चौकटीत

घुसमट करुन जगता येत नाही..!

 

मला नाही जमत तुझ्या सौदर्याच्या

कल्पनेची उंची गाठता…,

कारण माझ्या सौंदर्याचे पडदे

मीच झुगारून टाकले..!

 

हो…. मला आवडत ….! कसही जगण…!

निर्लज्ज बनुन ताट मानेन चालण….!

 

मला किचन पेक्षा मोकळ जग आवडत,

मला साडी आणि पंजाबी पेक्षा,

वेगवेगळ्या पोशाखात पेहराव करण आवडत..!

 

मला आवडतं माझ्या विचारांना

सतत व्यक्त करण..,

मला माझ्या इच्छा दाबून न टाकता

जे वाटते त्याला कृतीत मांडण आवडत..!

 

मला माझ्या मर्यादांची सिमा ओलांडून

पलीकडे जावून विरोध पत्करण आवडत..,

रोज कुणीतरी मळलेल्या पाउल वाटेपेक्षा

प्रवाहाच्या विरूध्द दिशेने पोहायला आवडत..!

 

मला दागिण्यांच्या शृंगारापेक्षा,

विचारांनी सजायला  आवडेल..,

पारंपरिक चौकटीला तोडून बाई आणि आई पेक्षा माणुस म्हणुण जगायला जास्त आवडेल..!

 

माहीत आहे कि, मि तुझी मैत्रीण म्हणून

तुला खुप खुप आवडेलही..,

पण आयुष्याची तुझी जोडीदार म्हणुन

तुला माझ्यावर विश्वास टाकायला

थोड जडचं जाइल..!

कारण …,

माझी सौदर्याची व्याख्या

मी ठरवली आहे जी तुला जड होइल,

तरीही खात्रीने सांगतेय,

माझ्यासोबत जगताना आनंदा पेक्षा

कदाचित तुझ्या अपेक्षांचा भंगच अधिक होइल….!

 

पण हरकत नाही…,

 

मी तुझ्या अपेक्षेत नाही बसले तरी

मला अजिबात वाईट वाटणार नाही…,

 

कारण तसे ही,

 

माझा शोध हा फक्त पुरुषाचा नसुन,

तुझ्यातल्या माणसाचा अधिक आहे..,

तुझा मुद्दा “फेमिनिस्ट” चा असेलही बरोबर

पण माझ्या आत्मसन्मानाचा प्रश्न अधिक आहे..!

 

त्यामुळे…,

 

तुझ्या सौदर्याच्या व्याखेत बसण्यासाठी

माझा आटा पिटा कधीच नसतो..,

 

कारण …,

 

मला अडवणाऱ्या अभेद्य भिंतीना तोडायचे आहे…,

मला माझ्या जिद्दीला आजमावायचे आहे…!

 

खरचं …..समजतोयस का तु ?

 

मी तर सुरवात केली,

स्त्रित्वाच्या पलीकडे जावून माणुस म्हणून जगायला…

पण तुझ काय …..?

तु कधी भेटशिल ….?

 

मी वाट पाहतेय,

तु कधीतरी मला माणुस म्हणुन भेटशिल…

मी एकू पहातेय,

तु माझ्या वेगळेपणाचे गोडवे जगाला सांगशील..!

मी स्वप्न पाहतेय,

तु कधीतरी माझ्याही सौदर्याला नक्कीच भिडशिल..!

 

~ कविता अनुराधा अनंत.

    विभाग-मुंबई

आज की नारी कैसी है, फूल नही चिंगारी है….

में हु आज की नारी,

मुझमें बसी है दुनिया सारी,

ना रही में पहले वाली बेचारी,

बदलतें वक़्त के साथ,

मुझमें आयी समझदारी,

में हु आज की नारी….

 

लड़किया किसी बाग़ का खूबसूरत फूल नही है, जिसे कोई भी कभी भी तोड़ ले। लड़किया तो चिंगारी की तरह है, जिसे छूने से छेड़ने वाला डर जाये। लड़कियों को चाँद की तरह खूबसूरत नही, बल्कि सूरज की तरह रोशन होना चाहिए। जिसे कोई घूर ना सके।

 

  में वो चाँद नही जो सिर्फ खूबसूरत नजर आए,

     में वो हु जिस मे सच्चाई की सूरत नज़र आए,

     में कल्पना, में गीता और में हु सावित्री,

     जमाने को मुझमें सिर्फ ममता की मूरत नज़र आए…

 

आज की नारी घर मे ही नही बल्कि देश के बॉर्डर पर भी है। आज की नारी जमीन पर ही नही बल्कि चाँद पर भी है। आज महिलाएं सती प्रथा में पती के साथ जलने वाली नही है, बल्कि पती के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली है।

 

आज महिलाएं अदालत मे भी है, जहा जीवन मिलता है, उस हॉस्पिटल में भी है। अब घूँघट मे मुँह छुपाए नही, बल्कि गर्व से सर उठाये चलती है महिलाएं! पर कुछ लोग महिलाओं को सिर्फ  घर मे रखना चाहते है। लड़किया ठीक से बड़ी भी नही होती, उसे घर के कामकाज में लगा देते है। उन्हें लगता है, शादी एक वही मक़सद है, लड़कियों की ज़िंदगी का! कुछ लोगो की सोच होती है, की लडकिया ज्यादा पढ़ नही सकती, लडकिया आगे बढ़ नही सकती, लडकियों को उनकी पहचान शादी के बाद ही मिलती है, वगैरा वगैरा लैकीन, लोगों को ये क्योँ समझ नही आता के अगर हिंदुस्तान की सारी लडकिया पढ़-लिख कर काम करे तो हमारा हिंदुस्तान ज्यादा कामयाब होगा। और इस तरह लड़के पर घर की सारी जिम्मेदारी नही रहेगीं। अगर पती-पत्नी दोनों कमाए तो घर चलाना बहुत आसान होगा। और next generation को अच्छी ज़िन्दगी मिल सकती है। इस तरह पूरा देश आगे बढ़ेगा।

 

 

की & का मूवी आपने देखी होगी। वो आज के दौर की सच्चाई है। आज तो पती घर मे रहता है, और पत्नी बाहर जा कर काम करती है। पती भी घर के काम कर सकता है, और पत्नी भी बाहर के काम कर सकती है। कुछ लोग लड़कियों को कमज़ोर समझते है, हम उनकी सोच से भी आगे है। आज लड़कियां boxing में कुश्ती में बहुत आगे है।

 

बिते हुए काल मे जो महिलाओं के साथ अन्याय हुवाँ, आज उस अन्याय की चिंगारी है हम में। जैसा सती प्रथा ,बालविवाह, लड़कियों को अनपढ़ रखना, दहेज लेना।

 

पती के साथ जला दिया गया था, आज उस अन्याय की

चिंगारी है मुझ में।

नासमझ, अनपढ़ समझने की भूल न करना, पूरी दुनिया की जानकारी है मुझ में।

 

~ सलमा खान

   विभाग-मुंबई

 

आजची सावित्री..

घरातल्या चौकटीत  स्व:तचे उभे आयुष्य कुटुंबियांसाठी समर्पित करणाऱ्या स्त्रीला समाजात स्थान मिळवून देणारी सावित्रीमाई ही केवळ एका समाजसुधारकाची पत्नी म्हणून आपल्याला माहित आहे.  समाजाच्या अनिष्ट रूढी,परंपरेच्या जोखंडातून समस्त स्त्रीजातीची मुक्ती करण्यासाठी उभे आयुष्य या सामाजिक युद्धासाठी देणाऱ्या सावित्रीचे विचार हे त्या काळात इतके पुढारलेले होते कि आज ही ऐकताच अंगावर शहारे येतात.

सावित्री आई ने समाजामध्ये जे क्रांतिकारक परिवर्तन केले आहे. त्यामुळे आजची  स्त्री ही प्रत्येक क्षेत्रात स्वतःचे स्थान निर्माण करत आहे. म्हणून आजची सावित्री फक्त पुस्तकात नाही, फक्त स्वयंपाक घरात नाही, फक्त चार भिंतीत नाही तर, पोलिसांच्या गणवेषात दिसते, हवाई जहाज (विमान) मध्ये  दिसते, मोठं मोठ्या दवाखाण्यात दिसते, विज्ञानाच्या प्रयोग शाळेत दिसते, अंतराळात दिसते.  अन ज्या माई ने  शिक्षणाचे बीज पेरले ते त्याचे संगोपन करताना दिसते.

एकीकडे आज वेगवेगळ्या क्षेत्रात आपल्या नावाचा ठसा उमटवणाऱ्या स्त्रियांना कदाचित या नावाचा विसर पडला आहे. अन आजच्या स्त्री ला विद्येची जननी  सावित्री कळली नाही. शाळेत मुलांना  सांगितले जाते सरस्वती ही विद्येची देवी आहे. सुरुवातीला पाटीवर सरस्वतीचे चित्र काढून पूजा केली जात. आता तर वही पेन, संगणकांची पूजा करताना दिसते. किती गंभीर परिस्थिती दिसते येणाऱ्या काळात! कारण आपण सर्व धार्मिक होत असल्याचे मला दिसून येत आहे. देवांच्या पाया पडा आज त्यांच्या अर्शिवादाने तुम्ही शाळेत जाताय लहानपासूनच मुलांना अशी शिकवण दिली जाते. मग कितीही मोठ्या पदवी घेतल्या तरी त्या देवी – देवत्यांच्या अर्शिवादाने पूर्ण झाली असं त्या मुलांना सुद्धा वाटत असते. व लग्नानंतर त्या सावित्रीची उपास करून वडाला  7 फेऱ्या मारायला समाजातील रूढी, परंपरा शिकवतात आणि आपण पण शिक्षण घेऊन पण असेच वागतो. पण ज्या माईने  शाळा सुरू केली. त्यांच्या  मुळे आज आपण शाळेत जातो. त्यांच्या  मुळे  आज आपण पदव्या घेऊ शकतो. ती सावित्री मात्र लपून ठेवण्याचा काम समाजव्यवस्था करत आहे.

आजची सावित्री शिक्षण तर घेते. पण शिक्षण घेऊन ही ति त्यांच गुलामगिरीत किंवा धार्मिक परंपरेत अडकून पडलेली आहे. पण मला वाटते कि, आपण त्या सावित्रीचा आदर्श घेऊ ज्यांनी समाजात क्रांतिकारक बदल केला.  ज्या सावित्री माईने स्त्रियांना जाचक प्रथातून मुक्त करून स्वतंत्राशी ओळख करून दिली. जय संवित्रीने संपूर्ण महिला वर्गाला शिक्षणाचे दार खुले केले. अश्या शोषितांची ढाल झालेल्या साऊ चा  आदर्श घेऊ आणि आपल्या प्रत्येका मध्ये एक क्रांतीची मशाल पेटवू. आपले उद्धारकर्ते आपण स्वत सिद्ध होऊ.

  ~ सिमरन मनिषा महेंद्र धोत्रे

      विभाग-मुंबई

 

आधुनिक भारतात खरंच आपण स्वतंत्र आहोत का???

हो, मी स्वतंत्र आहे..! हो माझा देश स्वतंत्र आहे!

पण खरंच आपण स्वतंत्र आहोत का..? जरा विचार करा..

आपला देश १५ ऑगस्ट १९४७ रोजी स्वतंत्र झाला. हे अगदी बरोबर आहे, परंतु आज कित्येक भागात समाजात स्त्रियांना-मुलींना स्वतंत्र पणे जगता येत नाही. स्वतंत्र पणे फिरता येत नाही. मन मोकळे पणाने ती कधी कुठेच व्यक्त होऊ शकत नाही..!

सावित्रीबाई मुळे आपल्याला शिक्षणाचा हक्क मिळाला आहे, पण काही भागात आज ही मुलींना शिक्षण दिले जात नाही. आई वडील आपल्या मुलींच्या इच्छा अपेक्षा भंग करतात. खेळ, नृत्य, किंवा शिक्षण यावर बंधने लादली जातात.  म्हणजे बघा एखाद्या मुलीला नृत्य ची आवड असेल, तरी तिला बंधन घालतात. का? तर लोक काय बोलतील??

‘तू नृत्य शिकणार तर लोक तुला तमासगीर म्हणतील ‘ 

तू शिक्षण घेशील तर तुझ भलं नाही होणार.  लग्न झाल्या नंतर घरचं सांभाळायला लागणार. शिक्षणाने काही फायदा नाही  होणार! अशी समाज मान्यता असते.  नंतर मुलगी एकदा काय मोठी झाली की कुटुंब सदस्यांपासून ते नातेवाईकांपर्यंत तिच्या लग्नासाठी चर्चा चालू करतात. लग्न करणं वाईट नाही. पण तिच्या पण काही इच्छा असतात. कोण विचारणार त्यांना? आई वडील आपल्या मुलीसाठी चांगलच विचार करणार. पण कधी कधी त्यांना अस वाटतं की, मुलीने कुठे चुकीचा  पाऊल उचला तर? किंवा पळून गेली तर? जाती बाहेर लग्न केल तर? लोक नाव ठेवतील. मुलगी स्वत:च्या आवडीने तिचा जीवन साथीचीही  निवड करू शकत नाही का?

अश्या या बुरसट विचारसरणीमूळे आज आपला समाज, देश पाठी आहे.

आज ही स्त्रिया आपल्या गरजा आपल्या नवऱ्याला सांगू शकतं नाही. किंवा नाही त्या मन मोकळेपणाने बोलू शकतं. असे का ? स्त्रियांना फ़क्त आणि फ़क्त एक हक्क आहे?  माहिती आहे का?  ते काय आहे. म्हणजे “स्वातंत्र्य पणे ते गुलामी करू शकतात तिच्यावर”! मग ते समाज असो किंवा कुटुंब. मग त्या स्त्रीला घर,चूल आणि मूल हेच तिच्या जीवनाचा अर्थ आहे, असे स्वीकारावं लागते. स्त्रियांना आजही सासरी सासरवास भोगावा लागतो.  मग ते शारिरीक दृष्ट्या असो किंवा मानसिक दृष्ट्या त्रास अत्याचार तर चालूच असतात.

आपल्या समाजामध्ये हुंडा प्रकरण बंद झाले असून सुद्धा ही प्रथा आजही चालुच आहे.  सासरी सर्वच गोष्टींसाठी स्त्रियांना परवानगी घ्यावी लागते. एखाद्या पिंजऱ्यातल्या वाघा प्रमाणे रहावं लागते. पण स्त्रीयांमध्ये भरपूर ताकत आहे. तरीही ती आपले आणि आपल्या आई वडिलांचे  नाव खराब होऊ नये, म्हणून नको नको ते सासरी सहन करत असते. असे का? तर समाज काय बोलेल हे पाहिल्यांदा लक्षात येते.

प्रत्येक यशस्वी पुरुषांच्या मागे एका  स्त्रीचा हात असतो. आपल्या राज्यात, आज ही स्त्रियांचा छळ केला जातो. चुकून जर बायको आपल्या नवऱ्याला दोन गोष्टी हक्कांच्या बोलली तर मारहाण, शिवीगाळ होते.  नको नको त्या गोष्टी होतातच.  ” बायको आहेस तर फक्त सेवा करत रहा.”  याच्या व्यतिरिक्त काहीही बोलायचं-करायचं तिला हक्क नसतो.

खरं म्हणजे तर स्त्री जिवंत पणे मरत असते. तरीही स्त्री जिद्दीने आणि चिकाटीने राहते, समाजामध्ये वावरते.

आजही समाजाची  विचारसरणी तशीच आहे….

 

नवरा म्हणजे पती-परमेश्वर आहे, असे समजून चालतात. मग तीच बायको आपल्या नवऱ्याच्या खांद्याला खांदा लाऊन का चालू शकत नाही?? स्त्रियांनी स्वतःबद्दल चा आदर्श स्वतःच कमी केला आहे. पण काय अर्थ आहे ह्या जीवनाला.  मन मोकळेपणे बोला,  विचार मांडा ! ” जग हे खूप सुंदर आहे.

जीवन हे एकदाच मिळते. त्याला आनंदाने आणि स्वतंत्रपणे जगायला शिका. मग हे जग, समाज आणि कुटुंब गुलाबाच्या काट्या सारखे नाही तर अगदी गुलाबाच्या बागेसारखे दिसेल!

अहिल्याबाई यांनी जरी सती प्रथा संपवली आहे, तरी सुद्धा एखाद्या स्त्रीचा नवरा मेल्या नंतर तिला सौभाग्यवती चा हक्क मिळत नाही. लग्नात किंवा कोणत्याही कार्यक्रमात मान दिला जात नाही. असे का?  मग ती कोणाची आई असो, बहिण किंवा मुलगी! ह्या सर्व गोष्टींना सामोरे तर जावंच लागत ना! आपले विचार बदला रिती बदला..!

स्त्री म्हणजे अशी अभिव्यक्ती असते जी फ़क्त आपल्या क्षणिक सुखासाठी जगत नसून इतरांसाठी आपले जीवन जगत असते !

आपल्या ही जीवनाला अर्थ आहे. जीवनाला महत्व द्या ! जीवनात नकारात्मक विचार घेऊन पुढे चालू नका!

स्त्री सर्व सहन करू शकते. सर्वांत जास्त ताकत खर म्हणजे तर स्त्रीमध्ये असते. जसें हिरकणीने तिच्या उपाशी बाळा साठी गडाचे दरवाजे बंद झाल्या नंतरही एका वेगळ्या मार्गाने गड उतरली, ज्याबद्दल आपण कल्पना ही करू शकत नाही. अशी हिरकणी आपल्या प्रत्येका मध्ये सामावली तर तो दिवस जास्त लांब नाही की, आपल्या हक्कासाठी स्वातंत्र्य रित्या आपण पुढे येऊ.  जे पुरुष ही करू शकत नव्हते त्या गडावरून  हिरकणी खाली आली. अशा अवघड गडावरून हिरकणी उतरू शकते, तर स्त्रीला पुरुषा पेक्षा कमी लेखून स्री पुरुष समानता नाकरणारे आपण कोण? हे आपले युद्ध आहे आणि आपल्यालाच लढाई करायची आहे. स्वतःवर विश्वास ठेवा. मनामध्ये निराशा नाही तर एक आशा ठेवा. जेणे करून आपली पुढची पिढी सुद्धा स्वतंत्र रित्या आणि हक्काने आपले जीवन जगेल.  जर आभाळात झेप घ्यायची असेल ना तर तुमच्या आमच्या सारख्या मुलींना, स्त्रियांना प्रयत्न करत रहावे लागेल. धाडस करावे लागेल.

जग खूप मोठे आणि सुंदर आहे. सुंदरतेचे रूप बघा… आनंद लुटा… अडचणीवर मात करायला शिका आणि स्वप्नं रंगवा !!

पुन्हा एकदा विचार करा. स्वातंत्र्यपणे स्वतंत्र राहायचे आहे, की समाजमान्य बंधनांचा आदर करायचा?

मी तर ठरवल आहे, बंधनाला लाथाडून स्वतंत्र जगायचं !

पण आपलं  काय ..???

स्वतंत्रपणे जगणार! की गुलामी करणार …?

 

~ प्रियादर्शना गायकवाड

    विभाग-मुंबई

महिला स्वयं ही गुलामी को स्वीकारती हुई…..?

मेरे विचार से यह वाक्य महिला को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाता है, क्योंकी  महिला ने अगर यह स्वीकारा है तो सुझ बुझ कर ही यह किया होगा,

 

मेरी उम्र 24 साल है. और अगर मै केवल मेरे अनुभव बताने लगी तो तजुर्बेदार लोग अपना नज़रिया भी रखने की कोशिश करेंगे.  इसलिए चलिये  मेरे अनुभव और आपके तज़ुर्बे की बात साथ साथ करते है.

 

सुमती बेलाडे यह  62 वर्षीय महिला है जो पिछले 30 सालो से महिलाओं और युवतियों के प्रश्नों पर कार्यरत है, जब हमारी चर्चा इस विषय को लेकर हुई तो लगभग उनके तज़ुर्बे से कहीं हुई हर बात महत्वपूर्ण है, उनका तजुर्बा  कहता है कि,  “महिला इस लिए खुद से गुलामी स्वीकारती है क्यों कि वो अपने गुलामी को अपनी  ज़िम्मेदारी समझ बैठी है. “

 

जिस तरह सिक्कों के दो पहलू होते है.  ठीक उसी तरह सिक्के के पहले पहलू की तरह घर की हर जिम्मेदारी महिला संभल रही है . लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू की तरह अपनी ताकत को नहीं पहचान रही है . मैथिलीशरण गुप्त की लिखी हुई कविता. “अबला जीवन हाय तेरी यही कहानी , आचल में दूध आखो में पानी”

 

कुछ वास्तविक अनुभव जो अक्सर महिला के  जिंदगी में एक न एक बार आते ही है.

 

स्वयं ही गुलामी स्वीकार लेती हु ?….

 

मै हू दुनिया की आधी आबादी,

फिर भी पूरी नहीं मिली आजादी,

जब दुनिया में बड़े बड़े कारनामे मै खुद कर जाती हूं,

फिर भी बेटे के तुलना तुल जाती हु,

क्यों नहीं बेटी बनकर सब कुछ करू,

दर्द होता है जब बेटे का पद पाती हूं,

तब पितृसत्तात्मक पद्धिती की शिकार बन चुप रह जाती हूं,

 

मै स्वयं ही गुलामी स्वीकार लेती हूं ……

 

जब बेटियो की जान लालच से ली जाती है,

कोई अकेला नहीं समाज की साजिश भी उसमे मिल जाती है,

जब मै खुद मां होकर एक लड़की की जिंदगी बचा नहीं पाती हूं,

तब खुद को तुच्छ मान कर अपराध बोध बन जाती हूं,

 

मै स्वयं ही गुलामी स्वीकार लेती हूं…….

 

जब कोई मेरे इज़्ज़त को तार तार कर देता है,

और गुनाह मेरे ही कपड़ों का निकाल देता है,

मै स्वयं ही शर्मशार हो जाती हूं ,

मै स्वयं ही गुलामी स्वीकार लेती हूं…

 

“अगर महिलाएं खुद गुलामी स्वीकार रही है तो उसके पीछे के कारण को ढूंढने कि आवश्यकता है”

 

फ़्रांसीसी विद्वान सिमोन डी विभोर लिखती हैं  “महिलाएँ पैदा नहीं होती, बल्कि महिलाएँ समाज के द्वारा बनाई जाती हैं.”  वैसे ही महिला स्वयं ही गुलामी नहीं स्वीकारती, उससे हर उस मोड़ पर सहारा छीन लिया जाता है, जहां से वो गुलामी तोड़ने की शुरुआत कर सकती है.

 

पढ़ाई = पढ़ाई के पुस्तकों में बच्चों को उदाहरण दिया जाता है कि, राम खेल रहा है और  गीता खाना बना रही है ऐसा लिखना बंद करो.

खेल = खेलने के लिए बैट बॉल दो गुड़िया बर्तन देना बंद करो.

स्कूल = स्त्री के शौचालय को गुलाबी रंग , पुरुष के शौचालय को नीला रंग यह रंगों में बाँटना बंद करो.

फैमिली = सदा सुखी रहो और अपने परिवार को खुश रखो यह आशीर्वाद देकर उसपर ज़िम्मेदारी का बोझ लादना बंद करो.

 

उपयुक्त लिखी चीज़े अक्सर लगातार हमारे साथ की जाती है. और ज़िन्दगी के एक पल में कहा जाता है, तुम आजाद हो करो जो करना है और वह सोच ही नहीं पाती की उसे करना क्या है? क्यों कि बचपन से गुलामी (जिम्मेदारियां) ही दी गई है आजादी नहीं!  अगर इस गुलामी को खत्म करना है तो हर मोड़ पर साथ दो सहारा नहीं तब देखो वह गुलामी स्वीकारती है या आजादी ?  मैं तो गुलामी से आजाद की ओर आगाज़ कर रही हूं. क्या तुम शुरुआत नहीं करोगी ?

 

~ आसमा अंसारी

    विभाग-मुंबई

स्त्री एक अस्तित्व…

           स्त्री  हा  शब्द किती लहानसा असला तरी अखंड विश्वाच रहस्य लपलयं अहो यात. आता आपण म्हणू हे कस शक्य ? जरा विचार करून पाहिले ना तर नक्कीच उलगडेल. पण पुरुषत्चाचा अहंकार बाळगणाऱ्या पुरुषाला आणि स्त्रीत्व म्हणजे एक हिन अवहेलना, असे समजून स्वतःला दडपून घेणाऱ्या स्त्री जातीला ते हे कसे हो समजणार. अहो, या सृष्टी रथाचे चक्र जिच्या असण्याने सुरू झालं, आजही सुरू आहे आणि पुढेही असणार. त्या स्त्री शक्तीचा सन्मान आज कितीतरी ज्ञान विज्ञानाच्या सहाय्याने पुढे चालले आहे. पण समाजाने मात्र धर्माच्या, अंधश्रद्धेच्या अंधारातच स्त्री अस्तिव्त ठेवलेले जाणवते.

 

पण हे का??  याचा विचार तरी आपण करतोय का??  आणि करत नसाल तर का करू नये??…. आदिशक्तीची, नवचंडीची दुर्गा म्हणून वर्षानुवर्षे पूजा करत आलेला आणि आजही या भूमीत कित्येक वर्ष प्राचीन देवी देवतांचे मंदिरे आहेत, त्यांची प्राणप्रिय श्रध्देने पूजा , रक्षा करणारा हा समाज वृंद मात्र एका स्त्रीने नवजात बालिकेला जन्म देताच तिला याच समाजाचं बोझ समजून तिच्या अस्तित्वाची जाणीव होऊ देण्याचा आतच तिला काळाच्या पडद्या आड ढकलून देतो. मी म्हणते का हे सर्व?? तेव्हा ती ही ऐक स्त्रीचं आहे म्हणून ?? अहो पण मग जीला तुम्ही आदिशक्ती म्हणून पूजतात ती दुर्गा ती नवचंडिका ही ऐक स्त्रीचं आहे…हे कस विसरतात! आणि तरीही आम्ही स्वतःला गौरवून घेतो, कशासाठी तर आम्ही स्त्रीला समान अधिकारान वागवतो अस म्हणून.

 

आजही एकविसाव्या शतकात आपल्याला आई हवी आहे, घरात आपल कुटुंब सांभाळायला, बहीण हवी राखी बांधायला,प्रेम करणारी लाड पुरविणारी आजी हवी आहे, हक्काची मैत्रीण हवी आहे,काकू,मामी,आत्या, सूनबाई हवी आणि तीच सूनबाई ने ऐका मुलीला जन्म दिला तर ती सूनबाई आणि तीच ते नवजात कोमल बाळ मात्र आपल्याला नकोस होत. कारण का? तर आपल्या या सार्थ अभिमान असणाऱ्या समाजाला वंशाला दिवा हवा असतो. जर वंशाला दिवा हवा असतो, तर मग आपण हे म्हणुच तरी कस शकतो की स्त्री पुरुष संसार रथाची दोन चाक आहे. कारण जर संसार रथाचे पूर्षत्वाचे अहंकार गाजवणार चाक जेवढ महत्वाचे आहे, तेवढेच दुसरे स्त्रीत्वाचा गर्व नसणार चाक ही महत्वाचं आहे; नाहीतर रथ चालणार तरी कसा हो! स्त्री ही नुसतीच या निसर्ग रथाच ऐक चाक नाही तर देवाने निर्माण केलेल्या या निसर्ग रथाचे वेग सुधा स्त्री जातीच्या हातात दिले आहे. कारण जेव्हा जेव्हा या धरतीवर संकट आली आहेत तेव्हा प्रत्येकवेळी आदिशक्ती ने जन्म घेतलाय. हे ऐक त्रिकालबाधित सत्य आहे.

 

दोष हा संपूर्ण मानव जातीचा नाहीच , दोष असतो मानव जातीतील काळाच्या पडद्या आड असलेल्या रुढी परंपरा च्या नावाखाली स्वतःला जखडून घेतलेल्या या समाजातील काही धर्मांध लोकांचा. आजची स्त्री खंबीर पणे लढते आज ती सर्व क्षेत्रात तीच सामर्थ्य सिद्ध करते. त्यामागे तिच्या पाठीशी असणारे असे काही लोक जे रुढी बंधनाना न मानता कुठल्याही प्रकारचा लिंगभेद न करता स्त्री व पुरुष एकसमान आहे हे सिद्ध करतात. त्यांच्यामुळेच म्हणूनच ती चार भिंती मधील गृहिणी आज बाहेर पडते. प्रत्येक क्षेत्रात मग ते कोणतेही ही असो तीच अस्तित्व दाखवते. ती सर्वांचा हिताचा विचार करते मग आपण तरी तिला का हिनवतो.  काय अधिकार आहे आपल्याला?? तिला गरज नाही आरक्षणाची , महिला दिनाची, तिला गरज अहे तर फक्त सन्मानाने जगू देण्याची ,तिच्या अस्तित्वाची जाणीव तिला असू देण्याची तुमच्या आमच्या या समाजाच्या प्रेमाची. तिला ही इतरांप्रमाणे जगण्याचा हक्क मिळू द्या. आयुष्याचा अर्थ हा तिच्या असण्यान पूर्णत्वास जातो. ती माता संसार रथाचे चक्र येणाऱ्या प्रत्येक संकटात अनेक नात्यांच्या रुपात बांधून ठेवत असते. तिच्या असण्याने आजपर्यंत पृथ्वीचे चक्र सुखरूप सुरू आहे . एवढंच काय ज्या धरतीवर आपण आपल अस्तित्व जगाला दाखवू शकतो ती धरती वसुंधरा सुद्धा स्त्रीत्वाचा रूप आहे. स्त्रीत्वाचा अपमान करून आपण या वसुंधरेला नाराज करतोय हे ध्यानात असू द्या. यावर अधिक बोलण्या सारखे म्हणजे समाजाने स्त्रीत्वाचा सन्मान करणे महत्वाचे आहेच! पण ऐका स्त्रीने दुसऱ्या स्त्रीचं आदर करणे महत्वाचे आहे. कारण बऱ्याच ठिकाणी स्त्रीला जळणारी ही स्त्री च असते. अशा काही कृत्यांमळेच समाजातील क्रूर प्रवृत्ती आणखी शक्तिवान बनत असते हे मात्र आपण विसरतो. अशा कृत्यांना आळ घालण्याचा प्रयत्न करा. तिला सुखाने जगण्याचा आनंद मिळू द्या. त्या लक्ष्मीला दुर्गेच रूप धारण करण्यास प्रवृत्त नका करू. नाहीतर एकदिवस तुमचा आमचा या समाजाचा अंत निश्चित आहे.

 

–  निकिता पाटील

     विभाग – धुळे

चूल, मूल आणि ती…….

एक स्त्री म्हणून जगणं सोपं नाही. स्त्रिया अत्यंत जबाबदार असतात; पण म्हणून स्त्री म्हटलं की चूल आणि मूल इतकंच काय ते तिचं आयुष्य….?

 

ती तिची सगळी कर्तव्य अगदी काटेकोर पद्धतीने बजावत असते. स्वतःच्या इच्छा आकांशा असूनही तिचं  अस काहीच नसतं. ती फक्त इतरांन करिता तिचं आयुष्य जगत जाते. हे तुझं घर नाही, लग्न करून सासरी जा, तेच तुझं खरं घर. आणि तिकडे ही परक्या घरातून आलेली स्त्री अशीच वागणूक तिला भेटतंआली. चूल आणि मूल सांभाळणं हे सोपं नाही, हे फक्त एक स्त्रीच समजु शकते. ती चूल सांभाळते, घरातल्या माणसांची काळजी घेते,  मुलांना मोठं करणं, त्यांच्यावर संस्कार घडवणं, हीच तीची एक चौकट . हे सगळं सांभाळताना ती एक नवी पिढी घडवत असते.

 

हे सगळं पूर्वी पासून चालू आहे. ज्या वेळी स्त्रियांना समाजात केवळ चूल आणि मूल ह्या चौकटीत पाहिलं जायचं; अश्या वेळी समाजात तिला शिक्षणाच्या माध्यमातून एक नवीन दिशा, आस्तित्व  द्यायचं काम क्रांतीज्योती सावित्रीबाई फुले यांनी केलं. महिलांच्या मुक्तिदाता म्हंटल्या जाणाऱ्या सावित्रीबाई फुले यांनी महिलांना शिक्षित   करण्यासाठी त्यांच संपुर्ण आयुष्य खर्ची घातले. सावित्रीबाई फुले या भारताच्या प्रथम महिला शिक्षीका. सहनशीलता जणू बाईच्या अंगी भिनलेलीच असते. 21 व्या शतकात  प्रत्येक क्षेत्रात स्त्री ने स्थान प्राप्त केले आहे. पण तरीही स्त्रीला कधी खूपच सन्मान देतात, तर कधी अगदीच वाईट वागणूक दिली जाते. थोडक्यात काय तर जगाला हवी तशी वागणूक तिला दिली जाते. आजच्या घडीला महिला घर मुल सांभाळून देखील पुरुषांच्या खांद्याला खांदा लावून नोकरी करतात. घरचं बाहेरचं दोन्ही करतात, तरी ही घरातील सगळी काम अगदी काटेकोर पध्दतीने पार पाडतात. इतकं सगळं होऊन तिच्या पदरात काय पडतं? तर फक्त दुय्यम वागणुक! आपण म्हणतो स्त्री स्वतंत्र झाली पण खरंच अस वाटतं  का तुम्हाला….?

 

अजूनही स्त्रीला का समजून घेतलं जात नाही, तिला काय वाटेल याचा विचार समाज का नाही करत. आज ही कित्येक घरांमध्ये स्त्री वर अत्याचार होतो, पुरुष मारतो, तिचा मानसिक-शारीरिक छळ होतो. अश्या घटना रोज घडतात. समाज अजूनही विचारसरणीने पूर्णपणे पुढे गेलेला नाही. समाजाचा स्त्री कडे पाहण्याचा दृष्टीकोन अजूनही बदलला नाही. खरंच अश्या या आधुनिक युगातील समाजव्यवस्था बघून मला बाबासाहेबांचे वाक्य आठवते. बाबासाहेब सांगतात, “एखाद्या समाजाची प्रगती मी त्या समाजातील महिलांनी प्राप्त केलेल्या प्रगतीवरून मापतो.”  खरंच जर समाजव्यवस्था ने स्त्रियांविषयीचा आपला दृष्टीकोन बदलला तर स्त्रियांची प्रगती होऊन  समाजात क्रांतिकारक परिवर्तन होईल. त्यासोबत आपला देश जो विकसनशील आहे तो विकसित होईल.

 

~ आरती इंगळे  

    विभाग-मुंबई

 

बलात्कार म्हणजे केवळ स्त्रीच्या सौंदर्याची लूट नाही; तर स्त्री ज्याला सौंदर्य समजते, त्या त्या सगळ्या विश्वाचा नाश…

जेष्ठ मराठी साहित्यीक आणि कवी व.पु काळे यांचे हे शब्द प्रत्येक स्त्रीच्या मनातील भावना असावी. स्त्री चे शरीर तिच्या साठी अमूल्य आहे. आपल्या शरीराला कोण पाहणार, कोण हात लावणार हे जो पर्यंत स्त्री स्वतः ठरवत नाही; तो पर्यंत कोणालाही अधिकार नाही स्त्री च्या शरीराला पाहण्याचे, स्त्री च्या शरीराला हात लावण्याचे.

‘तिच्यावर बलात्कार झाला’ असे आपण  सहज बोलून जातो.  परंतु तिला जाणवणाऱ्या वेदना मात्र कोणालाही कळू शकणार नाहीत. कारण बलात्कार म्हणजे शारीरिक , मानसिक जखमा.  ज्या सावरण्यासाठी बराच काळ जातो. माझ्या मते बलात्कार करणारा प्रत्येक पुरुष  पृथ्वीतलावर  राक्षसिवृत्ती घेऊनच जन्माला आले असावेत. या सगळ्यांना चालना देण्याचे काम कोणी करत असेल तर तो आहे हा  ‘समाज.’ एका बाजूला एकविसाव्या शतकाचे आपण ताशे सतत वाजवत एका उत्तम संगणकीय युगाची वाट पाहत असतो. आज स्त्रियांनी देखील शिखर गाठले आहे. पण  आधुनिक काळातील स्त्री खरचं माणूस म्हणून संपूर्ण समाजाकडून स्वीकारली गेली आहे का? हा प्रश्न नेहमी मला पडतो.

आजही महाभारताची पुनवृत्ती दिल्ली व महाराष्ट्र या आधुनिक राज्यात दिसून येत आहे. कारण द्रौपदी आणि ययाति पुत्री माधवी यांच्यावरील पुरुषी वर्चस्वावरील कहाण्या सर्वश्रुत आहेत. म्हणूनच आजच्या नवयुगात देखील स्त्रीचे वस्तुपन काही संपलेले नाही. समाजात एकूणच समाज व्यवस्थेत स्त्रीचे चारित्र्य हनन करणे या इतकी सोप्पी गोष्ट नाही  ‘स्त्री म्हणजे काचेचे भांडे आहे एकदा तडकले की परत सांधता येत नाही.’ हा समाजव्यवस्थेतील अलिखित नियम आहे. याच पुरुषी मानसिकतेतून स्त्रीला कमजोर बनवून नेहमीच दाबलं आहे. कितीही म्हंटल “गौरवाची सुभाषिते असोत” तरीही परिस्थिती प्रत्यक्षात कधी बदलणार हे निसर्गालाच ठाऊक.

पण संघर्ष अटळ आहे आणि तो प्रत्येक स्त्री जातीला करावाच लागणार आहे. शेवटी इतकंच म्हणेण नदी, धरती, आग, हवा ही सर्व स्त्री रूपं आहेत, जेव्हा ‘ती’ मौन मोडून आक्रोश करेल तेव्हा ‘भोग’ या शब्दाचा अर्थ काय आहे, हे त्या दिवशी कळेल व सर्व पुरुषप्रधान व्यवस्थेत तिच्या प्रती निष्ठा, आशा, उदारता, प्रितीची बीजे रुजतील आणि म्हणतील तू आहेस म्हणून आम्ही आहोत….

 

~ मयुरी जाधव

    विभाग- ठाणे

 

 

बदलते स्त्री जीवन…

आज सकाळी भांडी घासता घासता लक्ष्मी बाई माझ्याशी बोलत होती. ती आज जरा जास्तच मोकळे पणाने बोलत होती. मनातील क्रोध भांड्यांवर काढत होती. भांडी अधिकच स्वच्छ निघत होती. लक्ष्मी बाई सांगत होती “बाई माझा नवरा काही मेला नाही! मीच घराबाहेर काढले त्याला, सरळ हाकलून लावले त्याला.रोज दारू पिऊन तमाशा करायचा, दारू प्यायचा आणि मारहाण करायचा, रोजचा तमाशा नुसता पैशापरी! पैसे जात होते. पोराचा अभ्यास पण होत नव्हता. माझी मोठी बारावीला आहे. आणि धाकटा दहावीला . मी कष्ट करते, पोर पण हातभार लावतात. सुखात आहोत आम्ही तिघ.”  लक्ष्मी बाईच ऐकुन मनात आले,  किती बदलले आहे  “स्त्रीजीवन” ……!  नवऱ्याला देव मानणाऱ्या, ‘पती मेरा देवता हे ‘  या समाजात म्हणनांऱ्या एका अशिक्षित स्त्रीने आपल्या व्यसनी नवऱ्याला खरा रस्ता दाखवला. आता या लक्ष्मी बाईला अशिक्षित का म्हणायचे?  तर ती शाळेत नाही गेली म्हणून! पण ती आज आपल्या मुलांना शिकवत आहे . तिला शिक्षणाचे महत्व कळले आहे.

आज एकविसाव्या शतकात  स्त्री जीवनात मोठ्या प्रमाणात बदल झाले , त्याचे मुख्य कारण म्हणजे तिला सापडलेला शिक्षणाचा मार्ग, तिला कळलेले फुले, शाहू, आंबेडकरांचे विचार, तसेच सावित्री बाई फुले, आगरकर , महर्षी कर्वे , आणि इतर अनेकांच्या प्रयत्नांतून तिला विद्यालयाची कवाडे उघडी झाली. पाटी पेन्सिल हातात घेतलेल्या स्त्रीने अगदी अल्प काळात विद्यापिठाच्या परीक्षाही पार केल्या. आज एकविसाव्या शतकात प्रत्येक क्षेत्रात, प्रत्येक कसोटीत ती पुढे आहे. मग राजकारण , समाजकारण ,  शिक्षण कोणतेही म्हणा. संसद , न्यायालय  पासून ते अगदी अंतराळातही तिने आपली छाप सोडली आहे.  असे कोणतेच  क्षेत्र  नाही जे आज तिने यशस्वी रित्या पार केले नाही. अगदी परदेशात जाऊन ती आज देशाचा अभिमान बनली आहे. पण हे झाले असामान्य स्त्री बाबत.

सर्व सामान्य स्त्रिबाबत काय आढळते….? ती  ही सुविद्य झाली, जागरूक झाली आहे. तिला आत्मभान आले आहे. तिच्या स्वतःच्या मताची जाणीव तिला झाली आहे. घरात फक्त चूल आणि मुल सांभाळणारी स्त्री आज स्वतःचे निर्णय तर घेतच आहे. तसेच घरातील अनेक चर्चा मध्ये ती ही सहभागी होत आहे आणि आपले मत मांडत आहे. आपल्या मुलांच्या आणि आपल्या संसाराबाबत ती स्वतः निर्णय घेत आहे.

नाही चालणार संसार …..

            एकट्याच्या मर्जीवर….!

 

असे म्हणत,  ती आज पुरुषाच्या खांद्याला खांदा लावून पुढे जात आहे, आणि दोघं मिळून कमवू आणि दोघं घर चालवू या वर भर देत आहे. म्हणून आजची स्त्री एक रिक्षा ड्रायव्हर देखील दिसून येते.

आजच्या स्त्रीने एक सत्य जाणले आहे. आता ती कोणावरही अवलंबून राहू इच्छित नाही. ती स्वतःच्या पंखांनी उडान भरून, स्वतःच्या पायावर उभे राहून, ती जास्तीत जास्त  स्वावलंबी  होत आहे. नोकरी बरोबर उद्योग, व्यापार क्षेत्रातही ती आपले कर्तृत्व दाखवत आहे. अगदी घरात राहणारी स्त्री पण आपल्या फुरसतीच्या वेळात काहीना काही काम करून अर्थार्जन करते. एके काळी स्वयंपाकाची कामे करणे, मुले सांभाळणे ही कामे कमी प्रतीची मानली जात होती. पण बदलत्या काळानुसार आज पोळी भाजीचे केंद्र चालवणारी स्त्री स्वयंपाकीण समजली जात नाही, तर ती उद्योजक मानली जाते. आणि पाळणाघर चालवणे ही तर समाजसेवाच समजली जाते. आता “स्त्री अबला राहिली नाही, तर तिने आपली क्षमता जाणली आहे. ती आता सबला झाली आहे. ती सक्षम आहे.”

कामा प्रमाणे स्त्रीने आपल्या राहणीमानात, आणि पोशाखातही बदल केला आहे. आणि आता ते कोणालाच खटकत नाही. साडी पेक्षा, सलवार कुर्ता आणि जिन्स टॉप हे पोशाख तिला अधिक सुटसुटीत आणि सोयीचे वाटतात. आजची स्त्री आपल्या स्वास्थ्यासाठी जागरूक आहे. आपले शरीर तंदुरुस्त ठेवण्यासाठी ती रोज योगा, व्यायाम करते. आणि अनेकांना याची शिकवण ही देते आहे. आजच्या कुटुंबात  मुलगा मुलगी यांच्यात आणि त्याच्या संगोपनात कोणताही फरक केला जात नाही .

बेटी बेटा एक समान…

                       दोनों को मिले एक सम्मान..!

 

 शहरातील हा आधुनिक विचार हळूहळू खेड्यापाड्यात झिरपत आहे. आणि त्याला अनेक लोक प्रतिसाद देऊन मुलगा वंशाचा दिवा आहे;  तर मुलगी ही आज त्या दिव्याची वात समजली जाते.  अनेक लोक तर मुलीला दिवा नाही तर पणती म्हणतात. ते म्हणतात ना,  “मुलगी शिकली प्रगती झाली”  त्याप्रमाणे मुलीला शिकवीन एक घर नाही तर अनेक कुटुंब ती शिक्षित करत प्रगती करत आहे.

 

दरिया की कसम,

मौजो की कसम,

ये ताना बाना बदलेगा,

तू खुदको बदल!

तू खुदको बदल!

तब ही तो जमाना बदलेगा…

 

हे  समजुन स्त्रीने आज खरचं समाजात अनेक बदल घडवून आणले आहे.

 

आजच्या युगातील स्त्री ही विचारी आहे.  ती प्रत्येक गोष्टीचा वैज्ञानिकदृष्ट्या विचार करू लागली आहे. तिची आता अंधश्रद्धाच्या नावाखाली फसवण कठीण नाही तर अशक्य झाली आहे. ती आज काळानुसार बदलू पाहतेय. गेल्या काळातील स्त्री आणि आजच्या शतकातील स्त्री यात मोठे अंतर निर्माण झाले आहे. आजच्या स्त्रीचा मार्ग जात आहे फक्त आणि फक्त विकासाकडे, प्रगतीकडे आणि वैभवाकडे.

~ पूजा फंगाल

   विभाग-मुंबई

 

साऊ…

पूर्वीपासून एक पद्धत आहे स्त्री ला किंवा मुलीला मासिक पाळी आली की तिने सर्वांपासून लांब एका जागेवर बसायचं. तिला शिवायच नाही, असे काही शब्द म्हणायचे. म्हणजेच तिला पाच दिवस स्पर्श करायचा नाही, तिची स्वतःची कामे तिनेच करायची, घरातल्या कोणत्याच गोष्टींना मुख्यतः देव घरात जायचे नाही.

 

या सगळ्या पूर्वीच्या रूढी परंपरा आहेत, आता ही खेड्यापाड्यांमध्ये या परंपरांना खतपाणी घातलं जातं. सध्याची पिढी सुशिक्षित, वैज्ञानिक दृष्टिकोन असल्यामुळे या गोष्टींना मान्यता देत नाही. माझ्या आजी ला मी विचारले, हे सगळं असं का? वेगळं का राहायचं! का नाही? मासिक पाळी आल्यावर सगळीकडे वावरता येत. तर आजी म्हणते, माझ्या खूप पिढ्यांपासून ही पद्धत आहे. पण या गोष्टीचे मूळ काय आहे, याचा कोणी विचार करत नाही. म्हणजेच केवळ हीच गोष्ट नसून पूर्वीच्या  सगळ्याच रुढी परंपरांमध्ये काहीतरी सत्य किंवा काहीतरी समाज हित दडलेले आहे, असे मला वाटते. एका पिढीकडून दुसऱ्या पिढीकडे कोणतीही शिकवण प्रसारित केली जाते . खूप पिढ्यांमधून येते मग काही वेळा त्यात काही आपल्या मनाचे किंवा  काही कमी जास्त गोष्टी त्यात वाढवल्या जातात. आणि काहीच नाही जमलं तर त्या देवाशी बांधल्या जातात. जसे मासिक पाळी आलेल्या स्त्री ने स्वयंपाक घरात जायचे नाही देवाच्या मूर्तींना स्पर्श करायचा नाही.

 

पूर्वी स्त्रियांना शेतीची कामे, घरातील कामे, बाराही महिने करावी लागत असे. आणि मासिक पाळीच्या काळात त्यांना क्षणभरही आराम करण्यास वेळ मिळत नसे. आणि गावची कामे ही प्रत्येकालाच माहिती असेल. शेतातील कामे भारा उचलणे, लाकडांची जड मोळी उचलणे, जाते ओढणे, एक कोस लांब विहिरीवरून हंड्यानी पाणी भरून आणने, वरवंटा पाट्याचा वापर करणे, शेणाने घर सारवने, गोठ्यातील गुराढोरांना वैरण पाणी देणे, अश्या नाना प्रकाराच्या कामांनी स्त्री अर्धी होऊन जायची. जड वस्तू उचलणे या कालावधीत तिला शक्य होत नसे. म्हणून तेव्हाच्या काळात कोणी तरी स्त्री चा विचार करून  ही प्रथा सुरू केली असावी. की जेणे करून या सगळ्या पासून स्त्री ला किमान पाच दिवस तरी निदान थोडासा शरीराला आराम मिळावा; आणि मासिकपाळीच्या दुखण्यास स्त्री चे शरीर ते सोसण्याइतके तरी सक्षम व्हावे. पण हळू हळू काळ निघून गेला. आणि देवाला शिवायचे नाही, अशी काही दरिद्री प्रथा सातत्याने सुरू ठेवली. म्हणजे यात सत्यता कुठेच आढळत नाही. केवळ स्त्रीला समाजात कोणतेच स्थान नाही अशी अमानुष वागणूक तिला सोसावी लागते. पूर्वी स्त्रीच्या चांगुलपणाचा विचार करून सांगितलेल्या गोष्टीस आता तिला एक दुय्यम दर्जा दिल्यासारखी वागणूक या प्रथेतून केली जाते. पूर्वीची स्त्री काय आणि सध्याची  स्त्री काय सगळं सारखच आहे. आजही स्त्री ला तिच्या ऑफिस मधून किंवा घरकामातून मासिक पाळीच्या कालावधीत सातत्याने काम करावे लागते.

 

आपण आजही पाहतो स्त्री ही कुठेही कमी नाही.  स्त्री किती सक्षम आहे याची उदाहरणे आपल्याला आजही पाहायला अनुभवायला मिळतात. ज्यांनी ज्यांनी स्त्री ला कमजोर समजले आहे, त्यांना खोटं ठरविण्याची तयारी स्त्री ची आज ही आहेच. कित्येक स्त्रियांना सावित्रीबाई ज्योतिबा फुले हे उदाहरण वेळोवेळी आत्मविश्वास वाढवते, क्रांतीची ज्योत साऊ ही आजही आपल्या मनाला प्रकाशमान करते.  खरच ज्या घरात असे होत नाही किंवा मासिक पाळी आल्यावर मुलीची बायकोची बहिणीची काळजी घेतात. त्या घरातील स्त्री खरच खूप नशीबवान असेल किंवा मासिक पाळीच्या कालावधीत प्रत्येक स्त्रीची काळजी घेणे हे तिच्या सहवासातील पुरुषांचे कर्तव्य आहे. किंवा निदान तिच्यावर कामाच जास्त ओझं पडणार नाही याची तरी दक्षता घेणे, काळजी घेणे, महत्वाचे आहे. समाजात स्त्रीचे महत्व खरच खूप आहे. जास्त लांब न जाता घरात आपली आई किती राबते त्यावरूनच अंदाज लावा. पाच दिवस वेदना सहन करून सुद्धा समाजात वावरताना ती आपल्यासमोर हसरा चेहऱ्या मागे स्वतःच्या वेदना लपवत असते.

 

हा लेख आज मुद्दाम तुमच्यासमोर मांडतेय कारण आज क्रांतीज्योती सावित्रीबाई  फुले यांचा जयंतीदिन. त्यांनी साऱ्या जगाला दाखवून दिले, की स्त्री ही केवळ ‘चूल आणि मूल’ या विधानांसाठी नाही, तिला सर्वत्र जग जिंकता देखील येतं आणि चार भिंतींना चांगलं कुटुंब देखील बनवता येतं. त्यामुळे खरोखरच मुख्यतः स्त्रियांना अनेक प्रकारच्या यातना सोसून ज्ञानाचे दूध सावित्रीबाईंनी पाजले आहे. अशा वीर पराक्रमी मातेस, माय ज्ञानज्योतिस विनम्र अभिवादन आणि लाल सलाम!

 

म्हणूनच यावर मला शाहीर शीतल साठ्ये यांच्या गाण्यातील काही ओळी येथे नमूद कराव्याश्या वाटतात.

 

 

साऊ…पेटती मशाल साऊ

आग ती जलाल साऊ…

शोषितांचे ढाल साऊ

मुक्तीचे पाऊल….

 

 

~ काजल बच्चे

    विभाग-मुंबई

प्रेम आणि मी….

रोजच्या दिनक्रमा प्रमाणे माझा आजचा दिवसही सरला, शिशिरातल्या संध्येच्या दाट छायेत गार वारा झोंबू लागला आणि रात्रीचा प्रहर सुरु झाला. आल्हाददायक, ऊबदार, आणि आपलासा वाटणारा प्रहर म्हणजे रात्र! मलातर रात्रीची वेळ ही कायम माझ्या हक्काची आणि आपुलकीची वाटते. आणि त्यातल्या त्यात माघातल्या महिन्यात सर्वांगाला बोचणाऱ्या थंडीत, बिछान्यातल्या उबदार दुलईतली रात्र कधीच संपू नये असं मला नेहमी वाटतं…

दिवसभराच्या थकव्यानंतर रात्रीच्या निवांतक्षणी नेहमीप्रमाणे अनेक गोष्टींच विचारचक्र माझ्या मनात सुरु होतं. उद्याच्या दिवसाचं प्लॅनिंग,ऑफिसमधली काही उगाच  रेंगाळलेली कामं पूर्ण करण्याचा मनाशीच केलेला अट्टाहास, काही क्रिएटीव्ह कल्पना आणि वगैरे..वगैरे…! ऋतूचक्राप्रमाणे रोजचं येणाऱ्या त्या रात्रीत नवीन असं काही घडत नव्हतं.. कानात हेडफोन्स घातले, सवयीप्रमाणे झोपताना मला आवडणारं रफीदा यांच गाणं लावलं.. ”मुझे छू रही है, तेरी गरम सांसे..मेरे रात और दिन ये महकने लगे है…तेरी नर्म सांसो ने ऐसे छुआ है, के मेरे तो पांव बहकने लगे है..” रात्रीच्या निरव शांततेत रेट्रो गाणी ऐकताना मला नेहमी स्वतःच्याच प्रेमात आपण पडलो की काय असं काल्पनिक फील येतं.. मग मनात पुन्हा एकदा नॉस्टेल्जिक कल्पनाविश्वाचं मोहमयी जाळं तयार होतं. मी वेगळ्याच प्रेममयी विश्वात रममाण होते…आणि गाढ झोपून जाते…

त्यारात्री भल्या पहाटे एका अवचित क्षणी मला जाग आली, अशी अवेळी जाग आली ना की झोपमोड होते.. झोप येईना म्हणून अंगावरची उबदार दुलई बाजूला करत मी बाल्कनीत आले, शिशिरातल्या त्या बोचऱ्या थंडीत एक एक नक्षत्राचा दिवा अजूनही आभाळात तेवत होता… चमचमणाऱ्या ताऱ्यांचा प्रकाश, आभाळातली ती निळाई आणि झोंबणारा तो गार वारा मी एकटीच अनुभवत होते.

अशी धुसरशी प्रणयी चांदणंपहाट मला मोहवून टाकत होती, त्या निरव शांततेत फक्त एकमेव रंग, जो सारा आसमंत व्यापून टाकत होता, कणाकणांनी बहरत होता, काही क्षण असेच गेले, बराच वेळ फक्त शांतता!निःशब्द! कितीतरी वेळ फक्त शांततेचाच नाद होता, निःशब्दांची जुगलबंदीच रंगली होती, कुठेही माणसांची चाहूल नाही, पायरव नाही.. जमली होती ती फक्त काजव्यांची मैफिल अन त्याच्या नादमय चालीन माझी पहाट गुलाबी झाली होती, पहाटेला ही इतका अनवट नाद असतो, हे मी अनुभवत होते. स्वतःच प्रेमात मी पडले होते त्या बहरणाऱ्या रात्रीसाठी..! उद्याचा दिवस सुरु होण्यापूर्वीच्या त्या एकाकी रात्रीत..! ना कुठे आवाज होता, ना माणसांच्या अस्तित्वाची चाहूल, ना कोणी सोबतीला..आणि तरीदेखील मी प्रेमात पडले होते, त्या रात्रीसाठी…! असं म्हणतात की पहाटेच्या साखरशांततेत आपण जो विचार मनापासून करतो तो खरा ठरत असतो. त्यावेळी माझ्या मनात अनेक विचार आले. आयुष्याविषयी.. माझ्या आजपर्यंतच्या प्रवासाविषयी..आणि उद्या म्हणून येणाऱ्या असंख्य स्वप्नांविषयी..! मी या सगळ्या विचारांत रममाण झाले होते. ती मोहक शांतता मला हवीहवीशी वाटत होती. बाल्कनीतल्या झोपाळ्यावर बसून कितीतरी वेळ मी निळसर अंधाराशी हितगुज करीत होते. जसे घड्याळातले काटे पुढं सरकत होते तशा आभाळातल्या निळाईच्या अनेक छटा आपलं सौंदर्य उघडपणे दाखवीत होत्या. आभाळातल्या एकच निळ्या रंगांची अनेक रूपं मी त्या रात्री पाहत होते.

रंगांच्या या सोहळ्यात शिशिराची थंडी सुद्धा सर्वांगाला बोचत होती. ती शांततेतली रात्र मला विस्कटायची नव्हती, आणि म्हणून मी अलगद पावलाने स्वयंपाकघरातल्या ओट्यापाशी आले. फारसा आवाज न करता मी कडक वाफाळती कॉफी बनवली, आणि पुन्हा झोपाळ्यावर येऊन बसले. कॉफीचा एक एक घोट संपवत मी पुन्हा त्या शांततेतल्या रात्रीत मला रममाण करून घेतलं. आणि त्याच्या स्वाधीन झाले.

माणसं सहसा दिवसाढवळ्या दिसणाऱ्या  निसर्गाच्या प्रेमात पडतात. पण मी मात्र अंधारातल्या त्या देखण्या रात्रीच्या प्रेमात पडले होते. मी म्हणते का नाही पडावं अंधारातल्या रात्रीत..? फिल्म्समध्ये दाखवतात तसं’ ये प्यार क्या होता है?’ असं अगदी भाबडेपणाने नायकाला विचारणारी चित्रपटातील नायिका जेव्हा झाडांच्या मागे पळते, नाचते, बागडते, आणि गाणं सुरु होऊन प्यार क्या है? असं बालिशपणे विचारत आपल्या प्रेमाची कबुली प्रांजळपणे देते. तसं मी या अंधाराला तू देखणा आहेस; असं म्हणत माझं प्रेम दाखवीत होते. प्रेमाची भाषा प्रत्येकाची वेगळी आहे असं कोणी म्हणत असेल तर मी त्यांना म्हणेन प्रेमाच्या भावनेला अनेक पदर आहेत. प्रत्येक पदराला तलम, रेशमी असंख्य सुक्ष्म पापुद्रे आहेत. मग त्या प्रत्येक पापुद्र्यात अगणित अलवार, नाजूक भावनांचे बंध आहेत.

माणसांची चाहूल नसलेल्या अस्पर्श कोऱ्याकरकरीत पहाटेशी मी प्रेमाचे अबोल क्षण मनमुरादपणे घालवीत होते. पण त्या कोऱ्या करकरीत पहाटेचं रूपं आता उजाडायला लागलं होतं. बहुदा त्याची निघण्याची वेळ झाली होती. पण पुन्हा रात्री मी भेटायला येईन असं आश्वासन देऊन तो हळूहळू गुडूप होत होता. दिवस उजाडला की आमच्या नात्यातला विरह आणि भेटीची ओढ रोजच्या सारखीच सुरु होणार होती. आता बाल्कनीतला चाफा सुद्धा गारठून आपला सुगंध पसरवित आळस झटकत उठण्याच्या तयारीत होता. काटेरी असल्याने गुलाबाला उठायला जरा उशीर होत असावा, पण तरीदेखील थंडीतही तो गोंडस दिसत होता, सदाफुलीच ही तसंच, मोगऱ्याचा मोहक सुवास मात्र प्रसन्नपणे दरवळत होता.

दिवस सुरु झाला. चहूकडे पाखरांचा किलबिलाट नाद करू लागला. माणसांचा गजबजाट ऐकू आला. गर्दीने पुन्हा एकदा आपापल्या रस्त्यांवर आपली जागा घेतली. इतका वेळ शांत राहिलेला प्रवाह आता पुन्हा धावायला लागला. मी ही पुन्हा झोकून दिलं प्रवाहाबरोबर मला! कारण मला अंतर्मनापासून भेटायचं होतं पुन्हा एकदा माझ्या रात्रप्रेमाला..!!

~ अनुजा मुळे, (RJ ANU, Radio Nagar 90.4FM, अहमदनगर)

बेटी..

बेटी ऐसी शक्ती है जो हर जख्म सह सकती है,

रूढीवादी मानसिकता वालो पर एक चाटा होती है!

बेटी कमजोर नही कामयाब होती है,

कभी मासूम बच्ची जैसी हसती वो,

कभी नटखट अंदाजो से दिल मै बसती है!

अपने कर्तव्य खुब तरहा निभाती है,

अपने बुद्धि,प्रतिभा को भी दर्शाती है,

बेटी ऐसी शक्ती है जो तुफानो से भी लढती है!

देख सकती है सब कुछ पर कुछ कह नही सकती,

आंखो मे भरे होते है सपने उसके….

सपनो के खातिर, हजार मुश्किलो मे भी खुदको संभालती!

आज का युग पड रहा बेटी पर भारी,

रेप, छेडछाड, ॲसिड अटॅक,

इनमे नष्ट हो रही है, इंसानियत सारी!

संभाल कर घर सारा, साथ देती वो उम्र भर का,

फिर भी भेदभाव करते हो यु तुम लडकी – लडके का,

क्या दोष है इनमे बेटी का?

निपुण तो है वो हर काम मे,

नौकरी भी करती, संभालकर चुल्हा-चौका….

खुशियां अपने साथ लाती है,

दिल मे दर्द समाये, हर दम मुस्कुराती है!

सारे रिश्ते खुब निभाती है,

कभी कभी छोटी बातो पर भी आसू भर लाती हैं…

आत्मविश्वास और सरलता से मन मोह लेती है,

जितनी अपने कर्त्यव्यो के प्रती ठाम रहती है,

उतनी ही मजबुती से खुद संभलती है!

बेटी जन्मे जिस घर,

खुशीयाली से भर जाता है वो घर ,

…….हा बेटी हू, कोई बोझ नही,

जिना चाहती हू,जिकर बताऊंगी,

मे बेटी धूल नही किसिके पैरो की…

आस्मान छुने वाली पंछि,

आस्मान छुकर बाताऊंगी!!

~ किरण कांबळे

   विभाग – नाशिक