प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता- ‘माँसाहब जीजाऊ!

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के संबंध में जो मूल्य आवश्यक होते है; उसका जिक्र करना लाज़मी है। वह मूल्य आते कहाँ से है? उनका होना कितना अहम होता है? ऐसे कई सवाल अपने आप दिमाग में आते है। और इतिहास के पन्ने पलटने शुरू होते है। जनता का स्वराज्य निर्माण करते समय कौन से मूल्य मददगार सबित हुए होंगे? इसका जवाब हमें सोलहवी सदी के अंत में धीरे धीरे उभरते हुए दिखाई देता है। शाही रियासतों में भारत के मूलनिवासी लोग सेवा में इसलिए जुड़े थे, कि अपने भविष्य में आनेवाली कौम का गुजारा सही ढंग से हो सके। शाही रियासतों ने अपने बेहिसाब शान-ए-शौकत, दौलतमंदी के बलबुतेपर उनको अपने साथ जोड़ लिया। उन्होंने कई कर्तबगार तथा जाँबाज़ सिपाहियों को अपने रियासतों में सरदार, जहाँगीरदार तक बनाकर रखे हुए थे। यह लेख इतिहास के कालक्रम को केवल समावेशी विश्लेषण करके अपने शब्दों में बया करता है। 

स्वराज्य की नींव रखने की पहली पहल राजे शाहजी महाराज ने की थी, मगर स्वराज्य की संकल्पना लखुजीराजे जाधव और म्हालसाराणी के कोक से जन्मी जिजा के मनमस्तिष्क में आकार ले रही थी। जीजा का सफ़र माँसाहब जीजाऊ तक का मूल्य पर ही आधारित था। जीजा का जन्म 12 जनवरी 1598 में महाराष्ट्र के बुलढाना जिले के सिंदखेड़ गाव में हुआ था। जन्म से ही जीजा ने अपने पिता को निजामशाही के दरबार में मुजरा, कोरनिश करते देखा था। वह सोचती थी कि उनके गाव के महल में याने सिंदखेड़ में सभी सिपाही उनके पिता लखुजीराजे को आदर के साथ मुजरा करते थे। फिर निजाम के दरबार में मेरे पिता क्यों उनके सामने झुकते है। आत्मसम्मान का यह पहला दाखिला हो सकता है। उनके पिताजी ने उन्हें छोटी उम्र से ही हर कला से अवगत कराया था। इसलिए हिम्मत तथा निडरता जीजा के मन में ढाल की तरह मजबूत बन गए। शाही रियासती में जनता दहशत के मारे झुकती तथा सलाम करती मालुम होती थी। लेकिन तत्कालिन लखुजी राजे और मालोजी राजे उनको उनके सरदार आदर के साथ मुजरा तथा सलाम करते थे। यह भेद जब से जीजा को पता चला तब से अपने स्वराज्य की संकल्पना उसके मन में दृढ़ बनती गई। 

वेरुल के मालोजीराजे भोसले भी निजामशाही में एक ईमानदार जाँबाज़ जहागीदर के तौर पर थे। उन्होंने अपने बेटे शाहजी तथा शरिफजी को भी शौर्य की वर्णमाला बखुबी से सिखाई थी। जब शाहजी बड़े हुए, उनका विवाह जीजा से हुआ। आज तक केवल दूर से ही निजामशाही की सेवा करनेवाले दो मराठे जहागीरदार सरदार संबंधि बन गए। हमने “ तोड़ो और राज करो”  यह नीति अँग्रेजों के समय सुनी थी। पर इसका अमल सत्रहवी सदी के आरंभ से शुरू हुआ होगा, ऐसे इस परिपेक्ष में दिखाई देता है। सत्ता और दौलत के चक्कर में परिवार में ही गद्दारी करने पर इन शाही रियासतों ने जाधव-भोसले परिवार को मजबूर कर दिया था। आखिरकार शाही रियासती के मंसुबे इन भोसले–जाधव इन दो परिवार में फूट करने में कामयाब हो गए। इसी चलते कभी वे निजामशाही तो कभी मुघलशाही में जानेआने लगे। पर इसी दौरान शाहजी राजे और जीजाबाई अपने स्वराज्य निर्माण के काम में एकग्रता से जूट गए थे। जब शाहजी सेना के सरनौबत बन गए, तब तो इस अधिकार से उन्होंने अपनी जनता को जो दहशत में जी रही थी; उन सभी मराठे सरदारों को विश्वास दिलाया और अपनी जनता को हौसला रखने को कहा। उनका कहना था- जनता का स्वराज्य निर्माण के काम में आपकी एकता और विश्वास जरूरी है। इस काम में लोगों को जोड़ने के लिए वह बहुरुपियाँ तक बन गए थे। 

शुरुवाती दिनों खेत/जमीन का लगान बहुत ही बेरहमी से मुघलों ने वसुला था, आगे चलके निजामशाही भी उसी लुटालूट पर उतरी। जब आस-पास लुटालूट, दहशत, औरतों अब्रू लुटना, खुन-खराबे को आखिरकार ठुकराकर जनता इस उभरते स्वराज्य संकल्पक शाहजीराजे भोसले के पक्ष में खड़ी हुई। जिस जीजा ने इस कल्पना को साकार होते देखा उसे हम स्वराज्य जननी कहते है। उन्होंने हर एक इंसान को विश्वास के साथ साथ सुरक्षा भी प्रधान की। उनके हुनर देखकर नौजवानों को सेना में भरती होने की संधी उपलब्ध कराई। एक उदाहरण आप ने सुना होगा- जब जंगली सुवर और रनगवा खेतों का बड़ा नुकसान कर रहे थे, तब उन्होंने एक फर्मान जारी किया था। – अगर इन जंगली जानवरों को रोकने का कोई इंतज़ाम करेगा; उन्हें सुवर्ण मुद्राएँ दी जाएगी।“ इसके दुसरे ही दिन से नौजवान, जिगरबाज लोग आगे आने लगे। एक बार एक नौजवान रात के 12 बजे राजमहल में जंगली जानवरों का प्रबंध करके सबुत के तौर पर उस जानवर की पूंछ लेकर माँसाहब जीजाऊ से मिलने आया। समय रात का होने के कारण उन्हें जाने को कहा मगर वह जाने के लिए तैयार नहीं था। इस अनबन की आहट जब जीजाऊ माँसाहब के कानों तक पहुँची, तब वे बाहर आए। उसे पुछा- कल सुबह आते तो भी हम आपकी बहादुरी के लिए सुवर्ण मुद्राएँ देते थे। इतना विश्वास नहीं है? और साथ में ही उसका नाम भी पुछा – उसने कहा-  दानाजी मालुसरा, माँसाहब सुवर्ण मुद्रा के लालच में अभी नही आया हूँ। आपने दिया हुआ काम पूरा करने का सौभाग्य मुझे मिला, बस यही बताकर आपका आशिर्वाद लेने आया हूँ।“ इस जवाब से हम सोच सकते है। स्वराज्य निर्माण का काम कॅडरबेस था। आगे दानाजी स्वराज्य के सेना में सामिल हुआ। 

लगान माफ न करने के कारण गाव के सभी लोग जंगलों में भागते रहते थे, ताकि लगान से बच जाए। कोई दौलतमंद सरदारों का काफिला जाते दिखता तो वह उसे लुटते थे। आगे चलकर उन्हें घुमंतू, पारधि,रामोशी, के रूप में पहचाने जाने लगे। लुटपाट करने की एक ही वजह थी; खेत से आनेवाला अनाज लगान के रुप में शाही बादशाहओं को देना पड़ता था। गुजारा करने का कोई उपाय नही बचता था। तब जा के वह केवल डरा धमकाकर लुटते थे। पर जीजा ने उसे भी बदल दिया। कल तक जो जीजा थी वह अभी जनता के लिए माँसाहब जीजाऊ (आऊ याने माँ) बन चुकी थी। उन्होंने जरूरतमंदों को अनाज दिया, रोजिरोटी दी, स्वराज्य के काम में सामिल किया, ऐसे कई काम देकर जनता को अपना बनाया। औरतों का सम्मान और सुरक्षा महसूस  होने से उन्हें जनता से एक जनादेश मिलता गया। इसी बलपर स्वराज का निर्माण हुआ था। 12 जनवरी को माँसाहब जीजाऊ जन्मदिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस यह दोनों घटनाएँ मूल्य से अलग हो ही नहीं सकती है। जिस मूल्यों को हमने संविधान में बोया है, वही मूल्य हमें माँसाहब जीजाऊ के जीवन में दिखते है। समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, धर्मनिरपेक्षता, ईमानदारी, जैसे मूल्य आसानी से उनके जीवनी से दिखते है। पीड़ित जनता को समझकर- समझाकर बदलाव का विश्वास दिलाना, आज के चुनावी भाषणों  जितना आसान नही था। 

जनता के बात पर विश्वास करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया, स्वराज्य को खड़ा करने में जिसकी जितनी क्षमताएँ उनको उतनी संधी, अवसर उपलब्ध कराया। लोगों में हिम्मत आयी और सुरक्षित जनता का स्वराज्य निर्माण हुआ। इस राजमाता की भुमिका केवल शाहजी राजे की पत्‍‌नी तक सीमित नही थी। जब सिंदखेड़ में बचपन की तालीम हों रहीं थी, तब से आत्मसम्मान की बातें जीजा करती आ रही थी। शाहजी राजे की पत्‍‌नी के रूप में जब वे थे, तब खौंपनाक उन शाही रियासतों के बीच जाधव और भोसले पारिवारिक कलह को मिटानेवाली निर्णायक व्यक्ति, स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षा, आदर, जैसे मूल्यों को हरवक्त दोहरानेवाली कुम्हार की कलाई थी; मानो किसी मिट्टी को आकार देकर सपने को साकार कर रही हो! आऊ के रूप में छत्रपति शिवाजी महाराज के पीछे महाकाय कल्पतरू बनी थी। अपने सपनों को साकार करने में शिवबा को तैयार करनेवाली वात्सल्य जननी थी। उन्होंने शिवबा में सद्गुण, शौर्य, दूरदृष्टि, राजनीति, कुशल प्रशासक जैसे मूल्यों को बोया था। 

अक्सर हम कहते है- स्वराज्य संस्थापक शिवबा को जन्म देनेवाली जीजाऊ है। इसमें कोई दो राय नही है। हमने शिवबा की महानता को सराया है। पर स्वराज्य संस्थापक  होना, कोई आम बात नहीं थी।  इस स्थिती में शरिर से मस्तिष्क तक विचारधारा देना मूल्यों के बिना मुमकिन नही था। इसलिए स्वराज के विचार तथा संकल्पना की जननी माँसाहब जीजाऊ ही है। स्वराज रक्षक संभाजी के परवरिश में भी माँसाहब जीजाऊ का अमूल्य योगदान था। माँसाहब जीजाऊ का स्वराज्य, आत्मसम्मान, सुरक्षितता, जनता के स्वराज्य की जननी तक का सफ़र अनोखा है। खेत में झुलनेवाले किसी भी अनाज के पत्ते को भी छुना नहीं, ऐसी ताकीद देना, हर औरत को माँ के समान समझना, हर सिपाही का हौसला बुलंद करने के लिए गले लगाना, इसी से ही जनता का स्वराज इतिहास के पन्नों पर सुवर्णमुद्रित हो सका। 

गणतंत्र दिवस के इस अवसर पर प्रजातंत्र के बीज बोनेवाली राजमाता को स्मरण करना मौलिक अभ्यास से जुड़ा था। वह एकाधिकारशाही, राजेशाही जरूर थी, मगर जनता का जनाधार सरआँखों पर था। सामाजिक मूल्यों की वह अतुलनीय प्रणाली थी। मैं उस गणतंत्र को आज के लोकतंत्रात्मक गणराज्य के भारत से मिलता-जुलता पाता हूँ। संवैधानिक भारत के निर्माण में मूल्याधारित सक्रिय नागरिकों को तैयार करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। माँसाहब जीजाऊ ने जो सत्रहवीं सदी में साकार करवाया, शायद हमें उस सुवर्ण इतिहास में एक और बार दौरा देना होगा। जिससे हम इस आधुनिक भारत में कॅडरबेस जनता निर्माण कर सकें।   

धन्यवाद 

अमित शालिनी शंकर पवार 

“असावा असा, ‘युवा’ देशाचा। “

निर्माण करेल  देशप्रेमाची  सर्वसमावेशी विचारधारा….. 

जातीपातीची भिंत मोडणारा , नव्या विचारांना घेवून चालणारा…. 

असावा असा युवा देशाचा।।

हक्कासाठी भांडणारा… न्यायासाठी लढणारा…. देशहित बघणारा…. शुरवीरांना जाणणारा…. 

धीटासारखे राहून गुलामगिरीला तोंड देणारा…. उठून त्याचे प्रश्न सोडवणारा…. 

 असावा असा युवा देशाचा।।

बलाढ्य , समृद्ध देश टिकवणारा….. 

जिवलगासाठी जीव देणारा…. गोर गरीबाला हात देऊन साथ देणारा…. अन्यायावर जाब विचारणारा…. 

असावा असा युवा देशाचा।।

देशाच्या मातीला न विसरणारा…. 

आपुलकीची नाती जपणारा …… 

देशासाठी प्राण अर्पणारा…. रणांगणावर  हार न मानणारा…. इतिहासात नाव  अजरामर करणारा…. 

असावा असा युवा देशाचा।

सर्वधर्म समभाव मानणारा … 

जाती धर्माचे राजकारण न  करणारा…. सर्वांमध्ये गोडवा निर्माण करणारा…. स्त्री-पुरुष समानता जोपासणारा…. 

असावा असा युवा देशाचा।।

शिवाबाच्या तलवारीसारखा चमकणारा …. 

भीमाच्या पेनासारखा धमकणारा….. 

उद्याच्या चैतन्यावर विश्वास ठेवणारा … 

निडर होऊन संरक्षण करणारा…. 

 असावा असा युवा देशाचा।

– किरण कांबळे

सामाजिक परिवर्तन!

 

        सामाजिक परिवर्तन आणण्यासाठी अगोदर वैचारिक परिवर्तन आणण अधिक महत्त्वाचे आहे. सामाजिक परिवर्तन तेव्हाचं येऊ शकते, जेव्हा समाजाच्या बहुसंख्याकांमध्ये वैचारिक क्रांती निर्माण होईल. त्याच वैचारिक क्रांतीचे  रूपांतर सामजिक परिवर्तनामध्ये होते आणि परिणामी सदृढ, सक्षम आणि स्वावलंबी समाज निर्माण होतो.

           सामाजिक परिवर्तनाच्या आपल्या स्मृती प्रमाणे व्याख्या आहेत. आधुनिक संसाधनाचे प्रसारण करून समाजाचे आधुनिक युगात पदार्पण होणे. तसेच संशोधन समाजाचा खचलेला भागात, आणि त्यांचं उच्चानटन. पण कधी कधी जागतिक पातळीवर प्रसारण आणि संशोधन काहीसे निष्फळ ठरतात. कारण हे सामाजीक परिवर्तनाचा मूळ नाही; तर वरचा भाग मी समजतो. समाजाला पूरक संसाधनांचा साठा मिळवून देणे कधीच सामजिक परिवर्तन होऊ शकत नाही.

           ज्या वेळेस पाणी पिण्यापासून तुम्हाला वंचित केले जाते तुम्हाला तुच्छ गणले जाते. तुम्हाला जाणीव करून दिली जाते की, तुम्ही दूषित आहात आणि हे कर्मकांड नसून तर हे नैसर्गिक आहे. आणि ते एवढं प्रभावी पडत तुमच्या डोक्यावर की तुम्ही स्वतःला ग्राह्य धरतात की तुमचा जन्म तुच्छ म्हणून झालाय. तेव्हा ह्या भूललेल्या अस्तित्वाला वैचारिक आणि वास्तवाचा आरसा दाखवला जातो. तेव्हा ती व्यक्ती सामाजिक परिवर्तन स्वबळावर करते.

          संसाधनांचा पुरवठा प्रभावी नसतो कधीही.  जेव्हा तुम्ही विचार करता की, मी नुसतं पुस्तक नाही वाटणार तर त्यांना वाचण्यास एवढं प्रेरित करेन की, ते कुठलाही संघर्ष स्वतःचा हिमतीवर आणि पेनाच्या बळावर करू शकतात.  तेव्हा हे तुमच्याकडून झालेलं सामाजिक परिवर्तन आहे. पण सामाजिक परिवर्तन करायला टोकाची इच्छाशक्ती लागते. स्वतःला प्रेरणादायी व्हावं लागतं. तुम्ही तेव्हाच समाजात बदल घडवू शकतात, जोपर्यंत  तुम्ही स्वतः एकनिष्ठ प्रभावी आणि बदल करण्याचा ध्यास स्वतः मध्ये निर्माण करत नाही. तुम्ही जोपर्यंत समाजासमोर एक स्वावलंबी आणि प्रभावी चेहरा म्हणून समोर येत नाही, तो पर्यंत तुम्ही सामाजिक बदल घडवून आणू शकत नाही.  पण कुठेतरी विशेष करून आपला तरुण समाजाचा कानाडोळा होतोय. जे की परिवर्तनवादी प्रत्येक महामानवांना  वाटत असेल की आपण सोडलेला दोरखंड भविष्यात तरुणाईचं ताणून धरेन. पण आपण तो दोर सोडला आहे,का ताणून आहोत ? विचार करा……..

          आणि माझं असं वैयक्तिक मत आहे, जो कोणी बुद्धानंतर या देशात नाहीतर जगात जर यशस्वी सामाजिक परिवर्तन करू शकले असणार तर ते डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर आहेत.

         मला फक्त एवढंच सिद्ध करायचं आहे की, प्रयत्न करा कुठल्यातरी माध्यमातून प्रेरणास्रोत होण्याचा, जरी तुम्ही सामाजिक परिवर्तन नाही करू शकलात तरी तुम्ही वैचारिक क्रांती किंवा बदल नक्कीच घडवून आणणार.

जर हे तुम्हाला फिल्मी किंवा बोलण्याचा डिंग्या वाटत असल्या तरी ही वास्तविकता आहे. आज तुम्हाला त्या शिखरावर जावंच लागेल जिथून तुम्ही दुसर्यांना प्रेरणादायी आणि आणि सामजिक परिवर्तनाचा दुवा बनत नाही. आपण सगळे तेवढे सक्षम आहोत.

      ” ज्या लोकांमध्ये आपला जन्म झाला आहे त्यांचा उद्धार करणे आपले प्रथम कर्तव्य असायला हवे “

  • महामानव डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर

   – दिपक भालेराव

सोहळा…

रात्रभर जागून डोळे नुसते जळजळत होते. तरीही रहिम पहाटे लवकर उठला. ट्रंकेतून पांढरा शर्ट काढला..तसं म्हणायला शर्टाचा पांढरा रंग कधीच उडुन गेला होता..उरल्या होत्या फक्त शर्ट पांढरा असल्याच्या काही खुणा. झपाझपा अंगावर पाणी मारुन रहिम धंद्यावर जायला तयार झाला. रशीदा अजुनही गाढ झोपेत होती. अम्मी मात्र सकाळीच शिलाई मशीनवर काम करत होती. अम्मीने दिलेला काळा चहा संपवून रशिदने रामुचाचाच्या अड्ड्यावर  धाव घेतली. तिथे आधीच कमली, पारो,पक्या, छोटू, सलीम,अवत्या..सारी टोळी जमा होती. चाचानी सर्वांना एक-एक कटींग व दोन पारलेजीची बिस्कीटं दिली. रहिमने घटाघटा चहाचा ग्लास रिता केला अन् बिस्किट मात्र रशीदासाठी खीशात सरकवली. चाचानी सर्वांच्या हातात झेंड्याचे बंच दिले.

“सब बच्चालोग अलग अलग सिग्नल पे रुकने का”

“जी चाचा”

“कुछ भी करके ११ बजेतक सब माल खतम होना मंगताय” “माल रीर्टन लाया तो..तुमकोच पैसा देना पडेगा”

सगळे गप्पचं झाले..

“रात का ओवरटाईम और सारे झंडे बेचने का मीलाके ७० रुपया मिलेगा सबको..आई बात समझमे..चलो भागो अभी धंन्देपे..”

रशिदच्या चेह-यावर हास्य फुलले.. ७० रुपये मिळणार म्हणून…! जवळच्या पिशवीत झेंडे ठेवताना ते इवले-इवले हात झेंड्यांना गोंजारु लागले…… रात्र जागून बनवले होते ते झेंडे.

 सर्व पोरं वेगवेगळ्या सिग्नलवर विखुरली. रशिद सिग्नलवर थांबणा-या प्रत्येक गाडीकडे त्याची नजर भरधाव वेगाने धाव घ्यायची…. कोणी झेंडे घेत होतं..तर कोणी फक्त नजरेनेच नकार देत होतं…तर कोणी २ रुपयाच्या झेड्यांचा भावतोलही करत होतं….तर कोणी 5 ते 10 रुपये जास्तही देत होतं……परत सिग्नल उठला आणि गाड्या चालु झाल्या की, रशिदची नजर समोरच्या कंपाऊंडकडे जात होती. तिथे पूर्ण सफेद पोषाखात माणसं लगबगीने इथे तिथे वावरत होती..कोणी स्टेजवर तर कोणी खाली..बसले होते.. त्यातल्या एकाने हात करुन रहिमला जवळ बोलावलं. अर्धे अधीक झेंडे विकतही घेतले.. पैश्या बरोबर त्याच्या हातात एक वडापावही दिला…..   

तितक्यात एक लाल दिव्याची गाडी आली…. पूर्ण सफेद कपड्यात माणसं उतरली गेली….. रशिदने वडापाव बहिणी साठी पिशवित ठेवला..

चौकात मोठमोठ्यांनी भाषणं सुरू झाली. तितक्यात सिग्नल लागला अन् त्याला पुन्हा गाड्यांकडे धाव घ्यावी लागली. पण कान मात्र चौंकातच मागोवा घेत होते.

१ च्या सुमाराला पोटातली भुक कलकलायला लागली. झेंडे ब-यापैकी विकले गेले होते. आलेले पैसे मोजून खिशात ठेवताना, बिस्किटांना हात लागला..पण लगेच रशीदाचा चेहरा समोर आला.भुक पुन्हा स्मित  हसली अन् बिस्किट पुन्हा खिशात सरकवली गेली….

पुन्हा चौंकातल्या आवाजानी रशिदची नजर तिथे वळली. गाडीतून आलेल्या पांढ-या कपडेवाल्यानी झेंडा फडकवला..

“सावधान…राष्ट्रगीत शुरू करेंगे…शुरु कर…”

रशिदही उत्साहात जागच्या जागी उभा राहीला.एका हातात झेंडे..पोटात भुक अन् एका हाताने झेंड्याला सन्मान.

जयहिंदच्या जल्लोषात कार्यक्रमाची सांगता झाली. ११ वाजता पूर्ण चौंक सामसुम.. इतकावेळ गजबजलेला चौंक शांत झाला. रहिमही घरी जायला निघणार तेवढ्यात एक ओझरती नजर पुन्हा चौंकात गेली. क्षणभरासाठी ते पोर कळवळलं अन सरळ चौंकात धाव घेतली. गुढग्यावर बसून खाली पडलेले प्रत्येक झेंडे तो उचलू लागला. भरल्या डोळ्यांनी पायाखाली तुडवलेले झेंडे उचलू लागला. सर्व झेंडे छातीशी कवटाळून अनेक प्रश्नांचं ओझं डोक्यावर घेवून एक कोवळा भुकेला जीव देशाच्या प्रतिमेला छातीशी कवटाळून चालू लागला घराकडे….

    ध्वजस्तंभावर झळकणारा तो मलमलचा कपडा थोडावेळ का होईना खुष होता..निदान त्याच्या नशीबी रस्त्यावरची धुळ तर नव्हती.

 अम्मीने बनवलेली भाताची पेज भुरक्या मारत संपवून रशीदाच्या हातात दोन बिस्कीटं अन् वडापाव देवून थकलेला तो कोवळा जीव जमीनीवर पहुडला.

कारण आज रात्रीही पुन्हा जागायचं होतं त्या इवल्या हाताना उद्याची भुक आसमंतात भिरकवण्यासाठी…

…………

      (कसले हे स्वातंत्र आपुले, जिथे रोज मरते भुक हास्य लपेटुन)

   –   शिल्पा परुळेकर पै

लोकशाही राज्यघटनेचा मुहूर्त!

 बालपणीचा काळ सुखाचा असं म्हणतात ते उगाच नाही! आपण कितीही मोठे झालो तरी बालपणीचा आणि शालेय काळ कधीच विसरू शकत नाही. शालेय जीवनातील अनेक आठवणी, प्रसंग मलादेखील अजून आठवतात. असाच एक प्रसंग सुविचार लिहिण्याचा! स्वच्छ, सुंदर अक्षर हाच खरा दागिना! आणि याच युक्तीप्रमाणे माझं अक्षर असल्याने मला शाळेत आल्यावर फळा लिहिण्याचा दिनक्रम होता. काळ्या करकरीत फळ्यावर मी रोज सुविचार लिहीत असे . आणि असाच एक सुविचार लोकांचे, लोकांनी, लोकांसाठी चालविलेले राज्य म्हणजे लोकशाही राज्य! या सुविचाराचा अर्थ तेव्हा बारा-तेराव्या वर्षी मला फारसा उमगला नाही. पण जशा इयत्ता पुढे गेले तसा मात्र उमगला. 

इतिहासाबरोबरच नागरिकशास्त्र हा विषय आपल्या सर्वांनाच होता. या नागरिकशास्त्रात भारताच्या लोकशाही राज्यघटनेची मुहूर्तमेढ समजली आणि त्या सुविचाराचा अर्थ खऱ्या अर्थाने समजला. २६ जानेवारी १९५० ज्या दिवसापासून आपल्या भारतीय संविधानाला व्यवस्थेत समाविष्ट करून लोकांचीसत्ता सुरू झाली तो हा दिवस! संविधानाची रचना, संविधान बनवणे या सर्व प्रक्रियेत जेवढा कालावधी लागला तेवढंच अमूल्य योगदान हे डॉ राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव आंबेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबूल कलाम यांचं होतं. पण ज्या नागरिकांसाठी हे लोकशाही राज्य उभं करायचं ते नागरिक ती जनता सुद्धा या घटनेत संविधान सभा बैठकीत उपस्थित होती. 

विविधतेतून एकतेचं दर्शन ज्या संस्कृती, वेशभाषा, लोककलेतून घडतं ते आपलं लोकशाही राज्य! जनतेला  प्रगतीसाठी योजना आखण्याचा आणि अंमलात आणण्याचा पूर्ण अधिकार आहे आणि हाच अधिकार दिला लोकशाहीने! अधिकार, स्वातंत्र्य आणि मताधिकार जरी जनतेला मिळाला असला तरी त्याचे पालन आणि योग्य निर्णय घेणे हे देखील जनतेचे कर्तव्य आहे. आणि हेच राष्ट्रीय कर्त्यवाचं भान असणं ही आजच्या काळाची  गरज आहे. ज्यांनी आपल्या बलिदानाने वर्चस्वाच्या साखळ्या तोडल्या त्या महान देशभक्तांचं कायम स्मरण ठेवून लोकशाही राज्यघटनेची ही मुहूर्तमेढ अधिक बळकट करूयात!

– अनु मुळे

भारतीय राजनीति में महिलाएं कल और आज

भारतीय राजनीति में महिलाएं कल और आज

यूं तो हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में महिलाओं की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति ठीक नहीं  है। उन्हें हमेशा से ही पुरुषों द्वारा निर्धारित एक दायरे में रहने के लिए विवश किया गया, उन्हें जो आजादी और गरिमा के साथ जिंदगी जीने का अधिकार मिलना चाहिए था वो नही मिल सका। महिलाओं को अक्सर उपहास और तिरस्कार मिला, भले ही उन्होंने देश के विकास में  योगदान दिया हो, लेकिन उन पर व्यंग और कटाक्ष कुछ इस तरह से किया गया जैसे: तुम नारी हो, यही तुम्हारा दायरा है, खबरदार! अगर अपनी सीमा लांगी तो अच्छा नही होगा, तुम्हारा काम सिर्फ चौका बर्तन करना और घर की देखभाल करना है, ऐसे ही ना जाने कितने अपशब्द नारी को कहे जाते है, और शायद हमने सुना भी होगा। 

क्या लगता है आपको कि क्या उन्हें ये बात चुभती नही होगी, क्या उन्हे इन शब्दों से पीड़ा नहीं होती होगी, जी हां बिलकुल होती है।  लेकिन हमारे समाज का पुरुष प्रधान समाज इसे बर्दाश्त नहीं करना चाहता की कोई महिलाए उनकी बराबरी कर सके, कोई महिला उनसे आगे निकलने की कोशिश करे। हमारे देश की भारतीय राजनीति में पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने अपनी कामयाबी का परचम लहराया है।  इनकी भागीदारी से  जहां एक ओर भारतीय राजनीति को एक नई गति और नया आयाम मिला, वहीं दूसरी ओर रानी लक्ष्मीबाई, मैडम   बीकाजी कामा , कस्तूरबा गांधी,  अरुणा आसफ  अली ,  सरोजिनी  नायडू , तथा इंदिरा  गांधी जैसी  कर्मठ  और जुझारू महिलाओं ने हमारे  देश के स्वतंत्रता  संग्राम   में   महत्वपूर्ण योगदान दिया जो भुलाए नहीं भूल सकता।

 इस देश की  राजनीति में  वर्तमान समय में गिरिजा व्यास, सुषमा स्वराज, मायावती, वसुंधरा राजे, शीला दीक्षित, ममता बनर्जी, सोनिया  गांधी आदि ने अपनी सक्रियता दिखाई। इनमे से सुषमा स्वराज और शीला दिक्षित अब इस दुनिया में नही रही। हालांकि इन्होंने भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया और आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए सुनहरे अवसर प्रदान किए। हालांकि आज के संदर्भ में ये इतना आसान नजर नहीं आता, क्योंकि आज भी राजनीति में भले महिलाओं को जो पद मिलता है उसका नियंत्रण आमतौर पर उनके पति या पुरुष प्रधान समाज के पास होता है। उन्हें पूरी आजादी के साथ निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता। उन्हें आज भी सामंती सोंच के जंजीरों में जकड़ कर कैद करने की भरपूर कोशिश की जाती है। अतः आज जरूरत है तो बस इतनी कि महिलाओं को भी राजनीनिति में आने का अवसर दिया जाए और उन्हे खुद से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ा जाए। उनकी काबिलियत पर शक ना किया जाए और ग्रामीण क्षेत्रों के साथ साथ शहरों में भी लोकल स्तर पर चुनाव में उतरने के लिए महिलाओं की सीट और ज्यादा आरक्षित की जाए ताकि आने वाले कल की अच्छी शुरुआत कर सकें और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।  तभी हम एक बेहतर कल का निर्माण कर पाएंगे और महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचारों पर लगाम लगा सकते है, जिससे वो खुल कर देश की सेवाओं के लिए आगे आ सकें और फिर से देश को एक आयरन लेडी इंदिरा गांधी या फिर किरण बेदी जैसी बेटी मिल सके.!

  • सुजीत अनुराग

स्वतंत्र नारी…

सर्व  संकटावर मात करून सोपा मार्ग काढणारी भूमिका

कलानुकाळ  प्रत्येक क्षेत्रात छबी उठवणारी भूमिका

               . म्हणजे नारी ||

                   म्हणजे नारी ||

धर्म ग्रंथ असो वा कथा संग्रह असो वा साहित्य असो

            नारी शिवाय पुर्ण होणार नाहीत कधी. 

                            मग  !

              कोण म्हणतं नारी स्वतंत्र नाही |

    जगावर राज्य करणारी राणी  व्हिक्टोरिया  नारीचं  होती |

      परिस्थिवर मात करून  सतीच्या चालिला  विरोध करून

      स्वराज्यात झोकून देणारी जिजामाता  नारीच होती | 

                 स्वतंत्र लढ्यात झोकून देणारी 

                 लक्ष्मीबाई नारीच होती | 

         परिस्थिवर मात करून शिक्षणाचा वारसा  जपणारी

                  सावित्रीबाई नारीच होती | 

        भारताची पंतप्रधान इंदिरागांधी नारीचं होती |

                             नारी स्वतंत्र आहे.  

                                 म्हणुन,

                              ती चंद्रावर गेली  |

                              नारी स्वतंत्र आहे.  

                                     म्हणुन, 

                              ती राष्ट्रपती झाली |

                           नारी स्वतंत्र आहे. 

                                 म्हणुन,

                             ती अर्थमंत्री झाली | 

                अपंगांना अपंग म्हणुन मानसिकरीत्या अपंग करू नका . 

                                    तसेच,

               नारीला अबला म्हणुन अबला करू नका ||

          नारी स्वतंत्र आहे | स्वतंत्र राहील | स्वतंत्र राहणार ||

                              म्हणून म्हणतो..  

       सर्व संकटावर मात करून उत्तम  मार्ग काढणारी भूमिका 

                               म्हणजे  नारी ||

                                           

  • रमेश साळसकर

           

 लैंगिक भेदभाव और हिंसा

हम एक स्वतंत्र देश मे स्थित हैं। ऐसा लोगों को प्रतीक और अनुभव होता है। कि हम खुले विचार वाले व्यक्ति है। लेकिन परिस्थितियां कुछ और ही संदर्भित करती है।

आजादी के कई वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि, आज भी हम आजाद नही हुए हैं। हम लोगों के समकक्ष यह वक्तव्य तो करते हैं कि, हम आजाद हैं। हमने अपने मस्तिष्क के अंत भाग में भ्रमित विचारधारा विकसित और संग्रहीत कर रहे है। यह एक पूर्ण कटु सत्य है।

आप भारत भर के किसी भी कोने में जाओगे तो आपको यह तथ्य परखने को अवश्य ही प्राप्त होगा।

आज हम स्वतंत्रता के संज्ञा पर वक्तव्य करते हैं। 

हमारे स्वतंत्र देश मे यह कहा जाता है, कि ” बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ” !  लेकिन हमारे देश मे कुछ ऐसा भी है, जिन्हें देख कर यह नही लगता कि बेटियां स्वतंत्र है। 

१) भारत की राजधानी दिल्ली में १६ दिसम्बर २०१२ को हुए एक बलात्कार तथा हत्या की घटना थी, जो संचार माध्यम के त्वरित हस्तक्षेप के कारण प्रकाश में आयी। ३० दिसम्बर २०१२ को उसका शव दिल्ली पुलिस की सुरक्षा में जला दिया गया।

२) ओड़िसा के केंद्रपाड़ा जिले (Kendrapara district) में एक १६ वर्षीय लड़की के साथ कथित रूप से बलात्कार।

३) १४ सितम्बर २०२० हाथरस हत्याकांड हुआ जिसमें एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।

४) १४ सितंबर हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में नशीला पदार्थ खिलाकर १९ वर्षीय एक लड़की पे बलात्कार।

  प्रति दिन बालिकाओं, युवतियों और महिलाओं की छेड़छाड़ की समस्या दिखाई और सुनाई पड़ती है। ये अब सरे आम हो चुका हैं। लोभी के द्वारा आज भी नारियो को प्रताड़ित किया जाता हैं। जैसे कि उन्हें जलाना, मारना – पीटना आदि कई प्रकार की समस्या दृश्य आज आम हो चुके है । प्रताड़नाओ के कारण कई महिलाएँ अपने आपको मृत्यु के कगार पर लेकर चली जाती हैं।  उन्हे यह कदम प्रताड़नाओ के कारण ही आगे बढ़ाना पड़ता है।

आप चारो ओर जरा नजरो से तो देखिए स्वतंत्रता कहाँ गई है और कहाँ है।

आज के परिवर्तित काल मे महिलाए, युवतियाँ पुरूषों के समान स्तर पर है । जिन घरों में यह समान्तर का स्तर उदृत दिखाई पड़ता है। उन घरों में महिलाओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार किए जाते है। 

लैंगिक हिंसा के रोकथाम के लिए कई  भूमिकाओ  को आगे विकसीत कर सकते है..   

जैसे की, सर्वप्रथम महिलाओं में शिक्षा के स्तर को बढ़ावा देना चाहिये क्योंकि केवल विवेक से ही मानसिक व सांस्कृतिक आधिपत्य की जकड़न से बाहर आया जा सकता है। रोज़गार के अनुकूल शिक्षण, प्रशिक्षण प्राप्त कर आर्थिक सशक्तीकरण पर जोर देना चाहिये। 

लोकसभा एवं विधान सभा में प्रस्तावित ३३% प्रतिशत महिला आरक्षण को मूर्त रूप देना चाहिये। परिवार व समाज में एवं कार्यस्थल पर लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता व सहभागिता बढ़ानी चाहिये।

मदिरा के सेवन में प्रतिबंध के साथ-साथ संचार माध्यमों पर आपत्तिजनक एवं भड़काऊ सामग्री के प्रसारण से बचना चाहिये। महिला शोषण एवं हिंसा से संबंधित मामलों की सुनवाई न्यायालय में तुरंत करनी चाहिये।

बच्चीयों में व्यक्तिगत सुरक्षा को बढ़ावा देना,स्कूलों में बाल संरक्षण नीतियों और बच्चीयों के यौन शोषण को रोकने के लिए माता-पिता की बढ़ती जागरूकता आवश्यक है। छोटी बच्चीया अपना बचाव करने में और भी अधिक अशक्त होती हैं, उनके लिए परिवारों और शिक्षा संस्थानों की सुरक्षात्मक भूमिका को मजबूत करने के लिए विशिष्ट तरीके अपनाने होंगे।

बच्चियों के प्रति होने वाले अधिकांश यौन शोषण के मामले में देखा गया है, कि बच्चिया समझ ही नहीं पाती कि उनके साथ गलत किया जा रहा है। ऐसे में मां-बाप को बच्चियों को शुरु से ही स्पर्श से संबंधित गुड टच और बैड टच की जानकारी देनी चाहिए। ताकि जब कभी उन्हें इस तरह के गंदे स्पर्शों से गुजरना पड़े तो वो इस बात को समझ पाए कि उनके साथ गलत हो रहा है।

लड़के-लड़कियों को यौन हिंसा के प्रति जागरुक किया जा सकता है। हालांकि कई दल और राजनेता इसके विरोध में है, जस्टिस जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों के अनुसार स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को सही-गलत जैसे व्यवहार और आपसी संबंधों के विषय में पता चले।

  • इर्षाद शेख

रानी लक्ष्मी बाई

 

सुख वैभव को छोड़कर 

उसने खड़ग धारी थी 

जिसने अंग्रेजों को तबाह किया 

एक अकेली नारी थी……

कितनी पीड़ा आयी 

कितने दुःख का पहाड़ गिरा 

खुद को निसहाय नहीं समझा 

आगे बढ़ कर वार किया……

पवन नामक अश्व पर चढ़ वो पवन से बातें करती थी 

 पूरी अंग्रेजों की फ़ौज भी उस नारी से डरती थी 

साथ नहीं दिया किसी ने अकेले बलदाएं थामी थी 

एक अकेले दम पर उसने सबको धूल चटायी थी.. 

देखा कौशल देखी कलाएं 

कैसी विधा उसने पायी थी 

उसके तलवार के आगे सबने मुँह की खाई थी 

सभी चकित हो कर देखते नारी थी या काली थी 

खूब लड़ी मर्दानी थी वो 

झांसी वाली रानी थी।

   

  • शुभम पटेल

बलात्कार पीडिता बद्दलची ‘समजवृत्ती’

संविधानाने भारतातील सर्व नागरिकाना समान हक्क अधिकार दिले आहेत.मग ती स्त्री असो वा पुरुष.संविधान अस्तित्वात येउन आज 72 वर्षे पूर्ण झाली. तरी आजही महिला सुरक्षित नाहीत का? याला जबाबदार कोण ?…याला जबाबदार असणारी आपली समाजव्यवस्था आणि आपली मानसिकता आहे ती बदलणे खूप गरजेचं आहे. संविधानाचे रक्षण व सन्मान करणे प्रत्येक नागरिकाचे कर्तव्ये आहे.पण आजही काही व्यक्ति संविधान हटविण्यासाठी षड्यंत्र रचत आहेत. संविधानाने प्रत्येक व्यक्तीला सुरक्षा कवच प्रदान केले आहे त्यामुळे प्रत्येक व्यक्तिचा दर्जा वाढतो. संविधानामुळे देश एकसंघ आहे.काही विषमतावादी लोक संविधान बदनाम करून त्यास नष्ट करण्याचा प्रयत्न करत आहेत.

       माहिलाना जीवन जगताना समाजव्यवस्थे मुळे येणाऱ्या अडचणी वर मात करण्याचा मार्ग संविधानाने दिला आहे.तरी महिलाना त्या बलात्काराच्या आगीतून सामोर जावं लागत. आजही महिला सुरक्षित नाहीत. बलात्कार, अत्याचार, विनयभंग असे अनेक गुन्हे होत आहेत.गल्ली ते दिल्ली पर्यंत प्रत्येक ठिकाणी महिलांना अन्याय अत्याचार सहन करावा लागतो त्याना कमी लेखल जात चुल अणि मूल यातून बाहेर स्त्रीने दिल्लीच्या तख्ता पासून चंद्रावर जान्या पर्यंत चा प्रवास यशस्वी रित्या पूर्ण केला आहे,तरीही स्त्रियाना दुयम स्थान अजुन ही मिळत आहे.बाल विवाह,वैश्या व्यवसाय,शिक्षणा पासून वंचित ठेवणे असे कित्येक अन्याय महिलाना सहन करावे लागतात. 

संविधानाने प्रत्येक व्यक्तीला समान न्याय,अधिकार,कायदे कानून दिले असतानाही महिला सुरक्षित का नाही ? का त्याचा छळ केला जातो? प्रत्येक महिला ही बलात्कारातून जात असते मग तो बलात्कार शारीरिक असो, मानसिक असो, वैचारिक असो, शाब्दिक असो, तिला तो सहन करावा लागतोच.बलात्कार, अपहरण, विनयभंग, अत्याचार खूप वाढत आहेत.  अगदी 3 वर्षाच्या मुलापासून ते 60,70 वर्षीय महिले पर्यंत बलात्कार होत आहेत.बलात्कार सहन करताना काय वेदना होतात, काय त्रास होतो, कसे  समाजाला तोंड द्यावे लागते. त्यात त्या महिलेचा जीव ही जाऊ शकतो. हे फक्त त्या बलात्कार होणाऱ्या महिलेला माहिती. समाजात याचा दोष ही महिलेला दिला जातो की ती घरातून बाहेर का जाते,ति साड़ी मध्ये नव्हती,तिने केस मोकळे  सोडले होते,लिपस्टिक लावून नटून थटून निघायची… अशी भाषा त्या पीडित महिलांच्या विरुद्ध वापरली जाते .परंतु पुरुष प्रधान देशामध्ये कधीच पुरुषावर याचा आरोप केला जात नाही.मुलीचा खेळण्या बागडण्याच्या वयात बलात्कार होतो. त्या मुलींना माहिती पण नसत बलात्कार म्हणजे काय? आपल्या सोबत काय घडतंय? 

    बलात्कार  म्हणजे काय ?  बलात्कार म्हणजे व्यक्तीच्या सहमतीशिवाय किंवा बळजबरीने लैंगिक संबंध प्रस्थापित करणे. त्याचबरोबर सामूहिक बलात्कार ही होत असतात आता सामूहिक बलात्कार म्हणजे काय? तर सामूहिक बलात्कार म्हणजे जर बळजबरी एकापेक्षा जास्त व्यक्तींनी केला असेल तर त्याला सामुहिक बलात्कार म्हणतात. बलात्कार करणे कायदेशीर गुन्हा आहे अणि तो सिद्ध झाल्यास त्याची शिक्षा ही कठोर आहे. तरीही बलात्कार वाढत आहेत. भारतात बलात्कार व सामूहिक बलात्काराच्या घटना वाढत चालल्या आहेत.त्याला कारणीभूत कोण?

     संविधानाने फक्त महिलांसाठी वेगळे कायदे तयार केले आहेत. तरी महिलाना का असे बलात्कार सहन करावे लागतात. सहन करून पण त्यांना न्याय का मिळत नाही त्यांचा गुन्हेगार मोकाट फिरत असतो . ही आपली नायप्रणाली….? बलात्काराच्या प्रकरणासाठी वेगळ न्यायालय हवंय जेणेकरून त्या गुन्हेगाराना लवकरात लवकर न्यायालयात हजर केले जाईल व त्याचा गुन्हा सिद्ध झाल्यास त्याला तात्काळ कठोर शिक्षा सुनावली पाहिजे.आणि त्यांना अशी शिक्षा दिली पाहिजे.फक्त माहिलाना दोष देण्या पेक्षा मुलाना ही स्त्री बदल आदर करायला शिकवल पाहिजे मुलगा आणि मुलगी याना आपल्या घरातूनच समान वागणूक दिली पाहिजे,जेने करुण त्यांना अशी भावना येणार नाही की कोण श्रेष्ट आहे.बलात्कार झालेल्या महिलेला न्याय मिळवून दिल्या नंतर पीडीतेला पुन्हा सन्मानाने जगण्यासाठी तिला सर्वानी प्रोत्साहन दिले पाहिजे शिवाय इज्जत हा जो प्रश्न आहे तो तिच्या योनी मुळे  नाही ही समज प्रतेकाने घेतली पाहिजे.

  • अक्षता बोले