आज उसका सौदर्य द्वंद का आधार बना जो कभी एक मनमोहक था।

दो ऐसे गुट है। जो द्वंद के घेरे में बाध्य हुए पड़े है। 

और राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सोझ करने के लिए बड़ी ललकता और लुभाउक्ता से राजनीति मे दाव पेज लड़ाते है। 

उनके शतरंज का पासा बनकर लोग उनके चौपालों पर नाचते हैं।

मैंने उस द्वंद के अग्नि को भड़केत हुए देखा। 

मैं चाहकर भी उस द्वंद को रोक ना पता। 

मैंने उस द्वंद को भाप लिया था। 

इस द्वंद्व को रोकने का सामर्थ्य मुझमे नही था। 

मेरे अकेले का प्रबल उस भीमकाय द्वंद के समकक्ष एक तिनका था।

इस द्वंद से निकलने में केवल बौद्धिकता की प्रबलता ही एक मात्र मार्ग थी। 

धीरे – धीरे उस द्वंद की अग्नि लोगो को अपने लपेट में लेते जा रही थी।

 आहुतियों की अग्नि, एक विशाल अग्नि कुंड में परिवर्तित हो रही थी।

एक रंग के द्वंद्व में मस्त। दूसरा विलाप के द्वंद्व में मस्त। तीसरा संजय की तरह द्वंद्व को देखने मे द्वंद्व की दिव्या दृष्टिता में मस्त। 

ना तो ये नारायण सेना थी। नही परमात्मा की सेना थी। ये तो सेना थी। केवल मस्तिष्क में भरे वीभत्स विचारों की थी । जो विचारों को कुरेद के बानी गई थी। जिनसे जीवन मे व्यप्त भावो को सूखी मृदा के समान सूखा दिया था। इस द्वंद्व का बीजा रोपण मस्तिष्क में उत्तपन्न किया गया। जो मानसिक द्वंद्व से एक सामाजिक द्वंद्व बन गया।

अधर्म धर्म का चोला पहने हुए रण में खड़ा था। आवाहन और शंखों की ध्वनि इस तरह थी। कि पराजय किसी एक समुदाय और मानवता का निश्चित ही था। रण क्षेत्र मे द्वंद्व बाहे फैलाए एका- ऐक- एक – एक को अपने भीतर समाए लिए जा रहा था।

– इशाद शेख…

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