दमन के साथीदारों,

आप शायद भूल रहे होंगे,

आपकी पहचान भी हमसे जुडी है।

लाख कोशिश कर दो,पहचान मिटाने की; 

किसी अंश के, सुराग के रूप मे जिंदा हम है।

आजादी के मायने बदलते होंगे आपकी नजरों मे,

हम आज नहीं, सदियो से ही आझाद है।

बस हमारी इस चुप्पीयों को पतन मत समझना!

दुनिया का कोई भी भूतकाल पलटकर देखो, 

हमने ही इतिहास रचा है।

हे दमन के साथीदारों, हिंसा को हमने ‘करुणा’ मे तब्दील किया है।

सबूत चाहिए होंगे, तो जमीन खुद कर देख लेना;

“अहिंसा का तथागत” तुम्हारी करतूद पर स्नेह भरी निगाहों से क्षमा कर रहा है।

एक दिन मारने, गाडने के लिए कुछ भी नही बचेगा,

फिर भी आप खुद को तब किसी गड्डे में दफनाकर लोगे।

हे दमन कि साथीदारों, हमारी चुप्पी को दुर्बलता मत समझना;

इससे युद्ध टले है, नर-नारी संहार टला है।

और सिर्फ बचे है समता, स्वतंत्रता, बंधुता,न्याय, करुणा, मैत्री, जैसे मानवीय मूल्य ।

– अमित शालिनी शंकर पवार

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