“कुदरत भेद बनाती है भेदभाव नही, समाज कुदरत के बनाए भेद के आधार पर भेदभाव करने लगता है.”

“भेदभाव यह शब्द हम कई बार सुनते है और कई बार दोहराते भी है, यह शब्द हम सभी के निजी जीवन से जुड़ा है यह हम सभी को पता है। पर फिर भी हम इस जुड़ाव को अनदेखा करने की कोशिश करते आये है। क्या कहना चाह रही हु कुछ समझ आये तो बताना ज़रूर!

हाल ही में हुवा एक किस्सा सुनाती हु।  शारदा नामक  मेरी दोस्त है।  वो नेरुल में एक आदिवासी पाडा (बस्ती) में रहती है। २५ मार्च से पूरा  भारत कोरोना महामारी के चलते ठप्प हुवा  है।  हालांकि २०१४ से ही हमारे देश का सारा सिस्टम सही से काम करना बंद हो चुका है।  पर अब भारत की जनता , कामकाज ,सुविधाए ,रोजगार  आदी की स्थिति बिकट है। तो शारदा मेरी दोस्त अपने ३ बच्चे, (एक बेटी और २ बेटे ),पति और पिताजी के साथ जैसे आप सभी मानते है की स्त्रियों को अपना घर संभालते रहना चाहिए वैसे रहती है।  २५  मार्च से कोरोना वाली महामारी शुरू हुई और lockdown की वजह से शारदा के पति का और शारदा का काम बंद पड़ा।  कोई भी घर से बाहर न निकले यह एलान तो हमारी सरकार ने कर दिया। पर शारदा एक घरेलु कामकाजी महिला और उसका पति नाका कामगार और हमारे देश में श्रमिकों के लिए बनाये गए कानून कौन बनाता है ? उस मुताबिक इन दोनों को भी उतना पगार नही की, वे कुछ पैसे उस कमाई से निकालकर भविष्य के लिए बचाए।

एक तो उसका पति पितृसत्तात्मक विचारों का और ऊपर से नशे का अधीन। एक अरसे से इस पितृसत्तात्मक सोच रखने वालो का विश्वास बढ़ता चला आया है, की महिलाये इस समाज मे सबसे कमज़ोर अंग / हिस्सा है। पैसे और काम न होने की वजह से शारदा का पति अपना तनाव अपना गुस्सा शारदा और बच्चो पर निकालने लगा।  जब शारदा ने उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत करनी चाही तो पुलिस उसे कहने लगी की ये आपके घर का मुद्दा है आप घर में सुलझा लीजिए। इस तरह से घरेलू हिंसा के एक और शिकायत को अनदेखा किया जाता है।

दोस्तों यह  केस आपको मैंने इसलिए बताया क्योंकि आपकी इस पर प्रतिक्रिया क्या है? ये जानना चाहती थी। बोहोत लोग होंगे जिनको यह केस पढ़कर लगा होगा की ये तो आम बात है, और पुलिस ने भी सही ही किया है। यह  तो घर की बात है! शारदा को पुलिस में जाकर शिकायत नही करनी चाहिए थी। और कुछ लोग होंगे की जिन्हें महसूस हुवा होगा की शारदा ने सही किया।  पुलिस ने शारदा की रिपोर्ट लिखनी चाहिये थी, और पुलिस ने उसके पति ने जो जुर्म किया उसे सजा देने का काम कानूनन करना चाहिए था। और कई लोग ऐसे भी होंगे, जो सोचते होंगे, “पति है उसने मारा तो क्या गलत कर दिया ! यह छोटीसी तो बात है अब पति है गुस्सा  आया तो मार दिया होगा उसने। और ये हमारे देश ,बस्ती ,मोहल्ले के हर दुसरे घर में होता है।  हम रोज़ देखते, सुनते, और पढ़ते है, इसमें क्या नया है?  खामखा इतना बड़ा रही है यह  लडकी इस बात को।

यह जो शारदा के साथ हुवा  ये हमारे देश की हर दूसरी महिला के साथ होता आया है और हो रहा है . बोहोत कम ऐसे पुरुष और महिलाये है जो लैंगिक समानता पर विश्वास करते है और इस मुल्ल्य को अपने निजी जीवन में भी पूरी सच्चाई के साथ अपनाते है जुडाव रखते है .राष्ट्रिय महिला आयोग के आंकड़ो के तहत इस महामारी के चलते महिलाओ पर होने वाले हिंसा /अत्याचार का प्रमाण दुगनी तेजी से बढ़ रहा है.२० मार्च  से १६ अप्रैल  इस दरमियाँ पुरे देशभर में महिलाओद्वारा ५८७ शिकायते दर्ज की गयी है . जिसमे २३९ केसेस घरेलू हिंसा के है . २७  फरवरी से २२ मार्च तक १२३ कैसे हुए याने आगेके २५ दिनों में ये आंकड़े +१०० से ज्यादाकेस की बढ़ोतरी हुई . यह दर्ज हुए केसेस है जो सामने आये है शारदा जैसे ऐसे कयियो केसेस है जिन्हें पुलिसे नही दर्ज करती या फिर समाज क्या कहेगा इस डर से दर्ज नही किया जाता  तो सोचो ऐसे कई केस होंगे जिसमे रोज़ महिलाये जलाई जाती है उनको मारा जाता है उनके सपने कुचले जाते है उनकी आवाज़ दबाई जाती है .

ये सब तो घरेलु हिंसा और महिलाओं पर हुए सामाजिक पारिवारिक हिसा के आंकड़े . महामारी जब से शुरू हुई तब से हमारी सरकार जिसे शायद हम ने चुनकर दिया और वो सत्ता में आई इस सरकार ने और ही अच्छे काम किये . मुंबई एक ऐसा शहर है जो देश के अलग अलग हिस्सों से आये हुए लोगो ने और श्रमिकों ने बसाया है और इस शहर को अपनी मेहनत से सजाया है. जिसमे कई महिलाये अपने परिवार के साथ यहाँ पर रोज़गार पाने की आशा लिए यहाँ इस शहर में आये और बस्तियों में घर किराये पर लेकर अपनी रोज़मर्रा की जीवन की जरूरते पूरी कर रहे थे.

३० जनवरी २०२० को कोरोना का पहला मरीज हमारे भारत देश में पाया गया तबसे १८  मार्च तक हमारे  प्रधानमंत्री जी ने कोरोना के सम्बंधित कोई भी निर्णय नही लिया और  अचानक से १९ मार्च को वे घोषणा करते है की पुरे भारत में २२ मार्च को जनता कर्फ्यू रखा जाएगा कोई बहार न निकले. अब होता क्या है जन देश में कोरोना के ५०० से अधिक केस बढ़ते जाते है  तब वे आकर २४ मार्च को २१ दिन का lockdown की घोषणा करते है .जनता के हित को सामने रखते या कोई भी तयारी (जनता के लिए) न करते हुए देश भरमे lockdown शुरू हुआ. और ये lockdown मरीजो के बढ़ते आंकड़ो के तहत बढ़ता चला  गया.

पितृसत्तात्मक विचारधारा ये कई सालो से चलती आ रही है और कुछ इस विचारधारा का समर्थन करने वाले लोग निंदनीय सोच को पीढ़ी डर पीढ़ी आगे बढ़ाते चले जा रहे है . छोटी चोट्टी चीजो में यह विचारधारा नजर आती है जैसे स्कूल की किताबे  भी ये सिखाती है राम आम खा रहा है सुधा बर्तन मांज रही है , या फिर सिर्फ महिलाओं का नौकरी पर जाने से पहले और घर आने के बाद भी घर का काम करना , घर के सारे काम सिर्फ महिलाओ से ही कराया जाना , बड़ो का आदर करना तहजीब से रहना बड़ो के सामने ऊँची आवाज से बात न करना , ढंग के कपडे पहनना , परदे में रहना , पर पुरुषोसे दोस्ती तो क्या बात तक न करना , झुक कर चलना , देर रात याने ७ बजे के बाद घर से बहार न निकलना , ऐसी कई चीजे है जो हम महिलाओ के रोज़ मर्रा के जीवन के अनुभव करते आये है . मै यह नहीं कह रही हु के ये सभी महिलाओं के साथ आज भी हो रहा है . पर हम ये भी झुठला नही सकते के आज भी ५० % से अधिक महिलाएं आज भी इस सोच / विचारधारा से झुंज रही है.

हालांकि ये विचारधारा कई सालो से चलती आ रही है पर इस महामारी के चलते ये और भी ज्यादा उभर कर आती हुई दिख रही है . जैसे जो महिलाये नौकरी पर जाती थी उन्हें वर्क फ्रॉम होम दिया गया था पर लॉकडाउन होने की कारण घर के सारे लोग घर पे थे तो उनका खाना बनाना घर का सारा काम करना बच्चो  को संभालना और उसके साथ साथ ऑफिस का काम करना इन सभी चीजों के कारण स्त्रियों को बड़ी कठिनाईया आई है और उनपर शारीरिक  और मानसिक इन दोनो ही तरह से लॉकडाउन का बोहोत ही बुरा असर पड़ा है . आखिर कब तक हम इंसान किसी गलत विचारधारा का समर्थन करेंगे और कब तक महिलाओं के अधिकारों का हनन करते रहेंगे ? संविधानिक रूप से इस भारत में जन्मे  हुए हर एक व्यक्ति को आज़ादी है .  पर जब स्त्रियों की बात आती है तब इस शब्द का या तो अर्थ बदल दिया जाता है या तो इस शब्द का इस्तेमाल करने पर भी उसे संस्कार याद दिला दिए जाते . गर हमें ऐसी विचारधारा से सच में लड़ना है तो यह लड़ाई हमें अपने घर से शुरू करनी होगी तब ही जाकर हम समाज में परिवर्तन ला सकते है.

हमारे स्वयं से शुरुवात करना ज़रूरी है क्योंकि हमारे ऊपर भी इस पितृसत्तात्मक विचारधारा का काफी प्रभाव पड़ा है तो इसीलिए हमें खुदसे शुरुवात करनी चाहिए और मेरी पसंदीदा एक पंक्ति है – दरिया की कसम मौजो की कसम ये ताना बाना बदलेगा तू खुद को बदल तू खुद को बदल तब ही तो ज़मान बदलेगा तो दोस्तों चलो खुदसे शुरुवात करते है. गलत के खिलाफ आवाज उठाना सिर्फ हमारा अधिकार ही नहीं तो समाज के प्रति हमारा कर्तव्य भी है तो चलो आज़ाद इस शब्द का सही अर्थ जानते है और इन्सान को इन्सान मानते है.

 

~ लारा पागडे

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