स्वतंत्र

की तुम आना इस अ-स्वतंत्रत जहां में

हमारे स्वतंत्र इश्क़ की खुशबू लिए

मैं देखूंगी तुम्हारी आंखों में

पीड़ा दर्द अत्याचार के वह मंजर

कुछ पल ठहरूंगी,

और लगाऊंगी तुम्हें अपने गले

हम एक दूसरे की बाहों में कैद हो

कर देंगे एक दूसरे को आजाद।

मैं सुनाऊंगा तुम्हें गीत उत्पीड़न के

जो सुने होंगे मैंने आते वक्त रास्तो में

मैं लाऊंगा अपने साथ गर्माहट

उस क्रांति की चिंगारी कि

जिसकी तपिश से, फिर जिंदा हो उठेगा हमारा दिल और यह जो बदन ठंडा हो गया था

अत्याचार सहते सहते

फिर उसमें होगा ऊर्जा का संचार

तेरे मेरे आलिंगन से।

जब मेरे लब टकराएंगे तेरे लबों से

और हम कर देंगे एक-दूसरे को मौन

उस क्षण चीखेगी हमारी आत्मा

जो अस्थिर कर देगी व्यवस्था को

लगेगा इंकलाब का नारा, मशाले लिए सड़कों पर उतरेंगे लोग

अपने अत्याचारों का हिसाब मांगने

तोड़ने हर उस दीवार को जिसने

वंचित रखा उन्हें उनके हकों से।

और स्थापित करेंगे व्यवस्था समता से समानता की, जो इंकार करेगी हर उन मान्यताओं का जो रोकती है एक इंसान को इंसान बने रहने से,

और स्थगित कर देगी हर व्यवस्था जो बांधती है हमें दायरों में।

जहां काले रंग को नहीं निकाला जाएगा सुंदर रंगों की श्रेणी से

और काला रंग दर्शाएगा अपनी सुंदरता

तुम्हारी काली जुल्फों काली आंखों काले काजल और नजर के काले टीके में।

हम चुराएंगे परचम हर राष्ट्र, हर जाति,

हर धर्म, हर लिंग, हर समुदाय का

और जोड़ेंगे उन्हें

अपने लहू के धागों और आवाजों की सुई से

और लहराएंगे परचम

वासुधैव कुटुंबकम का।

मानसी उषा, रिझवान चौधरी
विभाग – मुंबई

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