लॉकडाउन पेट पर…

जो ऊंची ऊंची बिल्डिंग देखते हो ना, उसमें हर मजदूर का पसीना है साहब,

जो अलग अलग वरायटी के कपड़े सिलकर फिर ब्रांडेड बनते है ना, उसमें इन्ही की कारिगिरी होती है साहब,

ये पत्थर को नया आकार देकर उसे संजोने का काम करते है,

जैसे कोई बिखरी हुई चीज पल में निखर जाए वैसे ही ये अपने काम को अपनी जान जोखिम में डालकर उतारते है साहब,

आज यह मजदूर, यही कारीगर दर दर की ठोकरें खा रहे है साहब,

एक रोटी के निवाले के लिए पल पल तरस रहे है साहब,

लॉकडाउन तो पूरे देश पर लग गया पर इस पेट पर तो लॉकडाउन नहीं लगता ना साहब, 

अपने घर वालों से मिलने के इंतजार में चल कर ही पूरा रास्ता नाप लिया उन्होंने साहब,

कुछ ने भूख से ही अपने प्राण त्याग दिए थे ,

और कुछ तो रेल की पटरी पर कुचल दिए गए!

तब इंसानियत मर गयी थी क्या साहब? 

मेरा देश इस महामारी की वजह से बदल रहा है, यह पैसा सब कुछ बोलता है और गरीब पल पल मरता है साहब,

मजदूर भी तो इंसान ही है ना फिर क्यों नहीं सोचा जाता उसके बारे में उसके परिवार के बारे में साहब,

वह कोई जाति या धर्म का हो इससे क्या फर्क पड़ता है, लेकिन फिर भी इनसे हर कोई दूरी बनाता है ना साहब,

मजदूर मरता भी आत्मनिर्भर होकर, वह किसी के आगे झुकता नहीं, वह मरते समय भी मेहनत और संघर्ष कर मरता है साहब….

– ऍड. अनुराधा शोभा भगवान नारकर

विभाग – मुंबई

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