हम भारत बनानेवाले युवा !!!!!  

“संविधान में हमारे सपनों का भारत बसता है।“-यह वाक्य मेरा नहीं है। भारत को समता, स्वातंत्र्यता, न्याय तथा बंधुता के आधार पर निर्माण करने की नींव रखने वाले, भारत का आईन बनाने वाले, भारत को आधुनिक बनाने वाले, आधुनिक भारत के महानतम शख्सियत बाबासाहब भिमराम रामजी आंबेडकर जी का वाक्य था, जो कि पूरी जिंदगी भर उनके जीवन के उद्देश्य से जुडा हुआ था। महात्मा गांधी कहते –“मेरे सपनों का भारत तो गांव में बसता था।“ हालांकि इन दोनों के सपने भारत के प्रत्येक व्यक्ति के साथ खड़े रहने की बात करते थे। पर आधुनिकता के इस रेलचेल में बाबासाहब का सपना सच्चे मायने में व्यक्ति की प्रतिष्ठा न्याय देता है। उनका सपना सिर्फ भारत को आधुनिक बनाना नहीं था, बल्की उसके साथ –साथ भारत के हर एक व्यक्ति को शिक्षित बनाना था।

इसी से जुडा उनका एक वाक्य भी हम सुनते ही आये है, -“शिक्षित बनो, संघटित बनो और संघर्ष करो”। यह बात हर एक व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनाने का मापदंड है। राष्ट्र का विकास उनके नागरिकों के शिक्षा पर निर्भर होता है। वे ऐसे राष्ट्र का निर्माण चाहते थे, जो सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक समानता तथा न्याय को सुनिश्चित करनेवाला हो। फिर सवाल आता है; क्या हम उनके और हमारे राष्ट्रनिर्माताओं के सपनो का राष्ट्र बनाने में कामयाब हो गये है या नहीं ? सवाल से जुड़े दो जवाब मुख्यतः: अपेक्षित होते है। अगर जवाब “हाँ” है तो आज गरिबी,बेरोजगारी,न्यूनतम शिक्षा का स्तर, बेजान खेत-खलियान, रास्ते-बिजली आदि से लेकर जिंदगी जीने वाली मूलभूत दवाइयों से हर आदमी मोहताज क्यों है? ऐसे कई सारे सवाल उभरकर आते है। मात्र जवाब “ना” के पक्ष में हो तो उसके कारण हमें  भारत के नागरिक होने के वास्ते टटोलना जरूरी समझना चाहिए। हम भारत को कैसा बनाना चाहते है ? इस बात को समझने के लिए हमारी उतनी समझ, शिक्षा, सामाजिक मूल्य, इस पर सब कुछ निर्भर होता है।

भारत को समता, स्वातंत्र्यता, न्याय तथा बंधुता के आधार पर नये राष्ट्र बनाते वक्त “राष्ट्रवाद” की भावना की जरुरत होती है। हालाकि हमारे देश में वर्तमान में राष्ट्रवाद के दो अर्थ पाये जाते है। एक ब्राह्मणवादी संघचलित विचारधारा से प्रभावित उग्र हिंदू राष्ट्रवाद, जो जाति-प्रथा अग्रणि रखकर राष्ट्र निर्माण की बात करता है। और दुसरी १९०० वी सदी में शुरु हुई, जो लोकतंत्र, समता-समानता, स्वातंत्र्यता, न्याय तथा बंधुता की नींव रखकर भयमुक्त, कल्याणकारी राष्ट्र निर्माण की बात पर जोर देता है। जोतिबा फ़ुले, पेरियार, नारायण गुरू, शाहु महाराज, भाऊराव पाटिल, आंबेडकर आदी ने इस विचारधारा को सिंचा है। भारत को आझादी मिल के 73 साल हो चुके है। इसके बाद भी अगर हम हमारे देश  को बेहतर बनाने के कामयाब नहीं है,तो हमें जरूर मंथन करना चाहिए। विशेषता हमारे युवाओं ने !

माना जाता है, कि विश्व में सबसे ज्यादा  हमारे ही देश में युवाओं की आबादी पायी जाती हैं। तो फिर सवाल बनाता है, हमारे युवा आखिर क्या कर रहे है? क्या उन्हें उनके कर्तव्य का अहसास मिला है? क्या उन्हें कहाँ गुमराह किया जा रहा है? क्या उन्हें मिलने वाली शिक्षा किसी धुंधले वर्तमान में लेकर जा है। मैं इनके जवाब नहीं देना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि, वे विचार करें और अपने अंतर्मन को प्रामाणिक सवाल करें, उस कर्तव्य को सोचे जो राष्ट्र हित में अपना योगदान दे सके। हमें आज भी भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, इनकी कुर्बानी युवा की असिम शक्ति कि याद दिलाती है।

मुझे अपनी युवाओं की वायु सी बहनेवाली शक्ति पर थोड़ा संदेह निर्माण हुआ है। सदियों से जाती-वर्ग गुलामी ने भारत को एक संघ बनने नहीं दिया। शिक्षा नीति लगातार धार्मिक लिहाजों में लिपटा हुवा अभ्यासक्रम हमें पढा रही है। हमने वाशिंगटन कार्वर को पढा नहीं, क्योंकि वे कहते है- “ always remember ! Never be satisfied, start where you are, use that you have, and make something of it different” शिक्षा के संदर्भ में यह बात उतनी ही सटीक लगती है। 70 % युवाओं को गुमराह किया जा चुका है। हाल ही में आई डॉक्यूमेंटरी “द सोशल डिलेमा” इसी बात का संकेत देती है। जिस युवावस्था में भारत को बनाने का अधूरा सपना पूरा करने की जिम्मेवारी है, उसी समय हम किसी के “यूजर” बन चुके है। इसी बात को अधिक स्पष्ट करने वाले ‘नवीन रांगियाल’ अपने एक लेख का शीर्षक ही कुछ इस तरह देते है,-“मोबाइल पर आने वाला हर “नोटिफिकेशन” आपके दिमाग को गुलाम बनाने की एक साजिश है।

“नई शिक्षा नीति २०२० तो हमारे “स्किल बेस एज्युकेशन” देने की बात करती है। १२ वी के बाद जॉब ऑफर करने वाली कई सारी कंपनिया हमें जॉब देंगी। इनकम आते ही हमारी शिक्षा की रुचि कम होगी। ना हम आगे पढ़ पाएंगे। आपको पता होगा पदवी तक के शिक्षण का कोई मोल नहीं है। जो हमें उसी इतिहास को, उसी भूगोल को, उसी गणित को दोहराते ही रहती है। हमें सही शिक्षा पदव्युत्तर शिक्षा के बाद आती है। पर हमारे युवा पदवी के बाद यानी १५वी के बाद जाने में रुचि ही नहीं रखते। आगे चलकर यही पदव्युत्तर शिक्षा नीतियां बनाने में मददगार होती है। हम हमारी पॉलिसी भी बना नहीं सकते है, इतना दुर्भाग्य ! इसका मतलब साफ है। हम गुलाम बनने के कुछ ही दूरी पर है। फिर गुलाम युवा कैसा भारत बनाएगी?

एक तरफ धर्म की गुलामी, एक तरफ इस सभी सोशल मीडिया की गुलामी, एक तरफ खोंखली शिक्षा नीति, और पुछे गरिबी-बेरोजगार की खाई दिखाई देती है। इसलिए उम्मीद कम  दिखाई देती है। पर ऊपर दिया हुआ कार्वर का वाक्य आप पढ़े होंगे तो आपको एक ऊर्जा जरूर मिल सकती है। वे कहते है –“start where you are, use that you have, and make something of it different” but Never be satisfied !!” मैं चाहता हूँ कि,अगर हम बाबासाहब और हमारे अन्य राष्ट्रनिर्मातों के सपनो का भारत बनाना चाहते हो। तो शिक्षा को हथियार बनाओ ! उच्च शिक्षा ही एकमात्र बदलाव का जरिया बन सकती है। आप अपना समय खोखले आदर्शवाद पर ना गवाते हुए उच्चशिक्षा को हासिल करेंगे। तब आप के साथ नई सोच, क्षमता, तर्क-वितर्क, रचनात्मकता, निर्णयक्षमता जो “ऐसा भारत बनाने में कारगर साबित होगी। हमारे दूसरे राष्ट्रवाद की व्याख्या करने वाले फुले से लेकर आंबेडकर तक के सभी राष्ट्रनिर्मातायों ने समाज परिवर्तन में शिक्षा का अहम योगदान माना है।

 

~ अमित शालिनी शंकर 

9773822796/7506048959

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