लैंगिक भेदभाव और हिंसा

हम एक स्वतंत्र देश मे स्थित हैं। ऐसा लोगों को प्रतीक और अनुभव होता है। कि हम खुले विचार वाले व्यक्ति है। लेकिन परिस्थितियां कुछ और ही संदर्भित करती है।

आजादी के कई वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि, आज भी हम आजाद नही हुए हैं। हम लोगों के समकक्ष यह वक्तव्य तो करते हैं कि, हम आजाद हैं। हमने अपने मस्तिष्क के अंत भाग में भ्रमित विचारधारा विकसित और संग्रहीत कर रहे है। यह एक पूर्ण कटु सत्य है।

आप भारत भर के किसी भी कोने में जाओगे तो आपको यह तथ्य परखने को अवश्य ही प्राप्त होगा।

आज हम स्वतंत्रता के संज्ञा पर वक्तव्य करते हैं। 

हमारे स्वतंत्र देश मे यह कहा जाता है, कि ” बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ” !  लेकिन हमारे देश मे कुछ ऐसा भी है, जिन्हें देख कर यह नही लगता कि बेटियां स्वतंत्र है। 

१) भारत की राजधानी दिल्ली में १६ दिसम्बर २०१२ को हुए एक बलात्कार तथा हत्या की घटना थी, जो संचार माध्यम के त्वरित हस्तक्षेप के कारण प्रकाश में आयी। ३० दिसम्बर २०१२ को उसका शव दिल्ली पुलिस की सुरक्षा में जला दिया गया।

२) ओड़िसा के केंद्रपाड़ा जिले (Kendrapara district) में एक १६ वर्षीय लड़की के साथ कथित रूप से बलात्कार।

३) १४ सितम्बर २०२० हाथरस हत्याकांड हुआ जिसमें एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।

४) १४ सितंबर हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में नशीला पदार्थ खिलाकर १९ वर्षीय एक लड़की पे बलात्कार।

  प्रति दिन बालिकाओं, युवतियों और महिलाओं की छेड़छाड़ की समस्या दिखाई और सुनाई पड़ती है। ये अब सरे आम हो चुका हैं। लोभी के द्वारा आज भी नारियो को प्रताड़ित किया जाता हैं। जैसे कि उन्हें जलाना, मारना – पीटना आदि कई प्रकार की समस्या दृश्य आज आम हो चुके है । प्रताड़नाओ के कारण कई महिलाएँ अपने आपको मृत्यु के कगार पर लेकर चली जाती हैं।  उन्हे यह कदम प्रताड़नाओ के कारण ही आगे बढ़ाना पड़ता है।

आप चारो ओर जरा नजरो से तो देखिए स्वतंत्रता कहाँ गई है और कहाँ है।

आज के परिवर्तित काल मे महिलाए, युवतियाँ पुरूषों के समान स्तर पर है । जिन घरों में यह समान्तर का स्तर उदृत दिखाई पड़ता है। उन घरों में महिलाओं पर विभिन्न प्रकार के अत्याचार किए जाते है। 

लैंगिक हिंसा के रोकथाम के लिए कई  भूमिकाओ  को आगे विकसीत कर सकते है..   

जैसे की, सर्वप्रथम महिलाओं में शिक्षा के स्तर को बढ़ावा देना चाहिये क्योंकि केवल विवेक से ही मानसिक व सांस्कृतिक आधिपत्य की जकड़न से बाहर आया जा सकता है। रोज़गार के अनुकूल शिक्षण, प्रशिक्षण प्राप्त कर आर्थिक सशक्तीकरण पर जोर देना चाहिये। 

लोकसभा एवं विधान सभा में प्रस्तावित ३३% प्रतिशत महिला आरक्षण को मूर्त रूप देना चाहिये। परिवार व समाज में एवं कार्यस्थल पर लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता व सहभागिता बढ़ानी चाहिये।

मदिरा के सेवन में प्रतिबंध के साथ-साथ संचार माध्यमों पर आपत्तिजनक एवं भड़काऊ सामग्री के प्रसारण से बचना चाहिये। महिला शोषण एवं हिंसा से संबंधित मामलों की सुनवाई न्यायालय में तुरंत करनी चाहिये।

बच्चीयों में व्यक्तिगत सुरक्षा को बढ़ावा देना,स्कूलों में बाल संरक्षण नीतियों और बच्चीयों के यौन शोषण को रोकने के लिए माता-पिता की बढ़ती जागरूकता आवश्यक है। छोटी बच्चीया अपना बचाव करने में और भी अधिक अशक्त होती हैं, उनके लिए परिवारों और शिक्षा संस्थानों की सुरक्षात्मक भूमिका को मजबूत करने के लिए विशिष्ट तरीके अपनाने होंगे।

बच्चियों के प्रति होने वाले अधिकांश यौन शोषण के मामले में देखा गया है, कि बच्चिया समझ ही नहीं पाती कि उनके साथ गलत किया जा रहा है। ऐसे में मां-बाप को बच्चियों को शुरु से ही स्पर्श से संबंधित गुड टच और बैड टच की जानकारी देनी चाहिए। ताकि जब कभी उन्हें इस तरह के गंदे स्पर्शों से गुजरना पड़े तो वो इस बात को समझ पाए कि उनके साथ गलत हो रहा है।

लड़के-लड़कियों को यौन हिंसा के प्रति जागरुक किया जा सकता है। हालांकि कई दल और राजनेता इसके विरोध में है, जस्टिस जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों के अनुसार स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चों को सही-गलत जैसे व्यवहार और आपसी संबंधों के विषय में पता चले।

  • इर्षाद शेख

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