मैं, समुद्रा

मैं,

समुद्रा

दुनिया में भारत देश के, महाराष्ट्र राज्य के, सबसे बड़े शहर मुंबई में रहने वाला 19 साल का विद्यार्थी.. हम शायद आज जो बात कर रहे है वो जटिल हो। पर दुनिया, उसके साथ आने वाली अनेको नीतियां और सत्ताऐ समझने के प्रयास में कुछ बातें इस वक्त साँझा करना बड़ा जरूरी है।

‘बीतेंगे कभी तो दिन आखिर यह भूख और बेकारी के,

टूटेंगे कभी तो बुत आखिर दौलत के इजारेदारी के,

हक मांगने वालों को जिस दिन सूली ना दिखाई जाएगी, अपनी काली करतूतों पर जब यह दुनिया शरमायेगी,

तब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी।”

कुछ इसी तरह मानव उत्क्रांति की कहानी अपने आप में कई संघर्ष गाथाएं लेकर आती है। बुनियादी खाने, पीने, रहने पहनने और जीने की भी। पर वक्त के साथ इसमें व्यवहार आए, रिश्ते बने, कुछ अच्छे कुछ बुरे।  इसमें कई रिश्ते समय के साथ बदले उनमे वैचारिक विकास के साथ व्यवहारिक विकासशीलता लाई गई, जो रिश्तो को बेहतर बनाने की प्रक्रिया है। पर सब में सबसे जटिल अगर कोई चीज मुझे लगी तो वह होगी “शोषण” और इसके दम पर बना शोषक और शोषित का रिश्ता! एक ऐसे ही रिश्ते पर आज मुझे बात करनी है। 

1835 में हुई औद्योगिक क्रांति ने इंसानी जीवन के अनेकों पहलू में विविध बदलाव लाएं।  कहते हैं 

If you see a problem and come up with a solution many times a solution create a new problem

कुछ ऐसे ही हाल शायद हमारी भी हुए हैं। औद्योगिक क्रांति के पीछे सबसे बड़ा कारण देखा जाए तो  पूंजीवाद (Capitalism) है जिसके जरिए आज भी ९०% साधनों पर १०% अमिरो का राज है। फिलहाल GDP नीचे आने की वजह से इन आकड़ों मे बदलाव हो सकते है।  मैं औद्योगिक क्रांति को पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं कहना चाहती, पर उसने काफी चीजों में बदलाव लाएं और इन्हीं बदलाव को विकास के नाम पर बेचने का काम पूंजीवादीयोने  किया और उनके दलाल बने मीडिया, राजनेता और अन्य कई लोग, जिन्होंने विकास की व्याख्या तय की जो कई सवालों के साथ आई ,किसका विकास? किसके लिए? किसकी मांग है यह विकास?

Definition of Capitalist development is “Process of increasing productivity and extraction of surplus” इसी सूत्र के साथ कई लोगों पर इसके काफी अलग-अलग परिणाम हुये। पर मेरे मुताबिक श्रमिक वर्ग सबसे बड़ा तबका है, जिसने इसे काफी स्तरों पर अलग-अलग शोषण के प्रकारों के साथ सहा है। 19वीं सदी में 8 घंटे का काम करने मजदूरों की जो लड़ाई शुरू थी, वह आज 21वीं सदी में फिर भारत में शुरू करनी होगी। 19वीं सदी में जो समान काम के लिए समान वेतन की लड़ाई शुरू की थी, वह आज फिर लड़नी होगी।  छुट्टी के लिए लड़ी गई लड़ाई हो, सुरक्षा के लिए लड़ी गई लड़ाई हो या अन्य कई लड़ाइयां जो हम ने अनेकों सालों से लड़ी है; लेकिन आज फिर बदलते हुये  कानून हमें फिर उसी दोहराएं पर ला, लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं। अगर इसे राजनीतिक संदर्भ में समझा जाए तो यह स्पष्ट और जोरदार संदेश है भारत में तैयार की जा रही एकल सत्ता का, की कोई भी जो इस ताकत को चुनौती दे उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा और क्रूरता पूर्वक कुचल दिया जाएगा। जिन्हें कानूनी शब्दों में लपेट कर पेश किया गया है।

पर इन लड़ाईयों को तो हमने सदियों से लड़ा है। और आगे भी लड़ेंगे पर सबसे बड़ी लड़ाई अगर कुछ होगी तो वह मजदूर से श्रमिक बनने तक की। क्योंकि कोई मेरा मालिक नहीं है और ना मैं किसी का गुलाम हूं, मैं काम करता हूं जिसका मुझे वेतन मिलता है, तुम वेतन देते हो क्योंकि तुम्हें मेरी और मेरे काम की जरूरत है। यह इतना ही स्पष्ट और साफ है। पर इसे हर वेतन लेने और देने वाले स्पष्ट रूप से बताना और जताना जरूरी है।

अब हमारी बुनियादी लड़ाई को जरूरत है साँझे  प्रयास कि। आज महाराष्ट्र में यूनियंस को खत्म किया जा रहा है। ताकि कायदो, कानूनों में मनमर्जी बदलाव कर मनमानी तरीके से श्रमिकों को मजदूर और मजदूरों को गुलाम बना उनका शोषण किया जाए और इसी शोषण को छुपाने के लिए विकास के सपने दिखाए जा रहे हैं।

इन सभी संघर्षों, लड़ाई और नीतियों को जानने के बाद जेहन में एक सवाल आता है। बुनियादी हक और जरूरतों की लड़ाईयो का इतिहास पुराना है और काफी प्रेरणादायक भी जहां अनेकों कलात्मक तरीके से यह संघर्ष चले।  सवाल यह है कि इतने सालों बाद भी बुनियादी चीजों के लिए आज भी कुछ लोगों को संघर्ष क्यों करना पड़ता है?

~ समुद्रा

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