प्यार एक एहसास

प्यार आखिर क्या होता है प्यार?  क्या होती है इसकी परिभाषा? ऐसे ही न जाने कितने सवाल है जिन्हे हम ढूंढना तो चाहते हैं पर जवाब शायद ही मिल पाता है। प्यार, ये शब्द सुनते ही हमारे ज़ेहन में एक ही बात आती है कि ज़रूर ये किसी लड़के और लड़की के बीच के रिश्ते वाला प्यार होगा। ज़रूर उनके बीच ऐसा होगा वैसा होगा, ऐसे ही ना जाने कितनी बेकार की बातों को अपने मन में रख कर कल्पना करने लगते हैं। आज प्यार की परिभाषा को कुछ लोग ग़लत सोंच के साथ चलने को मजबूर है। हम ये कभी नही सोचते कि प्यार किसी भी रिश्ते में हो सकता है, बस उसे देखने और समझने का नजरिया अलग होता है।

वैसे तो प्यार हर रिश्ते में होता है, ये कहना बिल्कुल ग़लत नही होगा कि प्यार के बिना कोई भी रिश्ता अधूरा और बेजान है। प्यार का रिश्ता भाई बहन या एक अच्छे दोस्तों के बीच भी होता है। मगर कुछ लोगों ने इस रिश्ते को बदनाम कर दिया है, या यूं कहें कि इस रिश्ते की मान मर्यादा को कुचल कर रख दिया है। हमारा ये समाज इतना बुद्धिमान और ज्ञानी हो गया है कि उन्हें हर रिश्ते की पहचान बिना तर्क और उल्टे सीधे तथ्यों के आधार पर तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने में एक अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। ऐसे लोग खुद ये निर्णय करने लगते हैं कि किस मजहब वालों को प्यार करना चाहिए और किसे नहीं.? आखिर कौन होते हैं ये लोग! जो ये तय करते हैं कि किन्हें प्यार करना चाहिए और किसे नही? आखिर किसने इन्हे ये हक दिया कि दो प्यार करने वाले को मौत के घाट उतार दें? आखिर क्या हो गया है हमारे समाज को? आखिर कब तक यूंही ये धर्म के ठेकेदार बनके अपना वर्चस्व कायम रखेंगे.? ऐसे कई तमाम सवाल है जिनका जवाब हम सभी को ढूंढना होगा वरना यह  धर्मो के ठेकेदार जिन्हें संरक्षण प्राप्त है राजनीतिक और कुछ असामाजिक तत्वोंका जो आपको जीने नहीं देंगे।

कभी लव जिहाद के नाम पर तो कभी आपको डरा धमका कर आपके रिश्तों के बीच एक ऐसी गहरी दरार पैदा कर देंगे कि ना चाहते हुए भी आपको एक दूसरे से नफ़रत करनी  ही पड़ेगी और नफ़रत की ये दीवार तोड़ पाना बहुत मुश्किल होगा। पता नहीं क्यूं मगर आज कुछ असामाजिक तत्वों के लोग इतने हिंसक होते जा रहे हैं कि जबरन दो प्यार करने वालों को उनके जाति या विशेष धर्म के ताल्लुक रखने वालो को निशाना बनाती है। उनका जीना मुश्किल कर देती है। हमेशा एक डर के साए में इन्हे जीने को विवश कर दिया जाता है। प्यार तो हमे जीना सीखा देता है तो इतनी नफरत क्यों.?

आज भले ही प्यार के मायने बदल गए हों, भले ही बनावटी रिश्ते हो गए हों मगर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि प्यार का कोई मजहब नहीं होता, कोई भी धर्म नहीं होता। क्योंकि प्यार बस प्यार होता है! जब हम एक दूसरे को अच्छे लगने लगते हैं, एक दूसरे के जज्बातों की कद्र करते हैं, जब कोई खुद से ज़्यादा अच्छा लगने लगता है, जब हम एक दूसरे की फिक्र में सुबह से शाम गुज़ार देते हैं, शायद यही तो प्यार है ना। तो आखिर क्यों नहीं लोग इस रिश्ते की कद्र करते हैं, आखिर क्यों समाज इतना हिंसक और क्रूरता पूर्वक व्यवहार करता है? क्या ये कसूर है कि वो अलग मजहबों में प्यार करते हैं या कोई भी किसी से प्यार क्यों ना करे इन्हे एक सम्मानपूर्वक ज़िन्दगी लोग क्यों नहीं जीने देते.? आज हम सभी को इस मुद्दे पर सोचने, समझने और खुद को संवेदनशील होने कि ज़रूरत है ताकि हम अपने समाज को प्यार के एहसास से फिर से खूबसूरत बना दें.!  

 – सुजीत अनुराग

विभाग – नई दिल्ली

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