ये मेरे दोस्तों…

हा है वो दस्तावेज दुनिया के विपरीत

जो हमें हमारी सिद्धता मांगती है,

न होने देंगे हम कभी हमारे

मुल्क का बटवारा जो वो चाहते है।

 

कोई कह रहा होगा इसे

मजहब की लड़ाई,

कोई देता भी होगा गवाई,

बस तू इसे वो मत समझना,

जो वो समझाना चाहते है।

 

ये मेरे दोस्तों तुम इसे

धरम का झगड़ा मत समझना,

तुम मत समझना इसे वो दंगा,

जो आंधी की तरह सबको समेटता है।

 

हाथ में उनके भलेही बन्दुक हो,

तू पत्थर और काठी कभी न उठाना,

हमारी एकता, मानवतावाली  इंसानियत को

कभी न झुकने देना।

 

उनकी तो सोच ही है हमारा बटवारा,

पोलिस की डंडी, गोली और अश्रुधूर का मारा,

बस तू सोचना जरा गहरा और कहना

यह देश हे हमारा।

 

ये मेरे दोस्तों ये अभी भी कहेंगे

मजहब और धरम का मुल्क बनता है,

तुम उसे हसकर कहना, ये मेरे दोस्तों

हम तुम्हारे सभी भेदभाव को मुहतोड़ जवाब देंगे।

मुल्क की धर्मनिपेक्षता के लिए….

 

~ प्रविण सुनीता रतन बोरकर

 

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