प्रिय दोस्त,

इश्क़ की गलियों में आपका भी स्वागत है। 

पुराने मुसाफ़िर से पूछ,

सफ़र लंबा,

रास्तों में कांटे और 

पाँव में छालों की आफत है।

बड़ी खुशी हुई तुम्हारा खत पढ़कर और मैं खुश हूं तुम्हारे सामाजिक क्रांति के साथ आंतरिक क्रांति में साथ देने के लिए अब तुम्हें साथी मिल गया है। वो केहते है ना..

Kuch hosh nahi rehta,

Kuch dhyaan nahi rehta!

Insaan mohabbat mein,

insaan nahi rehta!

           प्यार मानव जीवन की शायद एक बड़ी खूबसूरत और अब भी हमारी समझ से कोसों दूर की भावना है। जिसे कैद नहीं किया जा सकता दायरो में, खैर तुमने मेरे प्यार के बारे में पूछा था। तो हां, इश्क की मजार पर हमने भी माथा टेका था। मैं अपने ग्रेजुएशन के लास्ट ईयर में थी। बड़ी कम उम्र से अमृता को पढ़ा है, मानो पढ़ा नहीं जिया हो उसे,और इन जनाब को देख महसूस साहिर का प्यार होता था। पर उसे जानने पर वह तो मेरा इमरोज निकला, मैं तब वाराणसी में रहती थी। बचपन से ही अडीयल थी मैं, पिताजी राजनीति में थे कट्टर हिंदू समर्थक, और हम, हम ढूंढ रहे थे कॉमरेड! बस कॉलेज में स्टूडेंट इलेक्शन में जब मैंने इन जनाब को सुना और न जाने कैसे खुद ही मैंने इन से बातें शुरू कर दी, दोस्ती ने कुछ ही महीनों में रंग पकड़ लिया, मेरी छाती से पहले उसकी नजर का मेरी मुस्कुराहट को देखना,मेरे बदन से पहले उसके हाथो का मेरे सर को छूना, मेरे लबों से पहले उसके लबो का  मेरे माथे को चुमना, उसका पुरुष होने से कई ज्यादा इंसान होना, मजबूर कर देता था मुझे उससे प्यार करने के लिए। व्यक्तिवाद का आधार लेना इन्हें कभी जमा ही नहीं, सही को सही और गलत को गलत बोलने के आदि थे यह और फिर मैंने एक दिन कॉलेज के गेट पर इन जनाब को रोक कर, के ही दिया “मैं तुम्हें इसलिए प्यार नहीं करती कि तुम बहुत सुंदर हो और मुझे बहुत अच्छे लगते हो मैं इसलिए प्यार करती हूं कि जब मैं तुम्हें देखती हूं मुझे लगता है क्रांति होगी” जवाब में इमरान की मुस्कुराहट ने मेरी सांसों को मानो एक पल के लिए रोक दिया हो, इस प्यार भरे नाते में हमने वो सब  किया जो शायद प्रेमी करते हैं घूमना, फिरना, खाना, बातें करना,  किताबें पढ़ना, पिक्चर देखना एक दूसरे की जिंदगी, विचार और सपनों को समझना।

“पर यह इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए एक आग का दरिया है और डूब के जाना है”

                 और उस दिन भैया ने इमरान को मेरे साथ स्कूटर पर देख लिया एक दिन तो यह होना ही था पर शायद मैं इसके लिए तैयार न थी। उसने घर आकर पिताजी के सामने बात रखी वह इमरान के बारे में सब कुछ जान चुका था उसने इमरान के धर्म पर सैकड़ों गालियां दी उस वक्त साहिर की वह लाइन याद आई “जिंदगी सिर्फ मोहब्बत नहीं कुछ और भी है ,जुल्फ-ओ-रुखसार की जन्नत नहीं कुछ और भी है, भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में, इश्क ही एक हकीकत नहीं कुछ और भी है।” मैंने जाना कि चाहे प्यार की बातें कितनी ही कर ले यह समाज धर्म जात लिंग और वर्ग जितनी ताकत, आज भी प्यार में नहीं। कांच हो टूटकर बिखरने के उस एक ही पल में, मेंरे पिता ने मुस्कुराकर मेरा हाथ थाम कहां “तुम इमरान को रामनवमी के दिन घर बुला लो मुझे पता है तुम्हारे लिए क्या सही है”। मानो कांच पर लगने से पहले ही उस पत्थर को किसी ने रोक लिया, मैं बहुत खुश थी में पिता जी के गले लग, भाग कर कमरे में जा इमरान को फोन लगाया, “परसो रामनवमी है तुम पिताजी से मिलने आ जाना”। रामनवमी का दिन आया इमरान और मैं दोनों ही बड़े खुश थे हम दोनों का ही एज्युकेशन खत्म होकर नौकरियां लगने वाली थी। घरवालों की तरफ से भी सभी चीजों की हामी थी। अब बस शाम होने का इंतजार था। जिंदगी में पानी से प्यार के चलते घाटों से बड़ा अजीब सा पर अटूट रिश्ता रहा है मेरा, हम वाराणसी में जहां रहते थे, वहां से कुछ 10 मिनट के अंतर पर ही मणिकर्णिका घाट है। बचपन से ही गंगा का वह हिस्सा न जाने बड़ा अपना सा लगता था। मानो पवित्रता और स्वच्छता की जंग छिड़ी हो। मैं पूजा की थाली ले, घाट पर निकली मन में अनेकों उमंगे लिए उस सारे शोर-शराबे में जेहन में बस पिताजी और इमरान की मुलाकात ढंग से हो जाए यही ख्याल आ रहा था,केहनो को आज रामनवमी थी पर मूझे याद सीता स्वयंवर की आ रही थी, घाट पर की सभी पूजा ए खत्म हो सभी लोग मंदिरों में भजन कर रहे थे, पूजा खत्म कर घर को निकलने से पहले, मैं घाट की तरफ बढ़ी मुझे अपने उस गंगा के हिस्से से अपनी खुशी को बांटना था। मैं पानी को हाथ लगाने के लिए नीचे उतरी, तो वहीं कोने में इतनी रात को एक इंसान गंगा में डुबकी लगा बाहर आ रहा था, गौर से देखा तो वह पिताजी थे, और वहां से थोड़ी ही दूर कोने में भैया एक बोरी को गंगा में प्रवाहित कर रहे थे, एक पल वह बोरी को देख , अनदेखा कर मैं दौड़ कर भैया के पास गई ” क्या हुआ भैया, इमरान आया था, कुछ बात हुई, क्या कहा पिताजी ने बताओ ना,” इन सारे सवालों पर, भैया ने बस एक वहशी मुस्कुराहट दे मेरे कंधे पर ठंडा हाथ रख कहा “यह मणिकर्णिका घाट है गुड़िया यहा सब को मुक्ति मिल जाती है, उसे भी मिल गई” मुझे कुछ नहीं समझा… मैं दो पल के लिए शांत हो अपनी पूरी हिम्मत जुटा पीछे उस गंगा में प्रवाहित बोरे की तरफ मुड़ी… ना वहा शरीर था, ना वहा पानी था वहाबस कुछ दूरी पर किसी जिंदगी को खत्म करने वाले निशान छोड़ता खून था ……

“जैसे दिल के फ़िकरे से,एक अक्षर बुझ गया..

जैसे विश्वास के काग़ज पर सियाही गिर गई..

जैसे समय के होंठों से,एक गहरी सॉस निकल गई..

और आदमजात की आंखों में,जैसे एक आंसू भर आया..

जैसे इश्क़ की जबान पर एक छाला उठ आया,सभ्यता की बाहों में जैसे

किसी जिंदगी ने दम तोड़ दिया,और जैसे धरती ने आसमान का, एक बड़ा उदास सा ख़त पढ़ा।

बस इसी तरह उससे मेरा प्यार न हो पाया….

तुम्हारी दोस्त..

समुद्रा

– समुद्रा

– विभाग – मुंबई

प्रेम – एक सुंदर अनुभुती…..

प्रेम, प्रेम म्हणजे असतं तरी काय?

कोणीतरी चोरून मनात शिरणे,

कोणालातरी चोरून सतत पाहणे,

आणि समोरच्याला चाहूल लागताच बेदम घाबरणे!

प्रेम म्हणजे असतं तरी काय?

एखाद्याशी खूप-खूप बोलावसं वाटणे,

एखाद्याचं खूप-खूप ऐकावसं वाटणे,

पण समोर आल्यावर मात्र बोबडी वळणे!

प्रेम म्हणजे असतं तरी काय?

प्रत्येक वेळी एकाच व्यक्तीचा विचार करणे,

नेहमी एकाच व्यक्तीच्या आठवणीत रमणे,

आणि कोणत्याच कामात लक्ष न लागणे !

प्रेम म्हणजे असतं तरी काय?

जगताना मित्र म्हणून,

संसारात सोबती म्हणून,

मात्र उतारवयात आधार म्हणून हवी असलेली आपली,हक्काची व्यक्ती !

प्रेम म्हणजे असतं तरी काय ?

जुळून आलं तर स्वर्गीय सुखाचा आभास,

तुटलं तर नरकीय यातना आणि भ्रमनिरास,

जर सांभाळून घेतलं तर लोकलमधील चौथ्या सीटचा प्रवास!

प्रेम म्हणजे हवा-हवासा सहवास आणि अतूट विश्वास,

तिमिरमय आयुष्यात देणारा प्रकाश,

‘प्रेम’ ही भावना आहेच खास !

       – कु. प्रणाली केशव नलावडे

      विभाग – दिवा, ठाणे.

प्यार एक एहसास

प्यार आखिर क्या होता है प्यार?  क्या होती है इसकी परिभाषा? ऐसे ही न जाने कितने सवाल है जिन्हे हम ढूंढना तो चाहते हैं पर जवाब शायद ही मिल पाता है। प्यार, ये शब्द सुनते ही हमारे ज़ेहन में एक ही बात आती है कि ज़रूर ये किसी लड़के और लड़की के बीच के रिश्ते वाला प्यार होगा। ज़रूर उनके बीच ऐसा होगा वैसा होगा, ऐसे ही ना जाने कितनी बेकार की बातों को अपने मन में रख कर कल्पना करने लगते हैं। आज प्यार की परिभाषा को कुछ लोग ग़लत सोंच के साथ चलने को मजबूर है। हम ये कभी नही सोचते कि प्यार किसी भी रिश्ते में हो सकता है, बस उसे देखने और समझने का नजरिया अलग होता है।

वैसे तो प्यार हर रिश्ते में होता है, ये कहना बिल्कुल ग़लत नही होगा कि प्यार के बिना कोई भी रिश्ता अधूरा और बेजान है। प्यार का रिश्ता भाई बहन या एक अच्छे दोस्तों के बीच भी होता है। मगर कुछ लोगों ने इस रिश्ते को बदनाम कर दिया है, या यूं कहें कि इस रिश्ते की मान मर्यादा को कुचल कर रख दिया है। हमारा ये समाज इतना बुद्धिमान और ज्ञानी हो गया है कि उन्हें हर रिश्ते की पहचान बिना तर्क और उल्टे सीधे तथ्यों के आधार पर तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने में एक अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। ऐसे लोग खुद ये निर्णय करने लगते हैं कि किस मजहब वालों को प्यार करना चाहिए और किसे नहीं.? आखिर कौन होते हैं ये लोग! जो ये तय करते हैं कि किन्हें प्यार करना चाहिए और किसे नही? आखिर किसने इन्हे ये हक दिया कि दो प्यार करने वाले को मौत के घाट उतार दें? आखिर क्या हो गया है हमारे समाज को? आखिर कब तक यूंही ये धर्म के ठेकेदार बनके अपना वर्चस्व कायम रखेंगे.? ऐसे कई तमाम सवाल है जिनका जवाब हम सभी को ढूंढना होगा वरना यह  धर्मो के ठेकेदार जिन्हें संरक्षण प्राप्त है राजनीतिक और कुछ असामाजिक तत्वोंका जो आपको जीने नहीं देंगे।

कभी लव जिहाद के नाम पर तो कभी आपको डरा धमका कर आपके रिश्तों के बीच एक ऐसी गहरी दरार पैदा कर देंगे कि ना चाहते हुए भी आपको एक दूसरे से नफ़रत करनी  ही पड़ेगी और नफ़रत की ये दीवार तोड़ पाना बहुत मुश्किल होगा। पता नहीं क्यूं मगर आज कुछ असामाजिक तत्वों के लोग इतने हिंसक होते जा रहे हैं कि जबरन दो प्यार करने वालों को उनके जाति या विशेष धर्म के ताल्लुक रखने वालो को निशाना बनाती है। उनका जीना मुश्किल कर देती है। हमेशा एक डर के साए में इन्हे जीने को विवश कर दिया जाता है। प्यार तो हमे जीना सीखा देता है तो इतनी नफरत क्यों.?

आज भले ही प्यार के मायने बदल गए हों, भले ही बनावटी रिश्ते हो गए हों मगर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि प्यार का कोई मजहब नहीं होता, कोई भी धर्म नहीं होता। क्योंकि प्यार बस प्यार होता है! जब हम एक दूसरे को अच्छे लगने लगते हैं, एक दूसरे के जज्बातों की कद्र करते हैं, जब कोई खुद से ज़्यादा अच्छा लगने लगता है, जब हम एक दूसरे की फिक्र में सुबह से शाम गुज़ार देते हैं, शायद यही तो प्यार है ना। तो आखिर क्यों नहीं लोग इस रिश्ते की कद्र करते हैं, आखिर क्यों समाज इतना हिंसक और क्रूरता पूर्वक व्यवहार करता है? क्या ये कसूर है कि वो अलग मजहबों में प्यार करते हैं या कोई भी किसी से प्यार क्यों ना करे इन्हे एक सम्मानपूर्वक ज़िन्दगी लोग क्यों नहीं जीने देते.? आज हम सभी को इस मुद्दे पर सोचने, समझने और खुद को संवेदनशील होने कि ज़रूरत है ताकि हम अपने समाज को प्यार के एहसास से फिर से खूबसूरत बना दें.!  

 – सुजीत अनुराग

विभाग – नई दिल्ली

प्रेम म्हणजे फक्त प्रेम असते..

१४ फेब्रुवारीला प्रेमाचा उत्सव साजरा करण्यात येतो. “व्हॅलेंटाईन डे” या दिवशी सर्व प्रेमी आपल्या प्रेमाची कबुली देत हा उत्सव साजरा करतात, हातामध्ये लाल गुलाब आणि हृदयात प्रेम डोळ्यात असंख्य अशा अपेक्षा आणि भावी आयुष्यातील सोबत उराशी बाळगून अनेकांना आपण या दिवशी पाहत असतो. अनेक प्रेमी या दिवशी एकमेकांना भेटतात आणि आयुष्यभर एकत्र येऊन सुखाने संसार करताना दिसतात. प्रेम म्हणजे फक्त प्रेम, म्हणजे बाकी काही नाही. प्रेमात तू आणि मी संपतं आणि सर्व आपलं होऊन जातं. संपूर्ण जगात एखादी व्यक्ती आपल्या मनात घर करून जाते आणि आयुष्य सुंदर होउन जातं.  

पण सगळे सुखी होतातच असे नाही. जेव्हा प्रेमात स्वार्थ, घमेंड, अविश्वास, व्यभिचार आणि समाज, जातीयवाद, राजकारण समाविष्ट होते तेव्हा प्रेमाचा रंग बदलू लागतो. पण बऱ्याचदा आपण प्रेमभंग झालेले जोडपे पाहतो. पार दु:खी आणि नैराश्यामध्ये डुबलेली, जगण्याची उमेद सोडून दिलेले दिसतात. असे घडते कारण याला बरीच वेगवेगळी कारण असतात. गैरसमज असणे किंवा एकमेकांवर शंका घेणे या गोष्टी सुद्धा सुंदर प्रेमाचे नाते संपण्यास कारणीभूत ठरतात.

कधीकधी व्यसनांमुळे बरेच संसार उध्वस्त होतात. पुरुषांची मानसिकता सतत बदलत असते याचा स्त्रीच्या मनावर अतिशय वाईट परिणाम होतो. स्त्री पुरुषा वर डिपेंड असली की पुरुषाला फार घमेंड येतो हे खूप वाईट आहे याने समानता संपते आणि पुन्हा मी आणि तू सुरू होते कारण घमेंड ही दारुप्रमाणे असते जी स्वतःला सोडून इतर सर्वांना कळते किती चढली आहे…म्हणून निर्व्यसनी असणे ही गोष्ट प्रेमाचं अस्तित्व कायम राहण्यासाठी अत्यंत आवश्यक आहे कारण कविता चुकली तर पान फाडता येते पण प्रेम तर चुकलं तर आयुष्याच्या पत्रावळ्या होतात. प्रेमामध्ये जातीयवाद आला की सैराट सारख्या घटना घडतात राजकारण आले की लव्ह जिहाद सारख्या कायद्याच्या कसोटीवर प्रेमाला बळी पडावे लागते..

        प्रेमाच्या नात्यात self-respect फार महत्त्वाचा असतो, कारण एखादी स्त्रीला तिच्या नवऱ्याची साथ असेल तर झोपडीतही संसार करू शकते पण जर नवऱ्याची साथ प्रेम आणि आदर नसेल तर तुमचा महाल ही तिच्यासमोर फिका आहे.. बायकोच्या कष्टांची दखल घेणारा नवरा,आणि नवर्‍याच्या छोट्या-छोट्या कर्तृत्वाचा अभिमान बाळगणारी बायको हे गणित छान जुळलं की भले भले संसार सुखी होतात,जर आपली इच्छा असेल की आपल्यावर कोणीतरी जीवापाड प्रेम करावं तर त्याची सुरुवात आपण स्वतःपासूनच करावी कारण निसर्गाचा नियमच आहे की जे पेराल तेच उगवेल.

ओढ म्हणजे काय ते जीव लावल्याशिवाय कळत नाही..

प्रेम म्हणजे काय ते स्वतः केल्याशिवाय कळत नाही..

कारण प्रेम करण्यापेक्षा प्रेम निभावणं जास्त महत्वाचं आहे…..

प्रेमाचा आणखी एक रंग आहे मैत्रीचा. दोघेही एकमेकांना पसंत करतात पण काही कारणांमुळे एकत्र येऊ शकत नाही. प्रेम म्हणजे लग्न करून एकमेकांचे न होताही एकमेकांच्या सुख-दुःखात आधार बनून शेवटपर्यंत साथ देणं म्हणजे खरं प्रेम.. जर मैत्रीचे नाते बनले नसते तर माणसाला कधी विश्वासच बसला नसता की अनोळखी लोकसुद्धा आपल्या माणसांपेक्षा चांगले असू शकतात.

नातं तुझं माझं नेहमी असंच असावं,

कधी मैत्री कधी प्रेमात दिसावं…

चुकलं कोणी, दोघांनी समजून घ्यावं असच प्रेम करत राहावं..

कधी बोलावं कधी न बोलताही मनातल ओळखाव..

थोडं-थोडं भांडावं, रुसावं.. कधीकधी खूप हसाव..

नातं तुझं माझं त्याची गोड आठवण! खोल-खोल मनामध्ये त्याची असेल साठवण!

मित्रांनो व्हॅलेंटाईन डे साजरा करण्याआधी ,वील यू बी माय व्हेलेंटाईन म्हणण्याआधी स्वतः व्हॅलेंटाईन सारखे प्रेम करता का यावर विचार करा मग प्रपोज करा हॅपी व्हॅलेंटाइन डे!

निर्मल मानवतावादी भारतीय समाज

नवी मुंबई

प्रेमात पडल्यावर….!

प्रेमात पडल्यावर काही कळत नाही…… 

सगळे काही कळत नकळत घडतं…. 

कधी मन गूपचुप रडत, तर कधी हळूच हसतं ….. 

समजत नाही काही, सतत् आतुरता राही… 

कोणी वेडे म्हणते तर कोणी पागल…. 

पण हे सर्व चांगलच वाटत प्रेमात पडल्यावर… 

टोकत असतात सर्व जण… 

आणि चेष्टा करतात मित्रगण…. 

तसं बोलण्यातून तर प्रेमळ वाणी… 

रात्रंदिवस फ़क्त सायलेंट गाणी…. 

स्वप्नात ही प्यार वाली कहाणी… 

खुप समजुतदारपणा येतो वागण्यात… 

सगळं कसं गोड गोड भासत…. 

आणि दुराव्यात मन खुप रुसतं … 

अशा क्षणी काय कराव हेच सूचत नाही…. 

एक तर कोणा पासुन लपवता येत नाही…. 

चेहऱ्यावर नेहमी प्रफुल्लित भाव असतो….. 

कधी जोरात तर कधी विनाकारण हसतो… 

प्रेमाला नका होऊ देऊ बदनाम… 

त्याला नका समजू ‘वस्तू’…. 

प्रेम ही जाणीव आहे.. ती एक कसरत आहे… 

ह्या कसरतीची करून घ्या सवय… 

आणि प्रेमामध्ये जगावं लागतं, बिनशर्यत रहावं लागतं…. 

– किरण कांबळे

विभाग – नाशिक

कितीदानव्याने तुला आठवावे…

 कसं आहे आपली परंपरा , नीती नियम , लग्नसंस्था हे सारं आपल्याला सतत बंदिस्त कडी कोंड्यात आयुष्य जगायला भाग पाडते. पण आज मला

बाईपणाची लाज थोडी बाजूला ठेऊन मला द्यायची आहे कबुली .  नाही विसरले त्याला आजही केलं ज्याच्यावर प्रेम अगदी मनापासून. जे आजही इतक्या वर्षानंतर मनाच्या तळात असं घट्ट रुतून राहिलंय माझ्या.

त्या क्षणांची आठवण झाली की मन नुसतं हलकं पिसासारखं होतं माझं. मन सैरभैर होऊन कोसो दूर धावायला लागत माझं.

त्याच्यासाठी…हो..त्याच्यासाठीच!

खूप प्रेम करायचे मी त्याच्यावर.

त्याचं वागणं…बोलणं…त्याची लकब…आणि त्याचं दिलखुलास हास्य.

अरे……मी अजूनही विसरले नाही हं तुला. इतकं मात्र खरं!

आता लग्न झालं.मुल झाले.

सगळं छान चाललंय रे माझं.

पण काय आहे ना …

नुसतं सगळं जवळ असूनही कधी कधी मनाच्या गाभाऱ्यात खोल रुतलेली तुझी आठवण आली की अस्वस्थ होते… तूझ्या सोबतचे क्षण …घेतलेल्या आणाभाका …आपण एकत्र पाहिलेली स्वप्न हे सारंच आठवतं आणि मग माझी मी उरतच नाही . तूझ्या आठवणीत इतकी रमते की आजही कधी कधी सोबत आहेस असाच भास होतो. कधी कधी ठरवते तुला भेटूया पण इथल्या समाजाला ते मान्य नाही लग्न झालेल्या स्त्रीने परक्या पुरूषाचा साधा विचार जरी मनात आणला तरी तो व्यभिचार आहे असं इथे म्हटलं जात .

मंगळसूत्राच्या काळ्या मण्यांनी मला उंबरा लांघायला मज्जाव केला. तेव्हापासून नजर कैदेसारखा श्राप घेऊन जगत असते इथल्या संस्कृतीच्या जोखडात बांधून ठेवलेली प्रत्येक भारतीय स्त्री. माणसाला अपूर्णतेचा शाप असतो हे तितकच खरं आहे . सगळं आपल्या मनासारखंच होईल याची स्वप्नं बघत बघत हे वय सरत चाललंय माझं. तरीही….

 वेड्या तुझ्या आठवणीची एक झुळूक..माझ्या मनाला स्पर्शून जाते ना…तेंव्हा नुसतंच रडणं होतं माझं आणि लिहिते कधी कधी तूझ्या आठवणीत काळजात होणारी घुसमट…

तू हवा होतास रे सोबत.

अगदी शेवटपर्यंत .

पण जाती-पाती आणि संस्कृतीच्या कुंपणावरून कोणी उडी मारून जायचा प्रयत्न केला.. तर खूप हाल होतात.

तुला समजत होतं सारं.

आणि मलाही समजत होतं.

तरीही आपल्या जातीच्या बंधनांनी आपल्याला जखडून ठेवलं. आणि मनातला तू मनाच्या तळाशीच घर करून राहिलास.

आजही मी एकटी असले की हृदयाच्या खोल गाभाऱ्यात  उघडून बघते मी… तुझी माझ्या नजरेत दडलेली सारी चित्र .

तुला आठवताना आणि मनातल्या मनात तुझ्याशी गप्पा मारताना कधी झोपून जाते कळतच नाही, तर कधी तू डोळ्या समोरचा हलतच नाहीस … जेव्हा असं होत तेव्हा मी प्रचंड खुष असते, कारण तू तुझ्यातही आणि माझ्यातही नकळत सोबत असतोस .

खरचं कधी कधी वाटतं आपल्या भारतातली एक जुनी पद्धत चालू करावी माणसांनी.पूर्वीच्या काळी होती ना ती स्वयंवराची पद्धत.

आपला जोडीदार आपण स्वतः निवडण्याचा नैतिक अधिकार इथल्या पुरुषसत्ताक संस्कृतीत रुजायला हवा. त्यासाठी इथल्या मानसिकतेत बदल व्हायला हवा.

आज हे सगळं आठवतंय कारण….

तुला आठवत आहे का तू मला पहिलं गुलाब कधी दिलं होतस की विसरलास … मला मात्र आजही लख्ख आठवतंय!

आणि  ते आठवून आतून ढवळून गेले मी.पुन्हा जुन्या जखमेची खपली काढली गेली.

कठोर आहेस तू. अगदीच.

सारखं माझ्या मनाला अशांत ठेवतोस. आजही या आभासी दुनियेत इनबॉक्स मध्ये सहानुभूती दाखवून; चान्स मारणाऱ्या लोकांचं क्षणिक प्रेम पाहून वाटतं…तुझ्यावर मी केलेलं राधेसारखं निरागस प्रेम…

इथल्या आभासी दुनियेत नक्कीच नाही. मला येऊ वाटतं रे तुझ्याकडं. पण पुरुषांनी केलेली शेकडो लफडी माफ असतात इथं.पण स्त्री ने लग्नानंतरही एखाद्यावर मानसिक प्रेम केलं तर इथं महाभारत घडतं. आणि एक सांगू का रे तुला…स्त्रीला मानसिक गुंतायला आवडतं.

शारीरिक प्रेम म्हणजे फक्त मासाच्या घर्षणाने मिळालेली क्षणिक तृप्ती असते. पण ती क्षणिक तृप्ती म्हणजे जगणं नव्हे.

एक मृगजळचं रे ते.

रामायण,महाभारत हे नवीन नाही आपल्याला.

सांग ना या युद्धांचा केंद्रबिंदू काय होता.?

बाई……

याच बाईतली आई, बायको, मुलगी… मात्र आजपर्यंत  कुणाला समजून घेताच आली नाही.

कळलंच नाही लोकांना बाईचं मन.

सगळं समजून घ्यायला आणि तसं वागायला आजची परिस्थिती पोषक नक्कीच नाही रे.

मानसिक तृप्तीची व्याख्या खूप वेगळी असते. भावना, संयम आणि एकमेकांचं मन जपत केलेली प्रत्येक कृती प्रेम असते.

हे कळायला इथं खूप वेळ लागेल रे. तोपर्यंत मला तुला माझ्या काळजात जपायचं आहे.

क्रश बनून तू आजही माझ्या मनात आहेस .

या देहाची जेंव्हा राख होईल ना….तेंव्हा तुझी आठवण अशीच राखेत मिसळून जाईल माझ्याबरोबर . अरे पुढचा जन्म ही असेलच संकल्पना तर

मला भेटायचं आहे तुला पुढल्या जन्मात. त्यावेळी मात्र जातीचं लेबल नको…

फक्त प्रेम अमर रहावं.

        शेवटी तुला एकच आठवण करून द्यायला आवडेल …

” आठवतंय का तुला आपल एकांतात भेटणं…

ओठ उमलत असताना पापण्याच मिटनं  … !”

      – माधुरी शिंदे सोनावणे (बदलापूर )