शहर निर्माता और हम

यूं तो हम सभी बड़े बड़े शहरों में रहते हैं, और शहरों को पहचान होती है वहां की स्वास्थ्य, परिवहन, उद्योग, कारखाने, नौकरी की अपार संभावनाएं, जल आपूर्ति ऐसे ही ना जाने कितने संसाधन से जो यहां उपलब्ध होती हैं.। उसी शहर के किसी कोने में होता है कोई ऐसा कस्बा, या एक बस्ती जोकि विकसित नहीं होता, वहां पीने की पानी की उचित व्यवस्था नहीं होती, वहां कूड़ा निपटान की व्यवस्था नहीं होती, यहां तक कि वहां पर गुजर बसर कर रहे लोगों के लिए पर्याप्त सामुदायिक संसाधन भी उपलब्ध नहीं होता।

ऐसे ही किसी कस्बे में रह कर गुजर बसर करते हैं हमारे शहर के निर्माणकर्ता। इन्हे हम (सिटी मेकर्स) के नाम से भी जानते हैं। जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है कि ये वो लोग हैं जो इस शहर के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।। लेकिन क्या उनकी दयनीय हालातों के बारे में किसी को पता है, क्या आप जानते हैं कि ये शहर में बड़े बड़े मकान और बहुमंजिला इमारत बनाने वाले वो मजदूर भाई होते हैं जो किसी गांव के मिट्टी के घर को छोड़ कर आपके शहर के निर्माण में योगदान करने आते हैं, ये वो लोग होते हैं जिन्हें अपना सिर छिपाने के लिए किसी फ्लाईओवर तो किसी मंदिर के नीचे अपना आशियाना बनाने के लिए विवश होना पड़ता है! ये वो लोग होते हैं जो बड़ी उम्मीदों के साथ गांव से पलायन करके शहर आते हैं जिनसे उनकी जिंदगी थोड़ी आसान हो जाए। पर कभी सरकार की लापरवाही की वजह से तो कभी बिना वजह के उन्हें प्रताड़ित करके दर दर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। कभी कभी तो इनकी बस्ती को तोड़ कर उन्हें बेघर कर दिया जाता है। जब भी सरकार द्वारा इसके लिए कोई योजना बनाई जाती है, तो  उन्हें सही प्रकार से कार्यान्वित करने में सरकार विफल रहती है। ये सारी योजनाएं बस सरकारी फाइलों में ही दब कर रह जाती हैं। आज भी उन्हें वो हक वो अधिकार नही मिलता जिनके ये हकदार हैं। कभी भ्रष्ट अधिकारी तो कभी अपने ईमान को बेच कर उनका हक़ के पैसे भी लोग हड़प जाते हैं। आज हमारे शहर के निर्माण के योगदान करने वाले लोगों को ऐसे हाशिए पर धकेल दिया गया है जहां से उनको वापस आना बहुत मुश्किल है। इसका जीता जागता उदाहरण हमने पिछले साल (कोरोना काल) में देखा था जब कितने (प्रवासी मजदूर) शहर छोड़ कर अपने अपने गांव की ओर वापस लौट गए।

पर एक सवाल पीछे छोड़ गए, सवाल ये कि क्या वो लौट सकेंगे शहर की ओर? क्या स्थिति होगी उनकी और उनके बच्चों की.? या फिर बस यूं ही एक गुमनाम जिंदगी के साथ जीयेंगे वो?

आज इस सवाल का जवाब सरकार को ढूंढना होगा और हम सबको भी ढूंढना है तभी उनकी पीड़ा को समझ पाएंगे और उन्हें फिर से अपनेपन का एहसास दिला पाएंगे.! 

– सुजित अनुराग

विभाग – मुंबई

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