“रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे मोती, मानुष, चून।”

“मंदिर मे क्या करने आया….?”

“मंदिर मे…… पानी पीने!”

बस यह सूनके उनके पैरो तले जमीन फट गयी हो, अपने धर्म ने सिखाई बाते भुलकर चंद लोगो के अमानुष बर्ताव  के वजह से किसीं प्यासे को एक बुंद पानी के लिये मार झेलनी पड़ी।

यह बात तो सोला आने सच है की, पानी मूलभूत अधिकार होकर भी संघर्ष, आंदोलन करने पड़ रहे है।

आज हमारे सामने एक आसिफ है, पर यहाँ हजारो ऐसे आसिफ। उनमे से एक मे भी!

हम जानते है, यह मुम्बई शहर श्रमिकों का शहर है। अपने पसिनेसे खड़ी की मुम्बई में जीने के लिए हमें  जो रोजगार मिले वो कर लेते है। और यही के सड़क पर रहकर अपना गुजारा कर लेते हैं। यहाँ की ऊँची इमारते देखते हो? वो हमने बनाई। यहाँ की सड़क देखते हो? वो हमने बनाई। यहाँ के स्कूल, मकान, अस्पताल,बड़े बड़े ब्रिज, मेट्रो लाइन देखते हो? वो हमने बनाई। क्या तुम जानते हो? शायद ही तुम्हें पता है। पर मुझे आज कुछ और बताना है, बताने से ज्यादा मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए। मुझे पानी चाहिए। क्या तुम मुझे मेरे अधिकार का पानी  दे सकते हो? 

दिन शुरू होते ही हमारा पूरा परिवार सड़क किनारे फूटे पाइप के पास, किसी दुकान में या फिर किसी पानी के दलाल के पास जाते है। अपनी प्यास बुझाने पानी के लिए!

बड़ा अजीब लगता हे मुझे, जब कुछ लोग कहते है, “पानी बचाओ पानी बचाओ…”अरे भाई यहाँ मुझे पीने का पानी नही में कैसे पानी बचाऊ?

आपको पता है में और मेरे परिवार वाले कहां से पानी लेते है? 

सड़क किनारे एक बस्ती है वहाँ के हर घर के सामने जाकर कहना पड़ता है….. ” बहन थोड़ा पानी मिलेगा….?” और सामने से प्रत्युत्तर आता है, ” आ गए भिकारी, रोज रोज मुँह उठाकर चले आते है पानी मांगने। नही मिलेगा पानी वानी चले जाओ।” और गालियों की बरसात होती है, पर हम सुन लेते हैं। बुरा तो तब लगता है, जब वो भिकारी कहते हैं। सुनकर आगे चले जाते है। कोई देगा पानी तो ठीक वरना किसी और घर के सामने जाओ और कहो, “बहन थोड़ा पानी मिलेगा?”

सड़क किनारे सार्वजनिक टॉयलेट होते है। उस टॉयलेट का पानी पीने के लिये इस्तेमाल करते है। नहाने के लिए कपड़े – बर्तन धोने के लिए वही पानी। उस पानी से हम बीमार गिरते हैं। पर क्या करे हमारी सुनेगा कौन?

ये सरकार….. नही! नही! बिल्कुल नहीं! 

यह सरकार तो सिर्फ अमिरोकी की जो बड़े बड़े फ़िल्म स्टारोको, बिल्डिंग में रहने वाले लोगो को मानवता के आधार  पर पानी देती है। पर हमे पानी देने के लिए बडी झिझकती हैं। कहते हैं बेघरों को हम पानी नही देंगे। इतना ही नही मेने तो सुना है मुम्बई में कई बस्तीया है जहाँ बीएमसी ने कानूनी तरीकेसे पानी नही दिया। उन्हें कहते है, तुम फ़ॉरेस्ट की जमीन पर रहते हो, तुम रेल्वे की जमीन पर रहते हो, यहाँ अनधिकृत हो वहाँ अनाधिकृत हो, ये वो और न जाने क्या कुछ नही कहते।

बचपन से ही सुना है पानी नैसर्गिक साधन संपत्ति है। यही नहीं तो पानी संवैधानिक अधिकार भी हैं। सभी नागरिकों तक समान पानी देने सरकार की जिम्मेदारी है। फिर पानी न देने की राजनीति क्यो..?

पानी जहाँ जाए वो रंग ले लेता है। पानी कभी भेद नही करता। तो हम क्यों करे। इंतजार हैं मुझे उस दिन का जिस दिन मुझे मेरे हक़ का पानी मिलेगा!

संत रहीम कहते है, “रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गये न ऊबरे मोती, मानुष, चून।”

~ पूजा रुक्मिणी जालिंदर

विभाग – मुंबई

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